अदालतों के ईमानदार जज भी अब यंग एंग्री मैन टाइप लैंग्वेज इस्तेमाल करने लगे हैं. अभी तक जनता कहती रही है कि नेता साले चोर हैं, फलां नेता हरामी है, फलां मंत्री घुसखोर है, फलां पदाधिकारी लौंडियाबाज है, फलां मुख्यमंत्री घोटालेबाज है… आदि इत्यादि. पर अब जज साहब लोग भी गुस्साने लगे हैं. दरअसल जजों की गुस्सैल टिप्पणियां वो पैमाना हैं जिससे पता चलता है कि अपन लोग का देश किस तरफ जा रहा है और भविष्य में क्या कुछ होने वाला है.
सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने विलासराव देशमुख के बारे में टिप्पणी की कि देशमुख जैसों को मंत्री बनाना बेशर्मी है. ये वही विलासराव देशमुख हैं जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और अब सोनिया की कृपापात्र होने की वजह से केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्रालय देख रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी कई अखबारों में छपी है. अगर आपने ध्यान न दिया हो तो खबर एक बार फिर पढ़ लें….
”मुंबई में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलहाल केंद्र में मंत्री विलासराव देशमुख को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विपरीत टिप्पणी की। शीर्ष अदालत के मुताबिक, ‘ऐसे लोगों को मंत्री बनाना कोई गौरवशाली नहीं, बल्कि बेशर्मी भरा काम है।’ मुंबई में एक सेमिनार के दौरान शनिवार को शीर्ष अदालत के जस्टिस एके गांगुली और जस्टिस जीएस सिंघवी ने कहा, ‘यह बहुत दुखद और शर्मनाक है। आखिर कैसे सरकार ऐसे लोगों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे देती है।’ देशमुख इस वक्त ग्रामीण विकास मंत्रालय देख रहे हैं। जजों ने देशमुख की इस बात के लिए निंदा की कि उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर एक विधायक की अनुचित तरफदारी की। जस्टिस गांगुली ने रविवार को फिर कहा, ‘मैं जो चाहता था, कह दिया। उसका मैं खंडन नहीं कर रहा हूं।’
यह पहली बार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तल्ख टिप्पणी आई है. इसके पहले सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘थॉमस की नियुक्ति में गड़बडिय़ां इसलिए हुईं क्योंकि चयन समिति ने कुछ खास तथ्यों जैसे पामोलिन आयात घोटाले में दायर चार्जशीट की अनदेखी की।’
राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट का कहना था : ‘जब किसी काम में (कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में) 70 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हों, तब इस बात से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।’
इन टिप्पणियों के बावजूद न तो केंद्र सरकार की सेहत पर असर पड़ रहा है, न सोनिया गांधी की, न राहुल गांधी की, न मनमोहन सिंह की और न टिप्पणी पाने-खाने वाले विलासराव देशमुख की. जय हो हमार द ग्रेट इंडियन लोकतंत्र.












madan kumar tiwary
February 10, 2011 at 3:11 am
थेथर हो चुके हैं नेतागण । उनको अब लतिया के भगाना पडेगा ।
kshitij
February 11, 2011 at 4:31 pm
ab yeh baat kisi se chhupi nahin hai ki desh ke kai netaon ne janta ki kamai ka paisa loot kar swiss banks mein rakha hai. three cheers to judge.