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बारह साल बाद भी श्रीमालीजी की बातें प्रेरणा देती हैं

[caption id="attachment_18853" align="alignleft" width="77"]लक्ष्मीकांत श्रीमालीलक्ष्मीकांत श्रीमाली[/caption]: श्रीमाली की पुण्यतिथि (12 अगस्त) पर विशेष : पत्रकारिता में शुचिता जरूरी : देश के पत्रकारिता जगत में लक्ष्मीकांत श्रीमाली जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। 90 के दशक में जब मेरठ दंगों की आग में झुलस रहा था और क्षेत्र के दो बड़े अखबार दंगों की आग में घी डालने का काम कर रहे थे, उस दौर में नवभारत टाइम्स के एरिया प्रमुख के रूप में श्रीमाली ने पूरा योगदान कर पत्रकारीय हितों का निर्वहन किया। ईमानदारी के लिए विख्यात श्रीमाली जी ने मेरठ में काफी मुश्किलें झेलीं। उनके परिवार से लेकर उनके करियर तक को तबाह करने के तमाम उपाय निष्फल साबित हुए।

लक्ष्मीकांत श्रीमाली

लक्ष्मीकांत श्रीमाली

: श्रीमाली की पुण्यतिथि (12 अगस्त) पर विशेष : पत्रकारिता में शुचिता जरूरी : देश के पत्रकारिता जगत में लक्ष्मीकांत श्रीमाली जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। 90 के दशक में जब मेरठ दंगों की आग में झुलस रहा था और क्षेत्र के दो बड़े अखबार दंगों की आग में घी डालने का काम कर रहे थे, उस दौर में नवभारत टाइम्स के एरिया प्रमुख के रूप में श्रीमाली ने पूरा योगदान कर पत्रकारीय हितों का निर्वहन किया। ईमानदारी के लिए विख्यात श्रीमाली जी ने मेरठ में काफी मुश्किलें झेलीं। उनके परिवार से लेकर उनके करियर तक को तबाह करने के तमाम उपाय निष्फल साबित हुए।

वे जिम्मेदारी से अपने दायित्वों का निर्वाह करते रहे। उनके निधन को आज 12 साल हो चुके हैं, लेकिन उनकी बातें याद भी उनके इर्द गिर्द के लोगों को प्रेरणा देती हैं। मेरठ से पटना और पटना पहुंचते ही नवभारत टाइम्स धनबाद के लिए ट्रांसफर किए जाने के बाद श्रीमाली जी ने धनबाद में पत्रकारीय हितों की रक्षा के लिए वहां के तत्कालीन कोयला माफिया से भिडऩे में भी चिंता नहीं की। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से श्रीमाली जी ने साल भर बाद धनबाद से वापसी का फैसला किया और अमर उजाला- दैनिक जागरण जैसे अखबारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज से करीब 14 साल पहले हिंदी में कारोबारी अखबार की परिकल्पना करने और उसे मूर्त रूप देने वाली श्रीमाली जी की दूरदृष्टि का सभी लोहा मानते थे। किन वजहों से अमर उजाला का कारोबार सफल नहीं हो पाया यह तो पता नहीं, लेकिन आज देश के तीन बड़े हिंदी कारोबारी अखबारों ने जरूर उन गलतियों से सबक लिया होगा। पत्रकारीय करियर की शुरुआत लखनऊ में पायनियर से करने वाले श्रीमाली जी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और उनके त्याग आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

एक पत्रकार के पत्र पर आधारित

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0 Comments

  1. Patrakar

    December 13, 2010 at 7:26 am

    At a time when media organisations are making journalists stoop too low to gather news and the definition of journalism being giving a sad description through a section of electronic media, the dedicated and committed approach in journalism as once practiced by Shri Lakshimkant Shrimali ji should inspire us all.

  2. akash

    December 13, 2010 at 9:35 am

    shrimali jee ne meerut dange ke daur mein bbc ke mark tuli aur kai varishth patrakaron ke saath akbaar ghar ghar pahunchane mein bhee madad kee. amar ujala aur dainik jagran mein unhone kai naye edition kee shuruaat kee, aur bhrasht logon ko us daur mein rokne ke kafee koshish kee, jinkee wazah se unhein aur unke pure pariwar ko kafee kasht uthana pada.

    shrimali jee ko shat shat naman

  3. भानु प्रताप सिंह

    December 13, 2010 at 10:56 am

    ये क्या वही श्रीमाली जी हैं जो अमर उजाला, आगरा में जीएम रहे थे. यहां तो उन्होंने कोई पत्रकारिता नहीं की। हां, वे कभी-कभी इंडियन एक्सप्रेस का नाम जरूर लिया करते थे।

  4. akash

    December 13, 2010 at 11:40 am

    भानु प्रताप सिंह jee,
    shrimali jee agar mein amar ujala ke gm the lekin 1998 mein. yah to aap samajh hee sakte hain ki koi insaaan is field mein aate hee gm nahin ban jata. unhone lucknow mein graduation ke baad pioneer join kiya tha ur uske baad kai jagah se seedhiyan chadhte huye GM ke pad par pahunche, jismein indian express bhee shamil tha, shrimali jee ne career kee shuruaat patrakarita se hee kee, aur gm pad par pahunchnae tak bhee we ek patrakar pahle the, GM baad mein. logon kee pratikriya aane dijie unkee poori jeevni pesh kee jayegee yahan.

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