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‘महामहिम’ लिखा तो नौकरी गई!

प्रति, सचिव, भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्ली, महोदय, जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाईटी (जेयूसीएस) की तरफ से हम आपका ध्यान पिछले दिनों हिंदी दैनिक ‘पत्रिका’ के जबलपुर संस्करण से युवा पत्रकार दीपक को बिना किसी नोटिस के संस्थान से बाहर निकले जाने की घटना के तरफ आकृष्ट करना चाहते हैं। पत्रिका में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में दीपक पिछले ४ महीनों से कार्य कर रहे थे। संस्थान  में उन्हें रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन इससे इतर उनसे रोजाना के अख़बार की समीक्षा भी कराई जाती थी। संस्थान में उनसे प्रतिदिन 14- 15 घंटे काम लिया जाता था। एक प्रशिक्षु के रूप में न तो उन्हें नियमानुसार वेतनमान दिया जाता था और न ही समीक्षा जैसे अतिरिक्त काम के लिए कोई मानदेय दिया जाता था। दीपक ने एक खबर बनाने के दौरान राज्यपाल के नाम से पहले ‘महामहिम’ लिख दिया। इस बात को लेकर स्थानीय सम्पादक ने उन्हें अगले दिन से न आने और अपना हिसाब कर लेने को कह दिया।

प्रति, सचिव, भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्ली, महोदय, जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाईटी (जेयूसीएस) की तरफ से हम आपका ध्यान पिछले दिनों हिंदी दैनिक ‘पत्रिका’ के जबलपुर संस्करण से युवा पत्रकार दीपक को बिना किसी नोटिस के संस्थान से बाहर निकले जाने की घटना के तरफ आकृष्ट करना चाहते हैं। पत्रिका में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में दीपक पिछले ४ महीनों से कार्य कर रहे थे। संस्थान  में उन्हें रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन इससे इतर उनसे रोजाना के अख़बार की समीक्षा भी कराई जाती थी। संस्थान में उनसे प्रतिदिन 14- 15 घंटे काम लिया जाता था। एक प्रशिक्षु के रूप में न तो उन्हें नियमानुसार वेतनमान दिया जाता था और न ही समीक्षा जैसे अतिरिक्त काम के लिए कोई मानदेय दिया जाता था। दीपक ने एक खबर बनाने के दौरान राज्यपाल के नाम से पहले ‘महामहिम’ लिख दिया। इस बात को लेकर स्थानीय सम्पादक ने उन्हें अगले दिन से न आने और अपना हिसाब कर लेने को कह दिया।

गौरतलब है कि उसी अख़बार में रोजाना ऐसी दर्जनों शाब्दिक गलतियाँ देखने को मिलती हैं। ऐसे में केवल एक प्रशिक्षु को, जो वहां सीखने के लिए गया था, जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं लगता है। विभिन्न समाचार संस्थानों में दीपक जैसे सैकड़ों युवा-प्रशिक्षु पत्रकारों से 12-14 घंटे काम लिया जा रहा है। इसके बदले उन्हें जो वेतनमान या मानदेय दिया जाता है वह उनकी मेहनत का आधा भी नहीं होता है। साथ ही इन संस्थानों में श्रम कानूनों के उल्लंघन का खेल लम्बे समय से चल रहा है। देर रात तक कार्य करने वाले कर्मचारियों को न तो कोई रात्रि भत्ता दिया जाता है, न ही ऐसे कर्मचारियों को दी जाने वाली सुविधाएं ही दी जाती हैं। कई मीडिया संस्थानों में रिपोर्टिंग का कार्य करने वाले प्रशिक्षुओं को यात्रा और फोन भत्ता भी नहीं दिया जाता है। ऐसे में उन्हें अपने वेतन से ही सारा खर्च करना पड़ता है।

पत्रकारिता का प्रशिक्षण पाने के बाद बड़ी संख्या में युवा इन मीडिया संस्थानों में नौकरियों के लिए चक्कर कटते हैं। जो संस्थान इन्हें अपने यहाँ काम पर रखते हैं, वे कर्मचारी की बजाय एक ऐसे नौकर के रूप में रखते हैं,जिसका संस्थान के रिकार्ड में कोई ब्यौरा नहीं होता है। ऐसा करके मीडिया संस्थान न केवल इन युवाओं न्यूनतम मानदेय से वंचित रखते हैं, बल्कि गैर कानूनी रूप से रोजाना अधिक समय तक काम लेते हैं। ऐसे में संगठन की प्रेस परिषद से मांग है कि-

1- प्रशिक्षु पत्रकार दीपक के मामले को संज्ञान में लेकर इस मामले की जांच कराए और बिना किसी नोटिस के एक पत्रकार को नौकरी से निकलने के मामले में अख़बार के संपादक, स्थानीय संपादक और प्रबंधक के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करें।

2- मीडिया संस्थानों में प्रशिक्षु पत्रकारों की नियुक्तियों के सम्बन्ध में साफ-सुथरी नीति बनाई जाए। परिषद् यह भी सुनिश्चित करे कि ऐसी सभी नियुक्तियों के मापदंड और बर्खास्तगी के कारणों को सार्वजनिक किये जाएं।

3- मीडिया संस्थानों में श्रम कानूनों के खुलेआम उल्लंघन के मामलों की भी जाँच कराई जाए। साथ ही अन्य समाचार संस्थानों में कार्यरत प्रशिक्षु-अंशकालिक-श्रमजीवी पत्रकारों के वेतन, सुविधावों और कार्य की परिस्थितियों का आकलन कराया जाए।

4- मीडिया संस्थानों में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली के उपाय किया जाएं।

द्वारा-

जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाईटी (जेयूसीएस)

नई दिल्ली

प्रति सम्प्रेषित-

1. भुवनेश जैन, सम्पादक, पत्रिका

2. सिद्धार्थ भट्ट, स्थानीय सम्पादक, पत्रिका, जबलपुर

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0 Comments

  1. n m ,

    June 1, 2010 at 8:11 pm

    vkjvk[b]cv[/b]

  2. sagarbandhu

    June 1, 2010 at 1:27 pm

    trainee reporter ke sath ghore anyay hua hai. aisi galati to senior bhi kar jate hai. darasal resident editor ko trainning dene ki jarurat hai ki kis galati par kya nirnay lena chahiye. kripaya aise resident editor ka nam jarur prakashi kare, taki logo ko pata chale to usaki bhi log kundali talasege ki wo kase sampadak bana hai. is tarah ki galati par logo ki naukari jane lage to akhabar me naukakri karani mushkil ho jayegi. waise bhi akhabaro me vidwan log hi kam karate hai.

  3. anand soni

    June 1, 2010 at 11:07 am

    अगर यह सही है तो संपादक को अपनी गलती सुधारनी चाहिए। क्योंकि जितना हमे पता है ये वही संपादक है जो पहले राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण के प्रभारी थे तथा किन्हीं कारणोवश जब वहां इनकी पिटाई हो गई थी तो इनका तबादला कर दिया गया था।

  4. sahil

    June 3, 2010 at 5:29 am

    aisi galtiyan karne walon ke liye media me koi jagah nhi..

  5. sahil

    June 3, 2010 at 5:30 am

    sahi hua

  6. sanyam

    June 4, 2010 at 11:00 am

    sahil ji keh rahe hain ki sahi hua, main unko yaad dilana chahoonga ki reporter k upar sub editor aur editor hota hai, unki bhi jimmedari banti hai, unko bhi nikalwayyiye na

  7. Ram K

    June 5, 2010 at 11:07 am

    To,

    Patrika,

    “बदला न अपने आप को जो थे वही रहे

    मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे!”

    To,

    Dear Deepak,

    “दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम

    थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे!”
    >:(:-*[b][/b][u][/u]

  8. ved kumar maurya

    June 6, 2010 at 6:55 am

    ARE BHAIYA ALL IS NOT WELL, YE GALAT HAI AUR EDITOR KO BATANA CHAHIYE KI AISA KYO

  9. Ravi Rajput Sirsa

    June 6, 2010 at 5:41 pm

    Ptrkarita me is Prakar Se Agar Shoshn hota rha to………. Yuva Patrakar Patrkarita se Dur Bhagege………… Jesa hall Baki Teen Stambho ka ho rha he Chotha Satambh Bhi Usi Rah par Chal pda he………..

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