
बृजेंद्र सिंह यादव
एक बार फिर सिपाही बृजेंद्र सिंह यादव को सस्पेंड कर दिया गया है. इन्हें इस बार सस्पेंड करने का बहाना बनाया गया है मीडिया में बयान देने को. कहा गया, ‘बगैर अनुमति बृजेंद्र ने मीडिया को बयान दिया. इससे पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई है.’ उस पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई है जो अपराधियों की चाकरी करता है. जो कमजोरों को सताता है. जो मिलावटखोरों से समझौता करता है. जो देश-राज्य की अर्थव्यवस्था को चौपट करने वालों के चौखट पर हाजिरी लगाता है. जो निरीहों पर अपनी दादागीरी दिखाता है. जिसके डर से गरीब थानों-चौकियों तक अपनी फरियाद लेकर नहीं जाते हैं. जो नेताओं की रखैल बन गया है. जो सत्ता के मद में लोकतंत्र की हत्या करता है.
हो सकता है कि बहुत लोगों के लिए किसी सिपाही का सस्पेंड होना कोई खास बात ना हो. लेकिन यह खबर सच के लिए लड़ने वालों का रोम-रोम फड़का सकता है. ये वही बृजेंद्र सिंह यादव है, जिन्हें पुलिस अधिकारियों के घोटाले को उजागर करने और सच कहने की कीमत बार-बार चुकानी पड़ रही है. जितने साल इनकी नौकरी को नहीं हुए उससे ज्यादा बार इनका ट्रांसफर और संस्पेंशन हो चुका है. इनकी गलती कोई बेईमानी या भ्रष्टाचर नहीं है. इनकी गलती है कानून-व्यवस्था संभालने वाले अपने कथित आईपीएस आकाओं की लूट पर सवाल उठा देना. इस सवाल की काफी कीमत बृजेंद्र चुका चुके हैं. साढ़े नौ साल बर्खास्त रहे. एनएसए झेला. कई मुकदमे इन पर लगाए गए. हत्या का प्रयास भी किया गया. फिर भी यह सिलसिला टूटा नहीं है. लड़ रहे हैं. बर्खास्त हो रहे हैं. आप समझ सकते हैं जब अपने एक साथी को इस तरह परेशान और प्रताडि़त कर सकते हैं तो एक आम आदमी की कीमत इन खाकी वर्दीधारियों की नजर में क्या होगी!
सत्ता और लालफीताशाही के गठजोड़ का घिनौना चेहरा भी देख चुके हैं बृजेंद्र. आज कई पार्टियों में अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले और जनता की भलाई की बात करने वाले बृजेंद्र के सामने नंगे हो गए थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बृजेंद्र को एनेक्सी भवन बुलाया था. तब के नौकरशाह और आज के कांग्रेसी सांसद पीएल पुनिया, राजबब्बर, तत्कालीन मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी भी वहां मौजूद थे. बृजेंद्र को प्रलोभन दिया गया कि आपको सब इंस्पेक्टर बना दिया जाएगा. एमएलसी बनाने तक के प्रलोभन दिए गए. बदले में कहा गया आप आईपीएस लोगों के खिलाफ चल रही लड़ाई वापस ले लीजिए. बृजेंद्र नहीं माने. इनके खिलाफ रिपोर्ट लगाई गई. सस्पेंड किया गया. इन्होंने कोर्ट की शरण ली और जस्टिस ए रफत ने बृजेंद्र को सही मानते हुए इनके पक्ष में फैसला दिया.
शायद बृजेंद्र की जगह कोई और होता तो टूट चुका होता या फिर समझौता करके इस भ्रष्ट तंत्र के लूट में अपना हिस्सा खा रहा होता. पर इन्होंने समझौता नहीं किया. लड़ रहे हैं. लगातार लड़ रहे हैं. इन्हें लगता है कि कभी भी इनकी हत्या कराई जा सकती है. फिर भी इनका हौसला कम नहीं है. सिर्फ इन्हें अपने अधिकारियों और भ्रष्ट पुलिस तंत्र से ही नहीं लड़ना पड़ा. इन्हें सत्ता से भी लड़ना पड़ा. इनके ऊपर साम, दाम, दंड, भेद सब आजमाए गए. बृजेंद्र को रास्ते पर लाने के लिए सत्ता और प्रशासन तक एक हो गए. चोरों का गठजोड़ एक हो गया. फिर भी नहीं माने बृजेंद्र. अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपनी आवाज बुलंद किए हुए हैं. नौकरशाही और प्रजातंत्र के घिनौने रंग से रू-ब-रू हो चुके बृजेंद्र को न्यायालय पर पूरा भरोसा है.
बृजेंद्र की गलती सिर्फ इतनी है कि इन्होंने पिछले पांच दशक से चले आ रहे पुलिस अधिकारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई. मामला ये है कि ‘द कमिटी फॉर द वेलफेयर ऑफ द मेम्बर्स ऑफ द पुलिस फ़ोर्स इन यूपी’ नाम की एक संस्था अराजपत्रित अधिकारियों के लिए आईपीएस अफसरों द्वारा 1961 में रजिस्टर्ड कराई गयी थी. इसकी मेंबर केवल आईपीएस अधिकारी और उनकी पत्नियां ही हो सकती थीं. 1961 से अब तक सिपाही से लेकर इन्स्पेक्टर की ओर से इस संस्था में कोई सदस्य नहीं है. अधिकारियों ने अपने इन अधीनस्थों से कोई कंसेंट भी नहीं लिया. इसके बावजूद बिना पुलिसकर्मियों के सहमति के इन लोगों की तनख्वाह से पैसा सन 1961 से लगातार काट रहे हैं. शिक्षा, रक्षा सहित कुल कई मदों में 25 रुपये काटा जाता है. यूपी पुलिस में करीब साढ़े तीन लाख कर्मचारी हैं. 25 रूपये के हिसाब से यह रकम 87 लाख होती है और सालाना यह दस करोड़ से ऊपर होती है. ये पैसा कहां जाता है यही सवाल बृजेंद्र ने उठाया है.
इसके अलावा पूर्व डीजी श्रीराम अरुण के समय में बीमा के नाम पर नवम्बर-दिसम्बर में पुलिस वालों की तनख्वाह से 340 रूपये काटा जाने लगा. जबकि इसका कोई फायदा पुलिस वालों को नहीं मिलता था. इसके खिलाफ भी बृजेंद्र ने आवाज उठाई. इस मद में भी सालाना एक अरब से ज्यादा की घालमेल होता है. कई और मामलों में पैसा खा जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं बृजेंद्र. इनका साथ इनके साथी भले ही खुलकर नहीं दे रहे हों, पर मन से वे भी इस लड़ाई में बृजेंद्र के साथ हैं. बृजेंद्र बताते हैं कि सरकार लावारिश लाशों के क्रिया कर्म के लिए पन्द्रह सौ रूपये देती है. पर अधिकारी लावारिश लाशों के लिए एक रूपये नहीं देते हैं. सिपाही जैसे तैसे इन लाशों का क्रिया कर्म करते हैं. लाशों के रूपये भी ये अधिकारी खा जाते हैं. बृजेंद्र कहते हैं कि अगर जो इनकी बात ना माने या इसके लिए पैसा मांगे तो फिर उसके सिर पर सस्पेंशन और ट्रांसफर की तलवार लटक जाती है. और भी कई बेईमानियां हैं जो ईमानदारी से कर ली जाती हैं.
बृजेंद्र बताते हैं, ‘फरवरी 1989 में नेशनल पुलिस कमीशन ने लिखा था हर राज्य में अधिकारियों और कर्मचारियों की अलग-अलग एसोसिएशन चल रही है लेकिन यूपी में सिपाहियों के लिए ऐसा कोई एसोसिएशन नहीं है. मैंने 1993 में हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी. जिसका निर्णय मेरे पक्ष में हुआ था. निर्णय में कहा गया कि पुलिस महानिदेशक यह निश्चित करें कि नियमानुसार रजिस्ट्रार सोसायटी के पास सिपाहियों का संगठन रजिस्टर्ड हो. उस समय एडीजीपी श्रीराम अरुण थे. उन्होंने कहा कि इस तरह से बृजेंद्र पुलिस में विद्रोह करा सकते हैं. 2008 में आईपीएस शैलेन्द्र सागर, जो उस समय आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे, ने 3 अगस्त 2008 को अपने लेटर में सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया था कि आरक्षी समन्वय समिति बनाकर बृजेंद्र के कार्यों का विरोध कर शासन को विश्वास में लेना हमारी जीत है. क्योंकि समस्त आईपीएस की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.’
इसी दांव पर लगी प्रतिष्ठा के खिलाफ खड़े हैं बृजेंद्र. अब खुद को जनता की बजाय सरकार के अधिकारी कहलवाने यूपी के नौकरशाह इतने संवेदनशील नहीं है कि वे सच को सच मान लें. सत्ता चाहे किसी की हो उसके साथ चिपक जाते हैं. जिला पंचायत और ब्लाक प्रमुखों के चुनाव को लेकर नौकरशाहों पर चिल्लाने वाले मुलायम सिंह की नजर में भी कभी यही नौकरशाही सही थी, जैसे आज मायावती की नजर में हैं. ये नेता वही देखते हैं जो ये नौकरशाह दिखाते हैं. बृजेंद्र कहते हैं कि निलंबन की यह कार्रवाई अधिकारियों की बौखलाहट दिखाती है. मुझे निलंबित कर यह डराना चाहते हैं लेकिन मैं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा जब तक कि मेरा मिशन पूरा नहीं हो जाता. वे कहते हैं कि सत्येन्द्र दुबे हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि विभाग के घोटालों और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वालों पर किसी भी प्रकार की विभागीय कार्रवाई नहीं की जाएगी. इन्हें प्रोटेक्शन दिया जाएगा, पर यहां सब कुछ इस इसके उलट हो रहा है. पर यह लड़ाई हर हाल में जारी रहेगी.












raju
December 30, 2010 at 3:28 pm
यह सच है। पुलिस अधिकारी ही सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं। कांस्टेबल बेचारा तो शोषित और मजलूम है। बस अधिकारियों को देखकर दातुन-बैंगन वाले से दो-चार रुपये वूसलता है। पुलिस अधिकारी भ्रष्टाचार का दूसरा पर्याय हैा। हर बात में पैसा मांगते हैं। भिखमंगे हैं। अधिकांश। भ्रष्टाचार की गंगा पुलिस के बड़े अधिकारियों से ही शुरु होती है। आईएएस और आईपीएस अफसरों से भी। ये सुधरेंगे ऐसा लगता भी नहीं। बेचारी आम जनता पिस रही है। अगर पुलिस वालों को बिल्कुल हटा दिया जाए, मुझे नहीं लगता अपराध के ग्राफ में कोई तेजी आएगी। बहुत से क्षेत्रों में तो यह कम हो जाएगी। गधे हैं सब के सब। निठल्ले और बेवकूफ।
Deepak Gambhir..
December 30, 2010 at 6:00 pm
Yashwant ji Bijendra ki is awaaz ko P7 ne abhi kuch din pehle hi uthaya tha…! Aur poore din khabar chlane ke baad sari IPS lobby iske khilaaf ho gayi…Humne dikhaya tha ki kis prakar aaj ke kuch police adhikaari poori tarah corrupt ho chuke hain….Aur hum aage bhi Bijendra ke sath usko nyay dilane ke liye uska sath dete raehnge…! yeh muhim yahi nahi khatam hone wali…Pehle to media hi police ke khilaaf abhiyaan chalati thi lekn ab khud police mehkame ke ek sipahi ne apni awaaz ko uthaya jiska usko khamiyaja bhugtana pada…!