”पहले वे आए यहूदियों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था/ फिर वे आए कम्यूनिस्टों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नही था/ फिर वे आए मजदूरों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं मजदूर नही था/ फिर वे आए मेरे लिए, और कोई नहीं बचा था, जो मेरे लिए बोलता..।” – पास्टएर निमोलर, हिटलर काल का एक जर्मन पादरी.
बिहार में पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ हो रहा है, वह भयावह है। विरोध में जाने वाली हर आवाज को राजग सरकार क्रूरता से कुचलती जा रही है। आपसी राग-द्वेष में डूबे और जाति-बिरादरी में बंटे बिहार के बुद्धिजीवियों के सामने तानाशाही के इस नंगे नाच को देखते हुए चुप रहने के अलावा शायद कोई चारा भी नहीं बचा है। शुक्रवार -16 सितंबर, 2011 को बिहार विधान परिषद ने अपने दो कर्मचारियों को फेसबुक पर सरकार के खिलाफ लिखने के कारण निलंबित कर दिया। ये दो कर्मचारी हैं कवि मुसाफिर बैठा और युवा आलोचक अरूण नारायण।
मुसाफिर बैठा को दिया गया निलंबन पत्र इस प्रकार है – ”श्री मुसाफिर बैठा, सहायक, बिहार विधान परिषद सचिवालय को परिषद के अधिकारियों के विरूद्ध असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने तथा – ‘दीपक तले अंधेरा, यह लोकोक्ति जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर लागू होती है। बिहार विधान परिषद, जिसकी मैं नौकरी करता हूं, वहां विधानों की धज्जियां उड़ायी जाती हैं’- इस तरह की टिप्पणी करने के कारण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।”
अरूण नारायण को दिये गये निलंबन पत्र के पहले पैराग्राफ में उनके द्वारा कथित रूप से परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम आए चेक की हेराफेरी करने का आरोप लगाया गया है, जबकि इसी पत्र के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि परिषद में सहायक पद पर कार्यरत अरूण कुमार (अरूण नारायण) को ”प्रेमकुमार मणि की सदस्यता समाप्त करने के संबंध में सरकार एवं सभापति के विरूद्ध असंवैधानिक टिप्पणी देने के कारण तत्कासल प्रभाव से निलंबित किया जाता है”। इन दोनों पत्रों को बिहार विधान परिषद के सभापति व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठि नेता ताराकांत झा ”के आदेश से” जारी किया गया है।
हिंदी फेसबुक की दुनिया में भी कवि मुसाफिर बैठा अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। अरूण नारायण ने अभी लगभग एक महीने पहले ही फेसबुक पर एकांउट बनाया था। उपरोक्त जिन टिप्पणियों का जिक्र इन दोनों को निलंबित करते हुए किया गया है, वे फेसबुक पर ही की गयीं थीं। फेस बुक पर टिप्पणी करने के कारण सरकारी कर्मचारी को निलंबित करने का संभवत: यह कम से कम किसी हिंदी प्रदेश का पहला उदाहरण है और इसके पीछे के उद्देश्य गहरे हैं।
हिंदी साहित्य की दुनिया के लिए मुसाफिर और अरूण के नाम अपरिचित नहीं हैं। मुसाफिर बैठा का एक कविता संग्रह ‘बीमार मानस का गेह’ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुआ है। मुसाफिर ने ‘हिंदी की दलित कहानी’ पर पीएचडी की है। अरूण नारायण लगातार पत्र पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं, इसके अलावा बिहार की पत्रकारिता पर उनका एक महत्वरपूर्ण शोध कार्य भी है। मुसाफिर और अरूण को निलंबित करने के तीन-चार महीने पहले बिहार विधान परिषद ने उर्दू के कहानीकार सैयद जावेद हसन को नौकरी से निकाल दिया था। विधान परिषद में उर्दू रिपोर्टर के पद पर कार्यरत रहे जावेद का एक कहानी संग्रह (दोआतशा) तथा एक उपन्यास प्रकाशित है। वे ‘ये पल’ नाम से एक छोटी से पत्रिका भी निकालते रहे हैं।
आखिर बिहार सरकार की इन कार्रवाइयों का उद्देश्य क्या है? बिहार का मुख्यधारा का मीडिया अनेक निहित कारणों से राजग सरकार के चारण की भूमिका निभा रहा है। बिहार सरकार के विरोध में प्रिंट मीडिया में कोई खबर प्रकाशित नहीं होती, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विरले कोई खबर चल जाती है, तो उनका मुंह विज्ञापन की थैली देकर या फिर विज्ञापन बंद करने की धमकी देकर बंद कर दिया जाता है। लेकिन समाचार के वैकल्पिक माध्य्मों ने नीतीश सरकार की नाक में दम कर रखा है। कुछ छोटी पत्रिकाएं, पुस्तिकाएं आदि के माध्यम से सरकार की सच्चाइयां सामने आ जा रही हैं। पिछले कुछ समय से फेस बुक की भी इसमें बड़ी भूमिका हो गयी है। वे समाचार, जो मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में से बड़ी मेहनत और काफी खर्च करके सुनियोजित तरीके से गायब कर दिये जा रहे हैं, उनका जिक्र, उनका विश्लेषण फेसबुक पर मौजूद लोग कर रहे हैं। नीतीश सरकार के खिलाफ लिखने वाले अधिकांश लोग फेसबुक पर हिंदी में काम कर रहे हैं, जिनमें हिंदी के युवा लेखक प्रमुख हैं।
वस्तुत: इन दो लेखक कर्मचारियों का निलंबन, पत्रकारों को खरीद लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा अब लेखकों पर काबू करने के लिए की गयी कार्रवाई है। बड़ी पूंजी के सहारे चलने वाले अखबारों और चैनलों पर लगाम लगाना तो सरकार के लिए बहुत मुश्किल नहीं था लेकिन अपनी मर्जी के मालिक, बिंदास लेखकों पर नकेल कसना संभव नहीं हो रहा था। वह भी तब, जब मुसाफिर और अरूण जैसे लेखक सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में अपने योगादान के प्रति प्रतिबद्ध हों।
ऐसे ही एक और लेखक प्रेमकुमार मणि भी काफी समय से राजग सरकार के लिए परेशानी का सबब बने हुए थे। मणि नीतीश कुमार के मित्र हैं और जदयू के संस्थापक सदस्यों में से हैं। उन्हें पार्टी ने साहित्य के (राज्यपाल के) कोटे से बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया था। लेकिन उन्होंने समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग, भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को माने जाने की मांग की तथा इस वर्ष फरवरी में नीतीश सरकार द्वारा गठित सवर्ण आयोग का विरोध किया। वे राज्य में बढ़ रहे जातीय उत्पीड़न, महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा तथा बढ़ती असमानता के विरोध में लगातार बोल रहे थे। नीतीश कुमार ने मणि को पहले पार्टी से 6 साल के लिए निलंबित करवाया। उसके कुछ दिन बाद उनके घर रात में कुछ अज्ञात लोगों ने घुस कर उनकी जान लेने की कोशिश की। उस समय भी बिहार के अखबारों ने इस खबर को बुरी तरह दबाया।
गत 14 सितंबर को नीतीश कुमार के ईशारे पर इन्हीं ताराकांत झा ने एक अधिसूचना जारी कर प्रेमकुमार मणि की बिहार विधान परिषद की सदस्यता समाप्त कर दी है। मणि पर अपने दल की नीतियों (सवर्ण आयोग के गठन) का विरोध करने का आरोप है। राजनीतिक रूप से देखें तो नीतीश के नेतृत्व वाली राजग सरकार एक डरी हुई सरकार है। नीतीश कुमार की न कोई अपनी विचारधारा है, न कोई अपना बड़ा वोट बैंक ही है। भारत में चुनाव जातियों के आधार पर लडे़ जाते हैं। बिहार में नीतीश कुमार की स्वजातीय आबादी 2 फीसदी से भी कम है। कैडर आधारित भाजपा के बूते उन्हें पिछले दो विधान सभा चुनावों में बड़ी लगने वाली जीत हासिल हुई है। इस जीत का एक पहलू यह भी है कि वर्ष 2010 के विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता को 20 फीसदी वोट मिले जबकि नीतीश कुमार के जदयू को 22 फीसदी। यानी दोनों के वोटो के प्रतिशत में महज 2 फीसदी का अंतर था।
नीतीश कुमार पिछले छह सालों से अतिपिछडों और अगड़ों का एक अजीब सा पंचमेल बनाते हुए सवर्ण तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं। इसके बावजूद मीडिया द्वारा गढ़ी गयी कद्दावर राजनेता की उनकी छवि हवाई ही है। वे एक ऐसे राजनेता हैं, जिनका कोई वास्तविक जनाधार नहीं है। यही जमीनी स्थिति, एक सनकी तानाशाह के रूप में उन्हें काम करने के लिए मजबूर करती है। इसके अलावा, कुछ मामलों में वे ‘अपनी आदत से भी लाचार’ हैं। दिनकर ने कहा है – ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो/ उसे क्या जो विषहीन, दंतहीन, विनीत सरल हो’।
कमजोर और भयभीत ही अक्सर आक्रमक होता है। इसी के दूसरे पक्ष के रूप में हम प्रचंड जनाधार वाले लालू प्रसाद के कार्यकाल को देख सकते हैं। लालू प्रसाद के दल में कई बार विरोध के स्वर फूटे लेकिन उन्होंने कभी भी किसी को अपनी ओर से पार्टी से बाहर नहीं किया। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाने वाले रंजन यादव तक को उन्होंने सिर्फ पार्टी के पद से ही हटाया था। दरअसल, लालू प्रसाद अपने जनाधार (12 फीसदी यादव और 13 फीसदी मुसलमान) के प्रति आश्वपस्त रहते थे।
इसके विपरीत भयभीत नीतीश कुमार बिहार में लोकतंत्र की भावना के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं। वे अपना विरोध करने वाले का ही नहीं, विरोधी का साथ देने वाले के खिलाफ जाने में भी सरकारी मशीनरी का हरसंभव दुरुपयोग कर रहे हैं। लोकतंत्र को उन्होंने नौकरशाही में बदल दिया है, जिसमें अब राजशाही और तानाशाही के भी स्पष्ट लक्षण दिखने लगे हैं। बिहार को देखते हुए क्या यह प्रश्न अप्रासंगिक होगा कि भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मण (वादी) नेता, वकील और परिषद के वर्तमान सभापति ताराकांत झा ने जिन तीन लोगों को परिषद से बाहर किया है वे किन सामाजिक समुदायों से आते हैं? सैयद जावेद हसन (अशरफ मुसलमान), मुसाफिर बैठा (धोबी, अनुसूचित जाति) और अरूण नारायण (यादव, अन्य पिछडा वर्ग)। मुसलमान, दलित और पिछडा।
क्या यह संयोग मात्र है? क्या यह भी संयोग है कि बिहार विधान परिषद में 1995 में प्रो. जाबिर हुसैन के सभापति बनने से पहले तक पिछडे़ वर्गों के लिए नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था तथा अनुसचित जातियों के लिए प्रोन्निति में आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं थी? जाबिर हुसैन के सभापतित्व काल में पहली बार अल्पसंख्यक, पिछडे़ और दलित समुदाय के युवाओं की परिषद सचिवालय में नियुक्तियां हुईं। इससे पहले यह सचिवालय नियुक्तियों के मामले में उंची जाति के रसूख वाले लोगों के बेटे-बेटियों, रिश्तेतदारों की चारागाह रहा था। क्या आप इसे भी संयोग मान लेंगे कि जाबिर हुसैन के सभापति पद से हटने के बाद जब नीतीश कुमार के इशारे पर कांग्रेस के अरूण कुमार 2006 में कार्यकारी सभापति बनाए गये तो उन्होंने जाबिर हुसैन द्वारा नियुक्ते किये गये 78 लोगों को बर्खास्त कर दिया और इनमें से 60 से अधिक लोग वंचित तबकों से आते थे? क्या हम इसे भी संयोग ही मान लें कि सैयद जावेद हसन, मुसाफिर बैठा और अरूण नारायण की भी नियुक्तियां इन्हीं जाबिर हुसैन के द्वारा की गयीं थीं?
जाहिर है, बिहार में जो कुछ हो रहा है, उसके संकेत बहुत बुरे हैं। मैं बिहार के पत्रकारों, लेखक मित्रों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आह्वान करना चाहूंगा कि जाति और समुदाय के दायरे तोड़ कर एक बार विचार करें कि हम कहां जा रहे हैं? और इस नियति से बचने का रास्ता क्या है?
लेखक प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के संपादक हैं.












श्रीकांत सौरभ
September 17, 2011 at 8:56 am
नीतिश सरकार के प्रति प्रमोद रंजन की टिप्पणी कुछ आपतियों के साथ बहुत हद तक सही है . फारबिसगंज गोलीकांड व हिलसा में महिलाओं पर हुए नृशंस अत्याचार से सुशासन की पुलिस के तानाशाह रवैये की पोल खुल गई है . और जिस तरह से बिहार सरकार अपने विरोधियों को चुन-चुनकर परास्त कर रही है,इससे तो यही लगता है कि नीतिश कुमार भी यूपी की सीएम मायावती की तरह निरंकुश होते जा रहे हैं . पहले के 15 वर्षों के लालटेन राज में जहां भ्रष्ट अफसरशाही व गुंडा तंत्र हावी रहे थे . वहीं अब फासीवादी सता व दमन करनेवाला पुलिस तंत्र कायम है . यदि नीतीश कुमार अपनी हिटलरशाही से बाज न आए अगले विस चुनाव में जनता उन्हें भी धूल चटा देगी,क्योंकि विरोध के स्वर भी छिटपुट उठने लगे हैं .
munger se sunil gupta
September 17, 2011 at 12:50 pm
sir backward press ke koi sampadk nhi hai kya.
प्रदीप कुमार
September 18, 2011 at 6:14 am
मुख्यमंत्री (मुर्खमंत्री) नीतीश कुमार, मैं भी डॉक्टर मुसाफिर हूं। कितनों को सस्पेंड करोगे ?
सिध्हार्थ वर्मा
September 18, 2011 at 8:17 am
मुसाफिर बैठा जैसे धूर्त ,लम्पटो पर देर से की गयी उचित.कारवाई .फेसबुक पर भी ये अपने घटिया और भद्दे कमेंट और सतही भडकाऊ भाषा के लिए जाना जाता है. जानने के लिए इसका प्रोफाइल फेसबुक पर देख कर इसकी जातीय और धार्मिक नफरत फैलाती पोस्ट्स को देखा जा सकता है. ये साहित्य जगत के राखी सावंत बनने की होड़ में नंगा नाचने को भी तयार हो जायेगा, पैसो की हेराफेरी तो मामूली बात है.
swarnim prabhat
September 18, 2011 at 1:01 pm
if nitish kumr’s govt doing such heinous thing then he should not forget the laloo’s episode
Digvijay chaturvedi
September 18, 2011 at 6:22 pm
भाई मुसाफिऱ बैठा जितना धुर्त आदमी मिलना मुश्किल है…..सही किया गया है इसके साथ,ये दोनों महाशय इतने बडे चालाक हैं कि सरकारी आफिस में बैठकर सरकार के खिलाफ ही लिख रहे थे, और अरुऩ जी को सही वजह से निलंबित किया गया है….परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम आए चेक की हेराफेरी करने का आरोप लगाया गया है,जो सही है…चेक परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम का था लेकिन इन्होंने चेक अपने अकाउ्नट में डालकर कैश करने की कोशिश की ,लेकिन बैंक मैनेजर को शक हो गया,और भंडाफोड हो गया….ये स्टोरी सभी tv channel पर चली थी, जिसमे अरुण कुमार ने कबूल किया कि इसने चेक कैश करने की कोशिश की………
anupnarayan singh
September 19, 2011 at 8:50 am
no comment nahi to sarkar …………
anupnarayan singh
September 21, 2011 at 12:02 pm
digvijay chaturvedi ji mai apko nahi janta janna bhi nahi chahta par arun narayan kai mamlai mai lagta hai aap ki jankari kamjor hai bank ki galti ki saja arun bhugat rahai hai aap sai jada nitish kumar kai samarthak arun narayan hai sab suniyojit sajish ka natija hai dalit aur pichari jati ka honai ka dand musafir aur arun ko mila hai
uma
September 21, 2011 at 12:37 pm
चेकबुक से फेसबुक तक
मैं आता हूं, पहले आरोप पर। मैं अरुण को डेढ़ दशक से जानता हूं जब वह बोरिंग रोड तरफ रहते हुए स्नातक की पढ़ाई करते हुए साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हाथ बंटा रहे थे। समकालीन भारतीय साहित्य व पहल जैसी पत्रिकाओं में मेरी रचनाओं को पढ़कर संपर्क में आए थे। आज के कवि कुमार मुकुल तब होमियोपथी की डाक्टरी कर रहे थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं पूरे हिंदी संसार में कोई भी सामने आकर कहे कि कभी-भी अपने सामने आए मौके को अरुण ने भुनाया है। एकाध होंगे तो वे निजी खुन्नस पाले लोग ही होंगे। हां, इतना जरूर है कि दिल्ली से लेकर पटना तक दर्जनों लोग होंगे जिन्होंने इस अरुण का इस्तेमाल (शोषण की हद तक) किया। मैं अपने को इससे अलग नहीं मानता। एक दैनिक में फीचर संपादन के क्रम में उसने मेरे दिए कई एसाईनमेंट पूरे किए। मेरा अनुमान है कि हिंदी जगत अरुण जी को इतना तो जानता ही है। सुविधा न होने के कारण बगैर किसी पारिश्रमिक के।
डाक विभाग की गलती से हमनाम अरुण कुमार का चेकबुक यदि लेखक अरुण नारायण (इसका भी औपचारिक नाम अरुण कुमार ही है) तो डाक वालों का फर्ज क्या होना चाहिए। और मान्यवर अरुण कुमार (सिंह) जी आपने तो आवेदन दिया होगा न चेकबुक के लिए ? चेकबुक नहीं मिल पाने की स्थिति में उन्होंने बैंक से शिकायत की या नहीं ? बैंक ने चेक आने पर क्या किया ? क्या नहीं माना जा सकता है कि सबकुछ साजीशन अरुण नारायण को फंसाने के लिए रचा गया हो। आखिर एक पैसे की भी गलत निकासी जब उस खाते से नहीं हुई तो अरुण कुमार सिंह जी कुछ भी नहीं कर सकते। और बैंक को अरुण नारायण ने अपना हस्ताक्षर करके चेक दिया था। नादान अरुण की गलती सिर्फ यह है कि अपने पते पर आए चेकबुक को अपना मान बैठा बगैर यह देखे कि इस पर किसकी खाता संख्या अंकित है। आखिर फर्जीवाड़ा ही करना होता तो वह अपने हस्ताक्षर से बैंक में चेक क्यों जमा करता ? बैंकिंग विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे मामले में बैंक सिर्फ उस चेक को खारिज करने के और कुछ नहीं कर सकता है। क्या उलट मामला अरुण कुमार सिंह, बैंक, डाक विभाग पर मिलजुलकर साजिश रचने का मामला नहीं बनता है।
रही बात फेसबुक पर विधान परिषद के सभापति और सरकार के खिलाफ असंवैधानिक टिप्पणी की तो सरकारी सेवा आचार संहित के दायरे में पहले तो कारण बताओ नोटिस देनी चाहिए थी। यह ठीक है कि सभापति को विशेषाधिकार प्राप्त है, पर सवाल है कि यह विशेषाधिकार ऐसे ही मामलों के लिए विवेकाधीन है क्या। क्या ेक भी आपराधिक पृष्ठभूमि के विधान पार्षद के मामले में उन्होंने कोई फरमान जारी किया है ?
मिस्र के तहरीर चौक पर छिड़ी जंग फेसबुक की आग थी और वहां की सरकार ने तो अपने सुरक्षा तंत्र तक को फेसबुक के सहारे युवाओं के संपर्क में रहने को कहा था। वित्तीय झंझावात के कारण 2008 से भीषण उथल-पुथल का सामना कर रहे आईस लैंड में इन दिनों संविधान संशोधन की कवायद चल रही है। नीतीश जी, आपको पता ही होगा कि वहां 25 सदस्यीय परिषद के जिम्मे संविधान संशोधन का उपक्रम चल रहा है। इसीके साथ इंटरनेट के जरिए सभी आईसलैंडवासियों को संशोधन की प्रक्रिया में आनलाईन भागीदारी का विकल्प दिया गया है। और शासन का आदेश था कि जून के अंत तक आई वाजिब सलाह को परिषद द्वारा अनुमोदित कर प्रारूप में शामिल कर लिया जाए। लेकिन नीतीश जी आप फेसबुक पर असहमति का धीमा स्वर भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। क्या मायावती का ‘प्रतिमा’ प्रेम और आपका ‘छवि’ प्रेम कहीं से भी अलग है? हालांकि सबकुछ होते हुए भी मायावती ने अभी तक ऐसा रुख तो नहीं अपनाया है। क्या फेसबुक को फेस नहीं कर पाना आपको कठमुल्लावादी पाक हुकूमत के करीब नहीं ले जाता जहां अभी-अभी लाहौर उच्च न्यायालय ने प्रशासन को फेसबुक पर बंदिश लगाने का आदेश दिया है। फेसबुक समेत वैसे सभी सोशल नेटवर्किंग साईट की पहुंच पर आईटी मंत्रालय को रोक लगाने का फरमान दिया गया है जो मजहबी नफरत फैलाने में शामिल हैं। (मजहबी नफरत को देखिए- फेसबुक पर पैगंबर मोहम्मद की आकृतियों वाली स्पर्द्धा आयोजित करने का आरोप है। याचिकाकर्ता वकील मुहम्मद अजहर का मानना है कि इससे इस्लाम बदनाम होता है) फरमान देनेवाले न्यायाधीश शेख अजमत सईद ने छह अक्तूबर तक इस बाबत रिपोर्ट देने को कहा है। नीतीश जी, बहुत कोसते होंगे आप यहां की व्यवस्था को जिसमें आपको पाकिस्तान जैसी वह आजादी नसीब नहीं। क्या आपको मालूम नहीं कि प्रेमकुमार मणि को लेकर जो भी विवाद हुआ उसने कितनी खिन्नता पैद की है। क्या आप इससे उत्पन्न परिदृश्य से अनजान हैं। कौन सी वजह है कि कोई यह न माने कि मुसाफिर या अरुण के मामले से आप अलग हैं। नीतीश जी राज्य सत्ता की सुविधा है तो आप आक्सीजन के सिलिंडर को आऊट आफ मार्केट कर सकते हैं, पर हवा पर बैन नहीं लगा सकते।
विस्तृत रपट आप http://www.aatmahanta.blogspot.com पर पढ़ सकते हैं।
Digvijay chaturvedi
September 30, 2011 at 9:46 am
मैं सिध्हार्थ वर्मा जी के वक्तवय में कुछ जोडना चाहूंगा,…..इसकी जातीय और धार्मिक नफरत फैलाती पोस्ट्स का एक उदाहरण ….जन्माष्टमी के दिन का स्वसिद्ध चिन्तक मुसाफिऱ बैठा जी का पोस्ट था…….””[b]आज छिनाल शिरोमणि कृष्ण का जन्मदिन है'[/b]’ ये किस साहित्यकार ,चिन्तक, और कवि की भाषा है…..?