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भड़ास पर प्रकाशित ढिबरी चैनल अब किताब की शक्‍ल में

ढिबरी चैनलमीडिया और टेलीविजन चैनलों की की अंदरुनी सच्चाइयों को अधार बना कर लिखी गयी व्यंग्य रचनायें और कहानियां अब ”ढिबरी चैनल”  के नाम से पुस्तक रूप में उपलब्ध होने वाली है। इस पुस्तक में प्रकाशित कई रचनायें भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हो चुकी हैं,  जिनमें से अनेक अत्यंत चर्चित हुयी।

ढिबरी चैनलमीडिया और टेलीविजन चैनलों की की अंदरुनी सच्चाइयों को अधार बना कर लिखी गयी व्यंग्य रचनायें और कहानियां अब ”ढिबरी चैनल”  के नाम से पुस्तक रूप में उपलब्ध होने वाली है। इस पुस्तक में प्रकाशित कई रचनायें भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हो चुकी हैं,  जिनमें से अनेक अत्यंत चर्चित हुयी।

इंडियाईबुक्स ने इस पुस्तक का डिजिटल संस्करण प्रकाशित किया है जिसे http://indiaebooks.com/userpages/detail.aspx?bookId=1756# से डाउनलोड किया जा सकता है। शीघ्र ही इसका प्रिंट संस्करण बाजार में उपलब्ध होने वाला है। इस पुस्तक में 22 रचनायें हैं जिनमें ज्यादातर मीडिया एवं टेलीविजन चैनलों पर आधारित है।

इस पुस्तक के लेखक विनोद विप्लव इस बारे में बताते हैं, ”आम तौर पर आम लोग मीडिया एवं टेलीविजन चैनलों की अंदरुनी सच्चाइयों एवं उनमें काम करने वाले लोगों की समस्याओं से ढिबरी चैनीकम वाकिफ होते हैं। टेलीविजन चैनलों में काम-काज के माहौल, भीषण प्रतिस्पर्धा, व्यवसाय और बाजार और टीआरपी के दवाब, चैनलों में काम करने वालों में अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा एवं अनिश्चितता की स्थिति, महिला कर्मियों के साथ रोज-ब-रोज होने वाले सलूक आदि ऐसे कई मुद्दे हैं जो आम दर्शकों की आंखों से ओझल रहते हैं या आम लोग इनके बारे में ज्यादा नहीं सोचते। यहां तक कि सरकार, राजनीतिक दल एवं सामाजिक संगठनों का भी ध्यान इस तरफ कम जाता है, जबकि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनके कारण टेलीविजन चैनलों से प्रसारित होने वाली समाग्रियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और इसलिये इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह भी देखा गया है कि टेलीविजन चैनलों की अंदरुनी दुनिया की सच्चाइयों से अनजान लड़के-लड़कियां ढेर सारी हसरतों एवं उम्मीदों के साथ इस क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं,  लेकिन वे बाद में जब उन्हें यहां की सच्चाइयों से रूबरू होते हैं तो कई बार उन्हें निराशा हाथ लगती है। मीडिया और खास तौर पर टेलीविजन चैनलों की इन सच्चाइयों को आधार बना कर ढिबरी चैनल में शामिल रचनायें लिखी गयी है।”

इस पुस्तक में जो रचनायें शामिल है उनमें कुछ प्रमुख है – भूत चैनल, ढिबरी चैनल का घोषणा पत्र,  ढिबरी चैनल में भर्ती अभियान, ढिबरी चैनल प्रमुख के लिये अर्जी, मीडिया मंदी कथायें,  सत्यवादी क्रांति, खबरिया पार्टी आदि। इन पुस्तक में कई रचनायें प्रमुख अखबारों में प्रकाशित हो चुकी है। संवाद समिति यूनीवार्ता में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रहे विनोद विप्लव ने कहा कि आज के समय में मीडिया खास तौर पर टेलीविजन चैनल सामाजिक विकास के अत्यंत सशक्त माध्यम बना है,  लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर अखबार और टेलीविजन चैनल आमदनी, प्रसार संख्या और टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी भूमिका से भटक गये हैं और ढिबरी चैनल में शामिल रचनायें उसी भटकाव को उजागर करती है।

वह कहते हैं कि ढिबरी चैनल में शामिल कुछ व्यंग्य रचनायें एवं कहानियां इंटरनेट के जरिये खास तौर पर भड़ास4मीडिया के माध्यम से लोगों के सामने आ चुकी हैं और इन्हें पढ़ने वालों से जो प्रतिक्रियायें मिलीं, वे अभूतपूर्व हैं। इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि चैनलों में काम करने वाले लोग बाजारवाद के किस भयानक दवाब में काम करते हैं और उनके मन में इसे लेकर किस तरह का आक्रोश है। यही नहीं खुद टेलीविजन चैनलों में काम करने वाले लोग इस स्थिति से काफी असंतुष्ट हैं और वे चाहते हैं कि स्थिति बदले और टेलीविजन चैनल मुनाफा कमाने का माध्यम बनने के बजाय समाजिक बदलाव का माध्यम बने।

विनोद विप्लव कहते हैं कि उन्होंने भारत में निजी टेलीविजन चैनलों की शुरुआत होने के समय से ही टेलीविजन चैनलों की अंदरुनी स्थितियों से वाकिफ रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने पिछले कई वर्षों से इन चैनलों पर प्रसारित सामग्रियों, टेलीविज चैनलों की भाषा एवं कंटेंट में किस तरह से बदलाव आया उसका भी गहराई से अध्ययन किया और महसूस किया है। कई लोग उन पर आरोप लगाते हैं कि उनका टेलीविजन चैनलों से खास दुराग्रह है,  लेकिन वह कहते हैं कि दरअसल ढिबरी चैनल लिखने की मंशा चैनलों में शीर्ष पदों पर विराजमान लोगों की आलोचना करने की नहीं है,  बल्कि मेरी कोशिश यह है कि विभिन्न कारणों से टेलीविजन चैनलों और काफी हद तक अखबारों में जो स्थितियां बन गयी हैं या बना दी गयी हैं और आज के दौर में अखबार और खास तौर पर टेलीविजन चैनल जो भूमिका निभा रहे हैं,  उसे लेकर समाज में चिंतन हो और मौजूदा सूरते हाल में बदलाव हो। हालांकि कई टेलीविजन चैनल अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं,  लेकिन अनेक टेलीविजन चैनल, जो देश और समाज के विकास एवं लोगों के जीवन स्तर में बदलाव लाने का अत्यंत कारगर माध्यम हो सकते थे, उन्हें काफी हद तक समाज के पतन का माध्यम बना दिया गया है।

विनोद विप्लव समाचार एजेंसी यूनीवार्ता में वरिष्ठ संवाददाता हैं। वह पत्रकार के अलावा कहानीकार एवं व्यंग्यकार हैं। विनोद विप्‍लव इससे पूर्व उन्होंने मोहम्मद रफी की जीवनी ”मेरी आवाज सुनो” लिखी जो काफी लोकप्रिय हुयी। उनका कहानी संग्रह ”विभव दा अंगूठा”  दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हो चुका है। सिनेमा, स्वास्थ्य एवं विज्ञान पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुयी है। ढिबरी चैनल पर विशेष जानकारी के लिये उनसे उनके मोबाइल 09868793203 अथवा उनके ईमेल [email protected] के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

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0 Comments

  1. rajkumar sahu, janjgir chhattisgarh

    June 11, 2011 at 8:31 am

    badhaai, viplav ji.

  2. कमल शर्मा

    June 11, 2011 at 3:41 pm

    बधाई।

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