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बास्टर्ड कहने वाले कलक्टर को क्यों ढो रहे हैं रमन सिंह

रायगढ़ के नवपदस्थ कलेक्टर अमित कटारिया कुछ ज्यादा ही गुरूर में नज़र आते है. इसीलिये उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार को ”बास्टर्ड” कह कर दफ्तर से ”गेट आउट” कह कर भागा दिया. बाद में जब एक अखबार ने उनसे इस बारे में बात की तो उन्होंने फिर कहा- ”मै अनेक लोगों को भगा देता हूँ.” कलेक्टर रायगढ़ ने वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता रोशनलाल अग्रवाल के साथ जाने-अनजाने में जो अभद्रता की, इसके गवाह वहाँ मौजूद एसपी राहुल शर्मा भी हैं, जो संयोगवश वहाँ उपस्थित थे।

रायगढ़ के नवपदस्थ कलेक्टर अमित कटारिया कुछ ज्यादा ही गुरूर में नज़र आते है. इसीलिये उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार को ”बास्टर्ड” कह कर दफ्तर से ”गेट आउट” कह कर भागा दिया. बाद में जब एक अखबार ने उनसे इस बारे में बात की तो उन्होंने फिर कहा- ”मै अनेक लोगों को भगा देता हूँ.” कलेक्टर रायगढ़ ने वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता रोशनलाल अग्रवाल के साथ जाने-अनजाने में जो अभद्रता की, इसके गवाह वहाँ मौजूद एसपी राहुल शर्मा भी हैं, जो संयोगवश वहाँ उपस्थित थे।

श्री अग्रवाल एक प्रतिनिधि मंडल को ले कर कलेक्टर से मिलने गए थे। दरअसल प्रशासन ने एक ऐसे व्यक्ति का घर तोड़ दिया था, जिसने बैंक से कर्ज ले कर अपना घर बनवाया था। जिस प्लाट पर उसने घर बनाया था, वह पट्टेवाला था। श्री अग्रवाल कलेक्टर से मिल कर इतनी ही आश्वस्ति चाहते थे कि जिसका घर टूटा है, उसे पूरा मुआवजा मिले। श्री अग्रवाल ने यह भी कहा कि कानूनन उसका मकान तोड़ा ही नहीं जा सकता। इतना सुनना था कि कलेक्टर महोदय तैश में आ गए और अभद्रता की सीमा पार करते हुए अपशब्दों का प्रयोग किया और श्री अग्रवाल को धक्के मार कर बाहर निकालने की बात करने लगे। यह तो कोई बात नहीं हुई। इस देश में लोकतंत्र है, बहुत से कलेक्टर इस बात को भूल जाते हैं। वे आज भी यही समझते हैं कि इस देश की जनता गुलाम है और वे इनके राजा है।

इस तरह का व्यहार, इस तरह की भाषा 15 अगस्त 1947 के पहले तो सुनी जा सकती थी, उसके बाद बर्दाश्त नहीं की जा सकती। कलेक्टर यह भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। भले ही कलेक्टर को नौकरशाह कहा जाता है मगर शाह होने के पहले भी वह नौकर ही है। जनता का नौकर, सेवक। उसे हर वक्त संयम से काम लेना चाहिए। कलेक्टर को दिनभर समस्याओं से ही जूझना पड़ता है। तरह-तरह के मुद्दे आते रहते हैं। उन सबका शांति के साथ निपटारा करने वाला प्रशासक ही अच्छा इंसान कहलाता है। हम नियम-कायदे से काम करें, कौन रोकता है? लेकिन अगर कोई नियम-कायदे की बात करे तो उस पर उखड़ कर हल्केपन का सबूत भी नहीं देना चाहिए। सही प्रशासक के गुणों में एक गुण यह भी है कि वह शांति और धैर्य के साथ लोगों की बात सुने और समुचित व्यवहार कर के संतुष्ट करे। अगर इसी तरह प्रशासन और जनता के बीच टकराव की नौबत आएगी तो व्यवस्था कैसे चलेगी? अगर कलेक्टर सबको ‘बास्टर्ड’ कह कर धक्के मार कर बाहर निकलवाते रहेंगे, तो उन्हें क्या इसीलिए बिठाया गया है? इसका जवाब तो अब छत्तीसगढ़ सरकार और मुख्यमंत्री रमन सिंह को भी देना होगा। ऐसे कलेक्टर को क्यों ढोया जा रहा है?

श्री अग्रवाल के साथ कलेक्टर ने जो व्यवहार किया, वह एक व्यक्ति के नाते भी किसी कोण से उचित नहीं कहा जा सकता। बेहतर तो यही होगा कि कलेक्टर महोदय अपनी गलती को महसूस करें और खेद व्यक्त करें। भविष्य में ऐसा व्यवहार वे किसी के साथ न करें, इस बात का भी संकल्प लें। कलेक्टर महोदय ने अवैध कब्जे हटाने का एक अच्छा काम हाथ में लिया है। यह जारी रहना चाहिए। शहर को सुव्यवस्थित करने के लिए यह जरूरी है। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि गेहूँ के साथ घुन भी न पिस जाए। अगर अनजाने में किसी के साथ अन्याय हो गया है, तो उसे फौरन मुआवजा मिलना चाहिए। कलेक्टर को इसी घटना की जानकारी देने और उनसे मुआवजे की अपेक्षा के साथ श्री अग्रवाल उनके पास गए थे। जो लोग वहाँ मौजूद थे, उनका भी यही कहना है कि श्री अग्रवाल ने ऐसा कोई गलत व्यवहार नहीं किया जिससे कलेक्टर को उत्तेजित हो कर गाली बकनी पड़ जाए। मीडिया वालों ने जब कलेक्टर से उक्त घटना के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि मैंने जो कुछ किया, अच्छा किया है, और भविष्य में भी ऐसा ही करता रहूँगा। उनका यह कथन क्या दर्शाता है, यह समझाने की जरूरत नहीं है।

कई बार यह भी समझ में नहीं आता कि प्रशासनिक अमला भरी बरसात में ही तोडफ़ोड़ करने में क्यों भिड़ जाता है? ऐन बरसात के मौसम में तोडफ़ोड़ करके लोगों को बेघर करना न्याय नहीं कहा जा सकता। तोडफ़ोड़ के बाद प्रशासन स्थल की साफ-सफाई भी नहीं करता। इस कारण महामारी भी फैलने लगती है। या तो हमारी इतनी तैयारी रहे कि हम तोडफ़ोड़ करें और फौरन सफाई भी करते चले, ताकि गंदगी न फैले। और अगर पूरा अमला हमारे पास नहीं है तो बरसात को निकल जाने दें। प्रशासन खुद तो आलीशान वातानुकूलित जीवन जीता है और आम लोग से भेड़-बकरियों जैसा निर्मम व्यवहार करता है। और जब कोई रोशनलाल किसी दुखी व्यक्ति के पक्ष से अवगत कराने प्रशासन से मिलता है तो उसके साथ अमर्यादित व्यवहार किया जाता है। रायगढ़ के लोग इस बात को बखूबी जानते हैं कि श्री अग्रवाल किसी गलत व्यक्ति की वकालत नहीं कर सकते। उसी के साथ खड़े होते हैं जिसके साथ अन्याय हुआ है। श्री अग्रवाल जनप्रतिनिधि है। चार दशक से पत्रकारिता भी कर रहे हैं। आज से नहीं, शुरू से ही वे अन्याय के विरुद्ध बोलने वाले लोगों में हैं। इसीलिए श्री अग्रवाल के साथ हजारों लोग हैं।

हैरत की बात तो तब हो जाती है कि कोई अधिकारी अपनी गलती को स्वीकार भी न करे। सही काम का हर कोई स्वागत कर रहा है, लेकिन अनजाने में ही सही, अगर किसी के साथ अभद्र व्यवहार हो जाए, तो गलती स्वीकारने की उदारता भी दिखानी चाहिए। खेद व्यक्त करने से कोई छोटा नहीं हो जाता। एक दैनिक समाचार पत्र के संपादक-प्रकाशक रोशनलाल के साथ कलेक्टर ने जैसा व्यवहार किया, उसकी अनुगूँज राजधानी रायपुर तक हुई है। एक संपादक के साथ यह हो रहा है, तो सामान्य लोगों के साथ क्या होता होगा? श्री अग्रवाल के साथ कलेक्टर ने जो व्यवहार किया, उसे जिसने भी सुना, वह चकित हो गया और दुख भी हुआ। अब यह तो छत्तीसगढ़ सरकार को सोचना चाहिए कि वे रायगढ़ जैसे संवेदनशील जिले में कैसे अधिकारी पदस्थ करे? रायगढ़ में पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा भी पदस्थ हैं। वे सारे मामले बड़ी शालीनता और धैर्य के साथ निपटाते हैं। किनसे कैसा व्यवहार करना है, वे अच्छे से जानते हैं।

दरअसल अभी जो कलेक्टर आए हैं, वे रायगढ़ के लिए नये भी हैं। उन्हें पता ही नहीं कि सामने जो शख्स खड़ा है, उसका इतिहास क्या है। हर कोई छुटभैया नहीं होता, कुछ लोग सच्चे-अच्छे नागरिक भी होते हैं। समाज में सज्जन और दुर्जन दोनों तरह के लोग रहते हैं। हमारा दायित्व है कि हम सही-गलत की पहचान कर सकें। जो प्रशासक ऐसा करने की क्षमता विकसित कर लेते हैं, वे नायक बन जाते हैं। युवा कलेक्टर को अभी लम्बी पारी खेलनी है, इसलिए उन्हें संयम से काम लेना होगा, लोगों को साथ ले कर चलना होगा। व्यवहार ऐसा रखना होगा कि लोग उनके पास आएँ, तो वे उनका दिल जीत लें। गलत लोगों को वे हताश करें, लेकिन जिन्हें वाकई में न्याय मिलना चाहिए और जो इसके हकदार हैं, उन्हें तो न्याय मिले। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि भविष्य में ऐसी कोई घटना दुबारा नहीं होगी और प्रशासन बरसात में की जाने वाली तोडफ़ोड़ों के सिलसिले पर भी विराम लगाएगा। किसी भी सही व्यक्ति के साथ अन्याय का इतिहास भी नहीं दुहराएगा। और सबसे बड़ी बात उत्तेजित हो कर दी गई गाली यानी ‘बास्टर्ड’  शब्द है। इसके लिए कलेक्टर को खेद व्यक्त करना चाहिए।

लेखक गिरीश पंकज सद्भावना दर्पण के संपादक हैं.

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0 Comments

  1. santosh jain,raipur

    July 24, 2011 at 9:28 am

    bahut nindaniy ghatna hai,jo aadmi(KATARIYA)kewal 1 rupay tankha lekar rajdhanike logo ka dil jit chuka ho,wo itna badtamiz kyo ho gaya?sayad uski jindagi me kharab log jyada aaye honge,isek ghatna ne sabhi ki dookhi kar diya hai,imandari ka matlab ahankari hona nahi hota,jago collector jago,

  2. jitendra sonkar

    July 24, 2011 at 9:36 am

    रायगढ़ के नवपदस्थ कलेक्टर अमित कटारिया ko jaanne waale jante hain ki wo kitne imaandaari aur bharosey ke pratik hain ………… faltu kaam naa kar wahi karte hain jo niyam hai…. unhe kisi netaa samaj sevak aur mausam se matlab nahi hain………/ mujhe to samajh me nahi ata ki jab log accha kar nahi sakte to accha karne se rokte aur usme virodh kyu karte hain……agar kucch karna hain to har kaam ferfect karke dikhao……….thanks

  3. Dreamer

    July 24, 2011 at 10:19 am

    Very sad incident. But in Chhattisgarh, many journalists became PROs of government, defending Salva Judam aggressively, they liked when tribal militia and tribals on Naxal side fought. Eventually tribal was the soler.

    When you become more loyal than the king, and are more concerned for party and government than state and the people, you lose respect. In Chhattisgarh, journalists worked hard but after 2005 something went wrong.

    Today everybody knows that ‘patrakar to saare manage ho chuke hain’. To phir kiski kya izzat? Yahi hoga. Aaj gali, kal maar peet bhi hogi. But it is really sad.

  4. umesh soni

    August 23, 2011 at 3:27 pm

    कुछ मज्बूरी तो रही होगी,कोई इस तरह बेवफ़ा नही होता।

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