गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष लालकिले में हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित किए जाने वाले ऐतिहासिक कवि सम्मेलन में श्रोता काव्य के सभी रंगों से सरोबार हुए. पाकिस्तान पर शब्द बाणों की भरपूर वर्षा हुई तो हंसी के हंसगुल्लों भी खूब बरसे. सांप्रदायिक सौहार्द तो जैसे उमड़-उमड़ कर आया. हिन्दी कविता के जीवंत स्तंभ गोपाल दास नीरज ने जबरदस्त समां बांधा-
मेरे दुख दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा,
मैं रहूँ भूखा तो तुझ से भी न खाया जाए,
आग बहती है यहां गंगा में, झेलम में भी,
कोई बतलाए, कहां जा के नहाया जाए,
गीत गुमसुम है, गजल चुप है, रूबाई है दुखी,
ऐसे माहौल में नीरज को बुलाया जाए.
धर्मनिरपेक्षता और आपसी भाईचारे, प्रेम की भावनाओं को अनेक कवियों ने शब्दों में पिरोया, नीरज के ही गीत हाय कैसा मौसम आया की एक बानगी-
कौन है हिन्दू, कौन मुसलमां, कौन है सिख, ईसाई रे
एक तरह से होती है सबकी यहां बिदाई रे.
कर्नल वीपी सिंह के शब्दों में भी फौज के जोर एवं रुतबे का एहसास हुआ-
आधे हृदय से मित्रता-शत्रुता व्यर्थ है, जो भी हो, भरपूर होना चाहिए.
या तो शत्रु शांति का सम्मान करे,
नहीं तो गर्व उसका चकनाचूर होना चाहिए,
मुसलमानों की देशभक्ति पर उठने वाले सवालों का भी कर्नल ने खूब जवाब दिया-
ये तुम्हें किसने कहा कि तुम वतन की शान नहीं
देश भक्ति तो जज्बा है, इम्तहान नहीं.

जैनेंद्र कर्दम ने भी अपने पुराने शेरों से खूब तालियां बटोरी तो पहली बार देश से सबसे बड़े मंच पर पहली बार काव्यपाठ करने आईं प्रसिद्ध मीडियाकर्मी डा. वर्तिका नंदा की महिलाओं का दर्द बयां करती ‘मरजानी’ श्रोताओं के सिर के ऊपर से गुजर गई. तीन बार हूटिंग के बावजूद वर्तिका की पंक्तियां गहरी छाप छोड़ गई-
जाते हुए साल से पठार उधार मांग लिए है, क्योंकि पठार रहेंगे तो प्रार्थनाएं भी रहेंगी.
दनकौर (नोएडा) से पहुंचे पवन दीक्षित अपने विचारों से युवाओं के दिल में उतर गए-
उड़ने से मुझे रोकता सैयाद क्या भला,
मैं ही तो कैद था, मेरा एहसास तो नहीं,
मां रोज जेब देखे है बेरोजगार बेटे की,
बेटे की जेब में कहीं सल्फास तो नहीं.
बेहतरीन मंच संचालन करते हुए पूर्व सांसद व वरिष्ठ कवि उदय प्रताप सिंह की बीच-बीच में सुनाई गई पंक्तियां भी गहरी पहुंची जैसे-
मैं कलम और तलवार संभाले हूँ दोनों, सोच रहा हूँ किस से इतिहास लिखूं.
अकबर इलाहबादी का एक शेर उन्होंने आजतक के युवा पत्रकार आलोक श्रीवास्तव की खुसरो और कबीर से प्रेरित पंक्तियों पर सुनाया-
हिंदू और उर्दू में बस फर्क है इतना- वो ख्वाब देखते हैं, हम देखते हैं सपना.
आलोक ने अपनी कविता में सखी के मन में पिया के प्रति दर्द का उल्लेख किया तो महंगाई पर भी प्रहार किया-
उतर जाए है छाती में, जिगरवा काट डाले है,
मुई महंगाई ऐसी है, छुरी, बरछी, कटारी क्या.
आलोक के व्यवस्था पर चोट करते हुए पुराने शेर ने भी खूब तालियां बटोरी-
ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में,
वैसे भी तो जंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में,
वरिष्ठ पत्रकार व हरियाणा की मिट्टी से जुड़े महेंद्र शर्मा ने भी महंगाई और आधुनिक प्रेम का संगम पेश किया तो मंजर भोपाली ने ‘गंगा का पानी’ से भावविभोर किया-
तुम भी पियो, हम भी पिए, रब की मेहरबानी,
प्यार के कटोरे में गंगा का पानी,
मांगने पर भी मंजर ने बहुत खूब अर्थ पिरोए,
मांगने वाले से कासा (भिक्षा पात्र) नहीं मांगा करते,
बेटियों के लिए भी हाथ उठाओ मंजर
अल्ला से सिर्फ बेटे नहीं मांगा करते.
नीलू मेघ ने भी बेटियों पर स्नेह से सरोबार प्रस्तुति दी तो गरीब और रोटी के प्रति उदारता का भाव दर्शाया-
भगवान मेरे हिस्से की उसको कमाई दे-जिस को शरद के चांद में रोटी दिखाई दे.
भाषा मंत्री किरण वालिया ने सभी कवियों को सम्मानित किया तो हिन्दी अकादमी, दिल्ली के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने भी सब कवियों का स्वागत व धन्यवाद किया. जम्बो जेट कवि सम्मेलन में देश के 30 से ज्यादा वरिष्ठ व सम्मानित कवियों ने कड़क़ती ठंड में अल सुबह तक श्रोताओं को बैठने पर मजबूर कर दिया.












ashish soni
January 20, 2011 at 6:08 pm
kavi sammelan to logo me sanchar ka kam karta he par iska sahi prach nahe lo pata he . jis se aam logo tak ye nahi ja pata he .prayas ho ki ye jan vani ka kaam bhi kare >
rameshchandra kankarwal betma
January 20, 2011 at 11:34 am
bahut shandar h yah des, es des ke kavi or unki rachnaye.kahte h jaha na pahuche ravi vaha pahuche kavi.jai ho.jhapanah tusi great ho.