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बहुत मुश्किल है अब किसी हिंदी वाले का आईएएस बन पाना

: अंग्रेज़ी बिन सब सून : संघ लोक सेवा आयोग अर्थात यूपीएससी द्वारा संचालित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा ग्यारह जून को आयोजित की गई. ये परीक्षा इस बार कुछ देरी से आयोजित की गई. वजह यह है कि आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा के प्रारूप में व्यापक बदलाव करते हुए इस साल से वैकल्पिक विषयों के चुनाव की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया.

: अंग्रेज़ी बिन सब सून : संघ लोक सेवा आयोग अर्थात यूपीएससी द्वारा संचालित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा ग्यारह जून को आयोजित की गई. ये परीक्षा इस बार कुछ देरी से आयोजित की गई. वजह यह है कि आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा के प्रारूप में व्यापक बदलाव करते हुए इस साल से वैकल्पिक विषयों के चुनाव की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया.

इस प्रारूप को देर से लागू करने और बेहद जल्दबाज़ी में तैयार किए गए सिलैबस की वजह से परीक्षा मई के बजाय जून में आयोजित हुई. नए प्रारूप के तहत अब हर अभ्यर्थी को सामान्य अध्ययन के साथ ही एक नए प्रश्नपत्र से रूबरू होना था, जिसे कॉमन एप्टीट्यूट टेस्ट यानी सी- सैट का नाम दिया गया है. हालांकि यह प्रश्न पत्र सभी अभ्यर्थियों के लिए समान था, लेकिन इस परीक्षा में बड़ी संख्या में बैठने वाले हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों में इस प्रश्न पत्र को लेकर बेहद बेचैनी थी. पहले तो तमाम विरोधों के बावजूद इस प्रारूप को सरकार ने उन पर थोप दिया और अब जबकि काफी देर से परीक्षा का पाठ्यक्रम घोषित किया गया तो उसमें अंग्रेज़ी की अनिवार्यता ने उन्हें हतोत्साहित होने की हद तक निराश कर दिया.

नई परीक्षा योजना के तहत पहले से चले आ रहे ऐच्छिक विषय वाले प्रश्नपत्र के स्थान पर 200 अंकों का एक नया प्रश्नपत्र शामिल किया गया, जिसमें से 30 अंक अंग्रेजी समझने की कुशलता के थे. यहां यह बात भी बेहद महत्वपूर्ण है कि इस प्रश्न पत्र में हिंदी व भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं दिया गया है. साथ ही अंग्रेज़ी की अनिवार्यता वाला यह प्रश्न पत्र महज़ ‘क्वॉलिफाइंग’ नहीं था, बल्कि इसके अंक ‘मेरिट’ में जोड़े जाएंगे, जहां एक-एक अंक निर्णायक सिद्ध होता है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस योजना के ज़रिए न सिर्फ़ अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपा जा रहा है बल्कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे अनंत काल के लिए बंद किए जा रहे हैं.

यह हिन्दी माध्यम के उन लाखों अभ्यर्थियों के लिए सिविल सेवा के दरवाज़े पूरी तरह से बंद करने की भी साज़िश है जो यदि इस परीक्षा में नहीं चयनित हो सकते तो सिर्फ़ एक कमज़ोरी या फिर ये कहें कि सिर्फ़ एक ‘अपराध’ की वजह से और वो ये कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती. दुनिया के किसी भी स्वतंत्र देश की प्रशासनिक सेवा परीक्षा में विदेशी भाषा ज्ञान की अनिवार्यता नहीं है, लेकिन समझ में नहीं आता कि हमारे देश में बिना अंग्रेज़ी ज्ञान के किसी को जानकार ही नहीं समझा जाता. जबकि पिछले कुछ दिनों में हिन्दी माध्यम से छात्रों ने बड़ी सफलताएं अर्जित की हैं.

1977 में डॉ. दौलतसिंह कोठारी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित हुआ था,  जिसने संघ लोक सेवा आयोग तथा कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के विचारों को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मति से यह सिफारिश की थी कि परीक्षा का माध्यम भारत की प्रमुख भाषाओं में से कोई भी भाषा हो सकती है. 1979 में संघ लोक सेवा आयोग ने इन सिफारिशों को क्रियान्वित किया और भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में से किसी भी भारतीय भाषा को परीक्षा का माध्यम बनाने की छूट दी गई. इस परिवर्तन का लाभ उन उम्मीदवारों को मिला जो महानगरों से बाहर रहते थे या अंग्रेजी के महंगे विद्यालयों में नहीं पढ़ सकते थे. उनके पास प्रतिभा, गुण, योग्यता थी किंतु अंग्रेजी माध्यम ने उन्हें बाहर कर रखा था.

इन सिफारिशों को लागू हुए तीन दशक हो चुके हैं. इस अवधि में यह कभी नहीं सुनाई पड़ा कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो प्रशासक आ रहे हैं, वे किसी भी तरह से अंग्रेजी माध्यम वालों से कमतर हैं. ऐसा नहीं है कि हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को इस परीक्षा में चयनित होने से रोकने के लिए सी- सैट कोई नया बैरियर है. दरअसल, मौजूदा प्रारूप में भी प्रारंभिक परीक्षा के बाद होने वाली मुख्य परीक्षा में अंग्रेज़ी का एक अनिवार्य प्रश्न पत्र होता है जिसे हर अभ्यर्थी को क्वालीफाई करना होता है. अन्यथा दूसरे विषय का मूल्यांकन नहीं होता. लेकिन यहां हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को भी अंग्रेज़ी के समानांतर रखा गया है (भले ही दिखावे के लिए). यानी अंग्रेज़ी के साथ- साथ हिन्दी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा का प्रश्न पत्र भी क्वालीफाइंग क़िस्म का होता है.

दूसरे इस बैरियर को पार करने के बाद मुख्य परीक्षा का दूसरा हिस्सा अर्थात इंटरव्‍यू यानी साक्षात्कार का आता है. और इस चरण में हिन्दी माध्यम के अभ्यर्थियों को किस तरह से दोयम दर्जे का समझा जाता है, वह किसी से छिपा नहीं है. न सिर्फ़ जानबूझकर साक्षात्कार में बेहद कम अंक दिए जाते हैं ताकि अभ्यर्थी का चयन ही न हो सके बल्कि कई बार साक्षात्कार के दौरान ही यह अहसास भी करा दिया जाता है कि वे इस सेवा में आने के योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे हिन्दी माध्यम से हैं. ऐसा उन तमाम लोगों के अनुभवों के आधार पर मैं लिख रहा हूं जो इसके प्रत्यक्ष गवाह हैं.

यही नहीं कुछेक साल पहले यूपीएससी के कुछ सदस्यों के बारे में तो छात्रों ने लिखित शिकायत की थी और देश के तमाम प्रतिष्ठित अख़बारों में ऐसी ख़बरें भी छपी थीं. इसके अलावा इस प्रतिष्ठित परीक्षा में जो प्रश्न पत्र दिया जाता है, यदि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते तो उसके निहितार्थ ही नहीं समझ सकते. क्योंकि मूल रूप से अंग्रेज़ी में बने प्रश्न पत्र का ऐसा अनुवाद हिन्दी माध्यम के छात्रों को उपलब्ध कराया जाता है जिसे बड़े से बड़ा भाषा वैज्ञानिक या हिन्दी का विद्वान तो छोड़िए, यदि अनुवाद करने वाला व्यक्ति ख़ुद समझ जाए तो बहुत बड़ी बात होगी. बात समझ में न आए तो कभी उठाकर प्रश्न पत्र देख लीजिए. अनुवाद करते समय उसमें जटिलता ठूंसने की अतिरिक्त मेहनत की जाती है.

ऐसे भेदभावपूर्ण बर्ताव के बावजूद हिन्दी माध्यम के छात्रों ने कठिन परिश्रम और अपनी बौद्धिक क्षमता का परिचय देते हुए पिछले कुछ सालों से न सिर्फ़ भारी मात्रा में सफलता हासिल की बल्कि वरीयता सूची में भी स्थान हासिल किया. इस परीक्षा की तैयारी कर रहे तमाम छात्रों ने बातचीत के दौरान ये आरोप लगाए कि कुछ अंग्रेज़ीदां नीति निर्धारकों को हिन्दी माध्यम के छात्रों की ये सफलता अच्छी नहीं लगी और जब उन्होंने देखा कि मौजूदा व्यवस्था में ये छात्र अब बराबरी की स्थिति में आने लगे हैं तो उन्होंने व्यवस्था को ही बदल देने का सरकार को सुझाव दे डाला. छात्रों के इन आरोपों में वज़न भी है क्योंकि परीक्षा का जो पाठ्यक्रम सुझाया गया है वह कोई नया नहीं है बल्कि इस तरह का पाठ्यक्रम अभी तक बैंकिंग, एनडीए, सीडीएस, एमबीए जैसी परीक्षाओं के लिए पहले से ही मौजूद था.

सिविल सेवा परीक्षा का मौजूदा पाठ्यक्रम और प्रारूप वास्तव में अभ्यर्थियों के संपूर्ण ज्ञान और व्यक्तित्व की परीक्षा करने में सक्षम था. आज तक किसी भी अध्ययन या अनुसंधान से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है कि प्रवेश परीक्षा के स्तर पर अंग्रेजी का ज्ञान होना भावी प्रशासन के लिए परमावश्यक गुण है. चयन के बाद हर चयनित अभ्यर्थी को 3 वर्ष का आधारिक पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके बाद भी वह अनेक विशेषित पाठ्यक्रमों में भाग लेता रहता है और प्रशिक्षण चलता रहता है. जब सिविल सेवा अधिकारी केंद्र की सेवा में आता है, तो यहां राजभाषा हिंदी में काम करने की छूट होती है. फिर सेवा के लिए क्वालिफाइंग स्तर पर ही अंग्रेजी का उच्च ज्ञान जांचने का क्या तात्पर्य हो सकता है? समझ से परे है.

दूसरे इस सी- सैट टाइप की परीक्षा का प्रयोग गैर सरकारी संस्थाएं और प्रबंधन संस्थान करते हैं, जहां से इसकी नकल कर ली गई है. लेकिन यह बात समझनी ज़रूरी है कि प्रबंधन प्रशासन का विकल्प नहीं है. क्या यह स्वीकार्य हो सकता है कि कल्याणकारी राज्य का प्रशासक उन गुणों से भरपूर हो जो कि एक औद्योगिक समूह के प्रबंधन के लिए ज़रूरी है? और यदि ये चीजें ज़रूरी ही हैं, परिवर्तन के दौर में प्रशासक से आप प्रबंधक की अपेक्षा करते ही हैं, भारत इतना विकसित हो गया कि कल्याणकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की अब ज़रूरत ही नहीं रही, अब तो प्रशासकों को सिर्फ़ सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का प्रबंधन मात्र ही देखना है तो इसमें दुराव- छिपाव क्यों.

परीक्षा के लिए दिए जाने वाले नोटिफिकेशन में ही साफ़ तौर पर लिख दिया जाए कि अंग्रेज़ी न जानने वाले परीक्षा में बैठने के अधिकारी नहीं हैं. अब प्रशासक नहीं सिर्फ़ प्रबंधक ही चाहिए. और हां, यदि इन्हीं गुणों की आपको परख करनी है तो बड़े बड़े प्रबंधन संस्थानों से ही क्यों नहीं अच्छे छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिए सिविल सेवा में चयनित कर लिया जाता. इसके लिए इतनी औपचारिकताएं क्यों और आम जनता को इतना भ्रमित करने की क्या ज़रूरत. यदि ऐसा कर देंगे तो इतनी मेहनत, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय की बर्बादी और अपनी ऊर्जा के व्यतिरेक से तो छात्र बच जाएंगे और अपने लिए अन्य विकल्पों की तलाश कर सकेंगे.

समझ में नहीं आता कि अंग्रेज़ी के प्रति इतना आग्रह क्यों है. और हां, यदि अंग्रेज़ी सच में इतनी महत्वपूर्ण है कि बिना इसके हिन्दुस्तान की व्यवस्था नहीं चल सकती, प्रशासन नहीं चल सकता, देश का विकास नहीं हो सकता, दुनिया भर में हमारी इज्जत नहीं बढ़ेगी, तो हिन्दी को राजभाषा बनाकर उसके तथाकथित विकास के नाम पर सरकारी ख़जाने का अरबों रुपया बहाने की क्या ज़रूरत. शिक्षा व्यवस्था ऐसी बनाइये कि गांव के प्राइमरी स्कूल का भी छात्र अपनी पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम से करे और हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं को वैसी ही हिकारत से देखे जैसा कि पब्लिक स्कूलों के अंग्रेज़ी शिक्षा पाए लोग देखते हैं.

हिन्दी को बढ़ावा देने के नाम पर हर साल कितने रुपये बहाए जाते हैं, इसका कोई हिसाब नहीं. पूरा का पूरा एक विभाग ही बना दिया गया है हिन्दी के साथ मज़ाक करने के लिए. ऐसा लगता है कि बरसों पहले मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का मज़ाक में कहा गया ये शेर आज भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की हक़ीक़त बन गया है….

उन्हीं के मतलब की कह रहा हूं, ज़बान मेरी है बात उनकी,
उन्हीं की महफ़िल संवारता हूं, चिराग़ मेरा है रात उनकी.
फ़क़त मेरा हाथ चल रहा है, उन्हीं का मतलब निकल रहा है,
उन्हीं का मज़मूं, उन्हीं का कागज़, कलम उन्हीं की, दवात उनकी..
.’

लेखक समीरात्‍मज मिश्र बीबीसी में काम कर चुके हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस में वरिष्‍ठ पद पर हैं.

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0 Comments

  1. Ashish Mishra

    June 15, 2011 at 7:41 am

    Hamne IAS ki pariksha nahi di, lekin CAT ki pariksa di, DI me 99.5 percentail tha , MATH me 85 percentail aur ANGREZI me :-* -3 number tha kuch 18 percentail. humko angrazi likhane padhane aati thi, lekin CAT ki angrezi apne samajh se bahar thi..
    Humko samajh me nahi aaya ki hum IIM ki pariksha de rahe hai ya America me naukri karne ki (lekin jaisa ki IIM ke kshatro ka lakshya hota hai dusara pariksha bhi waisi hi thi )
    Ab IAS me bhi lakshya ho corportes, lobbiysto aur forign investors ki seva karna, tab pariksha bhi waisi hi hogi

  2. भारतीय नागरिक

    June 16, 2011 at 4:33 pm

    हिन्दी बोलने वालों के लिये भविष्य में अधिक कुछ बचा नहीं.

  3. chandni

    June 19, 2011 at 8:38 am

    hindi bhasi students ko kuch nuksan to zarur hoga

  4. राम किशोर

    January 20, 2014 at 2:22 am

    यह हिन्दी और हिन्दुस्तानियों के साथ धोखा है।

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