वर्ष 2008 वाली मंदी सभी को याद होगी. उस दुखद दौर ने भारतीय मीडिया सेक्टर के हजारों लोगों को सड़क पर ला दिया. ज्यादातर मीडिया हाउसों ने पागलों की तरह अपने यहां से इंप्लाइज निकाले और नए प्रोजेक्ट्स को पोस्टपोन या कैंसिल कर दिया. वही दौर फिर दुहराने के आसार हैं. इस बारे में विभिन्न मीडिया माध्यमों, समाचार एजेंसियों, न्यूज चैनलों ने खबरों का प्रसारण शुरू कर दिया है. नीचे हम तीन-चार खबरें दे रहे हैं, जिसके आधार पर आप मंदी की आहट को भांप सकते हैं.
आने वाले संकट से निपटने के लिए आपको तैयारी रखनी होगी. जो आगे की नहीं सोचता, वह बाद में पश्चाताप करता है. भड़ास4मीडिया मीडिया के सभी साथियों को आगाह करता है कि वह पैसे कम से कम खर्च करें, बचत पर जोर दें, नौकरी जाने की स्थिति में जीवनयापन के क्या विकल्प हो सकते हैं, इसके बारे में सोचना शुरू कर दें. और नौकरी के साथ-साथ कोई स्वउद्यम भी शुरू करने के बारे में सोचें.
छोटी छोटी कोशिशें ही बड़ी रूप लेती हैं. छोटी छोटी कमाई और छोटी बचत ही गाढ़े वक्त में काम आती है. ये सारी बातें डराने के लिए कतई नहीं कही जा रही हैं. हम सभी उम्मीद करें कि आने वाला संकट टल जाए. मंदी की नौबत न आए. लेकिन जो तथ्य फिलहाल सामने आ रहे हैं उससे कैसे इनकार किया जा सकता है. लीजिए, मंदी की आहट वाली खबरों को पढ़ें और खुद के बारे में सोचें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
मंदी गहराने के 7 संकेत, हालात 2008 जैसे होने की आशंका
नई दिल्ली। आर्थिक मंदी की वजह से आपकी नौकरी एक बार फिर खतरे में है। आपकी जेब पर फिर खतरा मंडरा रहा है। क्योंकि देश में विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई है। मंगलवार को सरकार ने विकास दर का जो आंकड़ा जारी किया उसमें एक फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। सिवाय कृषि क्षेत्र के बाकी तमाम सेक्टर्स में विकास दर गिरती जा रही है। मतलब साफ है साल 2008 जैसे हालात कभी भी बन सकते हैं।
पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर 1 फीसदी गिरकर 7.7 फीसदी पर आ गई है। जबकि पिछले साल इसी तिमाही में विकास दर थी 8.8 फीसदी। ये वही आंकड़ा है जिसके बारे में सरकार लगातार दावा कर रही थी कि विकास दर 8 फीसदी के ऊपर ही रहेगी। जानकारों की मानें तो देश का कोई भी सेक्टर उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
औद्योगिक विकास दर जहां पिछले साल 9.1 फीसदी थी। इस साल ये गिरकर 5.1 फीसदी पर रही। खादान और खनिज उद्योग की विकास दर पिछले साल 7.4 फीसदी थी, ये अब घटकर 1.8 पर आ चुकी है। निर्माण उद्योग की विकास दर पिछले साल 10.6 फीसदी थी, ये भी घटकर 7.2 फीसदी पर आ गई है। बीमा, रियल इस्टेट की विकास दर 9.8 से गिरकर 9.1 पर आ गई है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की मानें तो हमें आने वाले वक्त के लिए कमर कस लेनी होगी।
अर्थव्यवस्था में कैसे आंकड़े एक दूसरे से जुड़े होते हैं। कैसे एक सिरा दूसरे से जुड़ा होता है। इसे समझने की कोशिश करिए। आपको इस वक्त सबसे ज्यादा परेशान कर रही है महंगाई। इसलिए इसी से शुरू करते हैं। पिछले कुछ महीनों से महंगाई लगातार बढ़ रही है। जानकारों की मानें तो इस साल अक्टूबर तक वो 9 फीसदी से ज्यादा ही रहेगी। महंगाई दर को बढ़ने से रोकने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी ही होगी। ब्याज दर बढ़ाने का असर होगा कि लोग खर्च कम कर देंगे। अर्थव्यवस्था में पैसा कम लगेगा, देश की विकास दर कम हो जाएगी। अर्थव्यवस्था में पैसा कम आएगा तो नई कंपनियां नहीं खुलेंगी और पुरानी बंद होने लगेंगी। ऐसे में नौकरी जाने का खतरा बढ़ेगा। नई नौकरी की उम्मीद खत्म होगी। नौकरी जाने और नई नौकरी ना मिलने पर लोगों को बचत खाते से खर्च करना पड़ेगा। लेकिन बचत के पैसे के सामने महंगाई फिर सामने आकर खड़ी हो जाएगी।
विकास दर गिरने का बड़ा असर रिजर्व बैंक की नीतियों पर भी पड़ने जा रहा है। पिछले 16 महीने में 11 बार रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा चुका है। अब हर बड़ा जानकार यही कह रहा है कि सितंबर में भी ब्याज दरें बढ़ाने का फैसला कोई नहीं टाल सकता। यानि तैयार हो जाइए घर कर्ज पर ज्यादा किश्त देने के लिए। महंगाई की मार से जूझ रहे आम आदमी पर एक और मार पड़ने ही वाली है। अगर हालात नहीं संभले तो देश का आम आदमी एक बार फिर मंदी के चक्रव्यूह में फंसने जा रहा है।
यही नहीं, पिछले कुछ दिनों से शेयर बाजार लगातार गिरता डगमगाता रहा है। जाहिर है अर्थव्यवस्था लगातार ऐसे हालात की ओर इशारा कर रही है जो उसे आर्थिक मंदी की ओर ले जा रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में चोट खाने के बाद विदेशी निवेशक अब भारत में भी पैसा लगाने से घबरा रहे हैं। मंदी की आहट के 7 संकेतों पर गौर करिए।
पहला संकेत (ऑटो सेक्टर धड़ाम)
पुरानी कहावत है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का हाल उसके ऑटो सेक्टर से जाना जा सकता है। गौरतलब है कि कारों की बिक्री पिछले 30 महीनों में अचानक पहली बार बुरी तरह गिरी है। पिछले कई सालों से देश का ऑटो सेक्टर दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था। लेकिन जुलाई के महीने में इसमें 15 फीसदी की गिरावट आई है। वजह माना जा रहा है महंगी ब्याज दरों को। तेल की कीमतों में उछाल को और उलझाने वाली सरकारी नीतियां को।
दूसरा संकेत (विदेशी निवेश में गिरावट)
इस साल भारत में विदेशी निवेश गिरकर 23.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। विदेशी कंपनियों ने देश में पैसा लगाने से पहले सौ बार सोचना शुरू कर दिया है। हालांकि सरकार का दावा है कि साल अंत तक ये आंकड़ा बढ़कर 35 बिलियन डॉलर का हो जाएगा। लेकिन अमेरिका और यूरोप की बर्बाद हालत को देखते हुए ऐसा मुमकिन नहीं।
तीसरा संकेत (विदेशी संस्थागत निवेश में कमी)
विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस साल अब तक शेयर बाजार में सिर्फ 14 बिलियन डॉलर ही लगाया है। वो भी बाजार में पैसा लगाने से बच रहे हैं। जबकि पिछले साल इस वक्त तक 30 बिलियन डॉलर का निवेश हो चुका था। यानि आने वाले दिनों की आहट से विदेशी निवेशक भी बुरी तरह घबराए हुए हैं वो कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते।
चौथा संकेत (शेयर बाजार में लगातार गिरावट)
शेयर बाजार में किस तरह हड़कंप मचा है ये किसी से छिपा नहीं। पिछले एक साल में सेंसेक्स में 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। रुपया पिछले 7 महीने में सबसे कमजोर स्तर पर है और बीएसई में लिस्ट हुई कंपनियों में से 42 फीसदी अपने नतीजों में पिछड़ चुकी हैं।
पांचवां संकेत (बढ़ता वित्तीय घाटा)
सरकार भले लगातार दावा करे लेकिन वो अपना वित्तीय घाटा कम करने में नाकाम रही है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने साफ कह दिया है कि आने वाले दिनों में वित्तीय घाटा और बढ़ेगा। यानि सरकार जितना कमाएगी उससे कहीं ज्यादा खर्च करेगी। इस वक्त भारत का वित्तीय घाटा है 44.3 बिलियन डॉलर। माना जा रहा है कि अगले साल ये आंकड़ा बढ़कर 54 बिलियन डॉलर हो जाएगा। सरकार इस घाटे को कैसे कम करेगी। इसका जवाब बहुत मुश्किल है।
छठा संकेत (कंपनियों ने कम किए विज्ञापन)
देसी-विदेशी कंपनियों ने विज्ञापन पर अपना खर्च कम कर दिया है। विज्ञापन देने वाली देश की बड़ी कंपनियों में से एक प्रॉक्टर एंड गैंबल इस साल अपने विज्ञापन खर्च में 10 फीसदी की कटौती कर चुकी है। पिछली तिमाही में इस कंपनी ने विज्ञापन में 508 करोड़ रुपए खर्च किए। जबकि इस तिमाही में विज्ञापन खर्च घटाकर 450 करोड़ कर दिया गया है। ये आंकड़ा भी सिर्फ एक कंपनी का है।
सातवां संकेत (रियल इस्टेट सेक्टर में ठहराव)
जानकारों की मानें तो देश के रियल इस्टेट सेक्टर में जबरदस्त ठहराव आ चुका है। घर खरीदने और बनाने की कीमत बढ़ने। कर्ज लेने की दर ज्यादा और बिल्डरों के अड़ियल रुख के चलते रियल एस्टेट सेक्टर संकट में है। रही सही कसर अदालती फैसलों ने पूरी कर दी है। जानकारों की मानें तो भारत का रिएल इस्टेट का बुलबुला किसी भी वक्त फूट सकता है।
साभार : आईबीएन-7 न्यूज चैनल
खर्चे घटाओ, कर्ज कम करो, आ रही है मंदी!
नई दिल्ली। दुनिया एक बार फिर आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका से उठा मंदी का तूफान एक बार फिर अमेरिका के साथ-साथ कई देशों को परेशान कर सकता है। कल इसकी आहट पूरी दुनिया ने सुनी, जब एशिया, यूरोप और भारतीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट आ गई। बिकवाली के दबाव में सेंसेक्स 14 महीने के सबसे निचले स्तर पर चला गया। नतीजा ये कि बाजार ने सिर्फ एक दिन में 1 लाख 30 हजार करोड़ का नुकसान उठाया। एक वक्त हालत ये थी कि सेंसेक्स 17 हजार के भी नीचे आ गया। निफ्टी भी एक वक्त 52 हफ्ते के निचले स्तर पर आ गया।
साल 2008 की मंदी भारत के लोग आज भी भूले नहीं हैं, जब नौकरियां घटी थीं, छटनियां बढ़ी थीं और कंपनियां अपने खर्चों को कम करने पर मजबूर हो गई थीं। जानकार मानते हैं कि इस बार अगर मंदी आई, तो इसका रूप पहले से ज्यादा भयानक हो सकता है। भारत में ये खलबली अमेरिका और यूरोप के बाजार में मचे हड़कंप के चलते मची है। आंकड़ों की बाजीगरी से अलग आम आदमी के लिए बुरी खबर यही है कि एक बार फिर हम बड़े आर्थिक संकट में फंसने जा रहे हैं यानी फिर जाएगी नौकरी, फिर घटेगी तनख्वाह, फिर खर्चों में होगी जबरदस्त कटौती, फिर घर चलाना होगा मुश्किल, फिर खत्म हो जाएगी जमापूंजी।
2008 में आर्थिक मंदी की शुरुआत अमेरिका के लेहमैन ब्रदर्स के ढहने से हुई थी लेकिन इस बार खतरा अमेरिका के ही ढहने का है, दीवालिया होने का है। भले ओबामा कर्ज लेने की सीमा बढ़ाकर इस बार बच गए हों लेकिन हालात बता रहे हैं कि अमेरिका के पास ना वक्त बचा और ना मंदी से बचने का कोई तरीका। इसलिए बार-बार याद करिए वो दिन जब भारत में अमेरिका से चली मंदी की आंधी में लाखों लोग बर्बाद हो गए थे।
अक्टूबर 2008 के बाद सिर्फ 4 महीने में 7 लाख लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया यानि हर महीने कम से कम डेढ़ लाख लोगों की छुट्टी। महीने की औसत तनख्वाह 17 हजार से घटकर 15 हजार पर आ गई यानि जिसकी नौकरी बच गई उसे भी तनख्वाह का नुकसान उठाना पड़ा। 2011 में भी ऐसे संकट से ना गुजरना पड़े इसलिए अभी से संभल जाइए। सतर्क रहिए। कर्ज संकट ने अमेरिका को बर्बादी के कगार पर ला दिया है इसलिए आप खुद कर्ज से मुक्त होने की कोशिश कीजिए। खर्च घटाइए। अपनी चिंता कम कीजिए अपने परिवार और बच्चों की आर्थिक सुरक्षा के रास्ता बनाइये। ताकि अगर मंदी का ये घनघोर अंधेरा खुदा न खास्ता भारत में फैला तो आप तबाह होने से बच सकें।
डरने का वक्त इसलिए भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे इसी संकट की तरफ बढ़ती नजर आ रही है। पिछले एक साल में सेंसेक्स में 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। रुपया पिछले 7 महीने में सबसे कमजोर स्तर पर है। बीएसई में लिस्ट हुई कंपनियों में से 42 फीसदी अपने नतीजों में पिछड़ चुकी हैं। अकेले 3 अगस्त को ही विदेशी कंपनियों ने भारतीय शेयर बाजार से 800 करोड़ खींच लिए। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था की हालत बताने के लिए काफी हैं।
हालात ये है कि शुक्रवार को जब एक तरफ बाजार में खून-खच्चर मचा था तो दूसरी तरफ सरकार संसद में बैकफुट पर थी। सरकार ने संसद में साफ कह दिया कि वो आने वाले दो सालों के लिए विकास दर का ऐलान नहीं कर सकती। ये हालत तब है जब पिछले एक हफ्ते में अलग अलग सरकारी एजेंसियां लगातार विकास दर के आंकड़ों में कमी कर रही हैं। प्री बजट सर्वे में सरकार ने विकास दर 9 फीसदी रहने का दावा किया था लेकिन प्रधानमंत्री के आर्थिक एडवायजरी बोर्ड ने इसे घटाकर 8.2 फीसदी कर दिया। इसके कुछ दिन बाद रिजर्व बैंक की सालाना पॉलिसी में इसे घटाकर 8 फीसदी कर दिया गया।
भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए सबसे बड़ी ताकत भी कमजोर पड़ गई है। देश की अर्थव्यवस्था मॉनसून पर निर्भर करती रही है लेकिन देश में इस साल मॉनसून फीका रहा है। पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और नॉर्थ ईस्ट के कई इलाकों में बारिश नदारद रही। जिसका असर खरीफ की फसलों पर पड़ा। जानकारों की मानें तो मॉनसून के कम होने का असर आपको कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगेगा। सब्जियों और फल के दामों में उछाल आएगा। दाल और तेल की कीमतों में भी उछाल आने की आशंका है। यही नहीं कम बारिश का असर दूध के उत्पादन पर भी पड़ेगा, यानि दूध की कीमतें और बढ़ने वाली हैं।
मॉनसून की हालत ये है कि देश के कई राज्यों में सूखे जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं। मॉनसून से पहले होने वाली बारिश भले अच्छी रही हो लेकिन अब ये साफ हो चुका है कि जुलाई के महीने में ही औसत से 14 फीसदी कम बारिश हुई है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से और गुजरात में बारिश नदारद ही रही है।
कुल मिलाकर इस साल देश में मॉनसून औसत से 6 फीसदी कम है। मुश्किल ये कि मौसम विभाग अगस्त में भी हालात सुधरने की बात नहीं कह रहा। पिछले साल बंपर मॉनसून के चलते 241 मिलियन टन का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन हुआ था। सरकार की उम्मीद से कही ज्यादा। लेकिन इस बार हालात बेहद खराब हैं। जानकारों की मानें तो बारिश कम होने के चलते खरीफ की फसलों पर बुरा असर पड़ा है। धान, बाजरा, अरहर, ज्वार, कपास, मूंगफली और मूंग का उत्पादन कम होने की आशंका है। इशारा देश की जनता के लिए है। एक तरफ महंगाई बेलगाम है। दूसरी तरफ दुनिया भर के बाजार आर्थिक मंदी का संकेत दे रहे हैं इसलिए संभलिए, अपने खर्चे कम करिए ताकि मंदी और महंगाई से निपटने के लिए आप खुद को तैयार कर सकें।
साभार : आईबीएन7 न्यूज चैनल
प्रबंध संस्थान चल रहे संभलकर
अमेरिका की घटती वित्तीय साख और सुस्त आर्थिक माहौल ने देसी प्रबंध संस्थानों के जेहन में 2008 की मंदी के बुरे अनुभव ताजा कर दिए हैं। हालांकि मौजूदा हालात उतने गंभीर नहीं हैं, जितने लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद थे। दरअसल 2008 में आर्थिक मंदी के कारण प्रबंध संस्थानों में परिसर नियुक्तियां (प्लेसमेंट) सुस्त रही थीं। इसीलिए इस बार संस्थान प्लेसमेंट के लिए ज्यादा कंपनियों को बुला रहे हैं।
भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) खासतौर पर अहमदाबाद, बेंगलुरु और कोलकाता में वैश्विक वित्तीय एवं सलाहकार कंपनियां प्लेसमेंट के पहले ही दिन आती हैं और छात्रों को मोटे पैकेज देती हैं। संस्थानों ने बताया कि कंपनियों ने पहले ही जानकारी दे दी है कि वे इस बार कम नियुक्तियां कर सकती हैं। कंपनियों की इस प्रतिक्रिया को देखकर प्लेसमेंट समिति सभी छात्रों को नौकरी दिलाना बड़ी चुनौती मान रही है। इस बार संस्थानों में छात्रों की संख्या भी अधिक है।
आईआईएम कलकत्ता की प्लेसमेंट समिति के एक अधिकारी ने बताया, ‘निवेश बैंकों समेत वैश्विक नियोक्ता इस बार बड़े स्तर पर नियुक्तियां करने से परहेज कर सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी कंपनी ने प्लेसमेंट प्रक्रिया में शामिल नहीं होने के संकेत नहीं दिए हैं।’ आईआईएम बेंगलूर ने कहा कि वित्तीय क्षेत्र में नियुक्तियों पर कुछ असर पड़ सकता है जबकि आईआईएम अहमदाबाद ने कहा कि वह नियुक्तियों के लिए ज्यादा कंपनियों को बुला रहा है।
आईआईएम अहमदाबाद में प्लेसमेंट समिति की आत्रेयी बोस ने बताया, ‘गर्मियों के लिए होने वाले प्लेसमेंट के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। संस्थान में नियुक्तियों के लिए आने वाली कंपनियों की संख्या मुद्दा नहीं है लेकिन वे इस बार उनके द्वारा की जा रही नियुक्तियां घट सकती है। आईआईएम नवंबर में गर्मियों के लिए प्लेसमेंट प्रक्रिया शुरू करेंगे। अंतिम प्लेसमेंट शैक्षिक सत्र के अंत में होते हैं। संस्थानों का कहना है कि 2008 की मंदी में उनका अनुभव इस बार काम आ रहा है और वे पहले से ही चौकन्ने हैं।
2008 में पहली बार प्रबंध संस्थानों ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों समेत कई नई कंपनियों को प्लेसमेंट के लिए आमंत्रित किया था। मुंबई के जमना लाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों की कंपनियों को बुलावा दे रहा है। चिंता की इस बयार के उलट फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (एफएमएस) प्लेसमेंट को लेकर काफी सकारात्मक है। पिछले हफ्ते तक संस्थान को 25 प्री-प्लेसमेंट पेशकश (पीपीओ)और प्री-प्लेसमेंट साक्षात्कारों (पीपीआई) की पुष्टिï हो चुकी है। एफएमएस के सह-नियुक्ति सलाहकार अमित वर्धन ने कहा, ‘हमें आने वाले समय में ज्यादा पीपीओ और पीपीआई मिलने की उम्मीद है। एफएमएस के इस सत्र में कुल 225 छात्र हैं।
साभार : बिजनेस स्टैंडर्ड
जीडीपी के आंकड़ों से उद्योग जगत चिंतित
नई दिल्ली : उद्योग जगत ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का आंकड़ा नीचे आने पर चिंता जताई है और साथ ही यह भी कहा है कि 2011-12 के दौरान 8 प्रतिशत की वृद्धि दर के लक्ष्य को पाना मुश्किल होगा। आज जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून के दौरान जीडीपी की वृद्धि दर घटकर 7.7 प्रतिशत रह गई है, जो इससे पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाह में 8.8 फीसदी थी।
उद्योग जगत ने कहा है कि खासकर औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार बड़ी परियोजनाओं को लागू करने में विलंब की वजह से घटी है। तिमाही के दौरान विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 7.2 प्रतिशत पर आ गई है, जो 2010-11 की पहली तिमाही में 10.6 प्रतिशत रही थी। सीआईआई ने जीडीपी का आंकड़ा नीचे आने पर चिंता जताते हुए कहा है कि बड़ी परियोजनाओं में विलंब की वजह से औद्योगिक क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सीआईआई का मानना है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि दर में सुधार होगा, पर 8 प्रतिशत के आंकड़े को हासिल करना मुश्किल होगा।
सीआईआई ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में कमजोरी के रुख को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी नहीं करनी चाहिए। एक अन्य उद्योग मंडल फिक्की ने कहा है कि 2011-12 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है, जो 2009-10 की तीसरी तिमाही के बाद के बाद सबसे कम है। फिक्की के महासचिव राजीव कुमार ने कहा कि 2010-11 की पहली तिमाही की जीडीपी दर को संशोधित कर 9.3 प्रतिशत से 8.8 फीसदी किया गया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही का आंकड़ा तो और भी नीचे 7.2 प्रतिशत के स्तर पर आ जाता।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रहेगी। फिक्की का कहना है कि इस दर को हासिल करने के लिए शेष तिमाहियों में अर्थव्यवस्था की रफ्तार 8.3 प्रतिशत रहनी चाहिए। फिक्की ने अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर 7.5 से 8 प्रतिशत के बीच रहेगी। इसके और नीचे जाने का जोखिम भी बना रहेगा। वहीं, एक अन्य प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम ने कहा है कि जीडीपी के आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार की मौद्रिक नीति ने नतीजे देने शुरू कर दिए हैं। महंगाई और मांग का नीचे आना शुरू हो गया है।
एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि दीर्घावधि के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो विनिर्माण क्षेत्र में रफ्तार में कमी चिंता की बात है। ‘खासकर ऐसे समय जब सरकार राष्ट्रीय विनिर्माण नीति पर काम कर रही है।’ सरकार ने 2020 तक जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को वर्तमान के 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 फीसदी करने का लक्ष्य रखा है। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा है कि विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि इस क्षेत्र में सुधारों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाए। एसोचैम ने कहा है कि अब निवेशक बेसब्री से इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार संसद के मानसून सत्र में अंतिम सप्ताह में आर्थिक सुधारों पर किस तरह आगे बढ़ती है। एसोचैम के महासचिव रावत ने कहा कि वृद्धि दर के लिए आर्थिक सुधार बेहद जरूरी हैं।
साभार : समाचार एजेंसी ‘भाषा’
मंदी की आहट से शेयर बाजार में घबराहट
मुंबई : अमेरिका समेत कई देशों में फिर मंदी की आहट से विश्व भर के शेयर बाजार शुक्रवार को भी चारों खाने चित हो गए। घरेलू शेयर बाजार भी इससे अछूते नहीं रह पाए। बॉम्बे शेयर बाजार का सेंसेक्स तो कारोबार के दौरान एक समय 16,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से भी नीचे 15,987.77 अंक पर आ गया था। तकरीबन 15 माह की लंबी अवधि के बाद सेंसेक्स इस स्तर तक गोता खाने पर विवश हुआ। विदेशी फंडों द्वारा बाजार से अपना पैसा लगातार वापस निकाले जाने के चलते ही ऐसी नौबत आई। वैसे तो बाद में सेंसेक्स कुछ हद तक संभल गया था, लेकिन इसके बावजूद यह अंतत: 328.12 अंकों की और गिरावट के साथ 16,141.67 अंक पर बंद हुआ।
गौरतलब है कि सेंसेक्स गुरुवार को भी तकरीबन 371 अंक लुढ़क गया था। इस वजह से लगातार दो कारोबारी सत्रों में निवेशकों को 2 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा की चपत लगी है। शुक्रवार को अन्य एशियाई शेयर बाजारों में भी 0.98 फीसदी से लेकर 6.22 फीसदी तक की भारी गिरावट दर्ज की गई।बाजार जानकारों ने बताया कि यूरोपीय देशों में गहराए कर्ज संकट व बैंकों पर इसके संभावित असर और अमेरिका के साथ-साथ कई देशों में आर्थिक विकास के ताजा आंकड़े निराशाजनक रहने के कारण ही निवेशक काफी हतोत्साहित नजर आए। जाने-माने इन्वेस्टमेंट बैंक मॉर्गन स्टैनली की नवीनतम रिपोर्ट में अमेरिका एवं यूरोप के फिर से मंदी के कगार पर पहुंचने का जिक्र किए जाने के चलते भी निवेशक घबरा गए। देश में महंगाई दर के अब भी ज्यादा रहने तथा इसके चलते ब्याज दरों में अभी कुछ और बढ़ोतरी होने की आशंका से भी निवेशक राहत की सांस नहीं ले पा रहे हैं।
ऐसे में निवेशकों ने शेयरों की बिकवाली को हो तवज्जो दी। इस वजह से बीएसई में रियल्टी को छोड़ अन्य सभी 12 सेक्टोरल इंडेक्स 0.39 फीसदी से लेकर 4.41 फीसदी तक टूट गए। आईटी के सबसे प्रमुख बाजार अमेरिका में मंदी के फिर से दस्तक देने की आशंका से इन्फोसिस समेत कई सॉफ्टवेयर कंपनियों के शेयर भाव गिरकर पिछले 21 महीनों के न्यूनतम स्तर पर आ गए। टीसीएस, इन्फोसिस एवं विप्रो के शेयर भाव क्रमश: 6, 7.8 तथा 5.4 फीसदी लुढ़क गए। जियोजीत बीएनपी पारिबा के रिसर्च हेड एलेक्स मैथ्यू ने कहा कि ग्लोबल बाजार से नकारात्मक खबरें मिलने के चलते ही निवेशकों में घबराहट देखी गई। हालांकि, इतनी भारी गिरावट के बाद बाजार में कुछ उछाल आने की उम्मीद की जा सकती है।
साभार : बिजनेस भास्कर












ashish gupta
August 31, 2011 at 5:29 am
kahe ko dara rahe ho yashvant bhai 🙂
afroj
August 31, 2011 at 6:36 am
गजब की खबरें हैं। लिखा है मंदी की आहट से शेयर बाजार में घबराहट। पिछले दो दिनों में शेयर बाजर करीब 850 अंक बढ़ा है। इतनी तेजी तो हाल के कई सालों में नहीं देखी गई। सोमवार को बजार करीब 600 अंक बढ़ा, अगले दिन फिर करीब 250 अंक बढ़ा। यहीं नहीं ए ग्रुप के शेयरों में पांच से दस फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। आईटी कंपनियों के शेयरों में आग लगी हुई है।
जहां तक मीडिया में मंदी का सवाल है। यह मजाक जैसा है। अखबारों का विज्ञापन इस साल 30 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ा है। यह अगले कई सालों तक जारी रहेगा। हम क्या बताएं. इसके लिए आप खुद सभी अखबारों का तिमाही रिजल्ट देख लीजिए।
dinesh prajapati
August 31, 2011 at 9:18 am
cgqr [kwc] vkius vius okyksa dks lpsr fd;kA vc ,sls esa i=dkjksa dks ,d ckr ds fy, Hkh pkSdUuk gksuk gksxk fd eanh ds nkSj esa tc vius lkFkh dks laLFkku fudkyrk gS rks vU; lkFkh dks mlds LFkku ij ukSdjh djus ds igys fopkj dj ysuk pkfg,A
Shantu
August 31, 2011 at 10:07 am
IBN7 ka Ashutosh jee jee ki Mandi ke bare me report
TV par dekha.Lekin usme sirf SANSNI Ke alawa Kuchh Nahi tha. Report me fact nahi hai.Car ki bikri ki jo bat dikhai gai hai usme bat yah hai ki Intrest badh hai.Dusari bat yah hai ki builiding, Car ki mang bhi to kafi badhi hai.Technicaly Mandi hai. Rochak yah hai ki IBN7 ki dikhai gai report ke just bad CNBC TV me experto ne saf kaha hai ki Technical Mandi se India ko Kuchh nahi lena dena hai.America me iska effect hoga.Woh bhi sudhar ke raste par hai.Agar Mandi ka bahana banakar Media Houso ne Chhatni ki to future me ishka kafi bura effect dekhne ko milega.TPR, Ciruculation ke Khel ke bare me aaj log jan chuke hue hai.
क्रांति
August 31, 2011 at 7:17 pm
क्यों डरा रहे हो यशवंत भाई…….आपकी खबर पढ़कर मीडिया संस्थान मंदी आने से पहले ही बेसहारा पत्रकार को मंदी के नाम पर सेलरी भी कम कर देगा….और काम भी ज्यादा लेगा…मैं तो मानता हूं आपने बहुत गलत किया…इस तरह की खबरें ना लिखें…जिससे कि शोषित पीड़ित पत्रकार का शोषण और बढ़ जाय…..
anirudh sharma
August 31, 2011 at 9:06 pm
shri krishan bhagwan ne geeta me updesh diya h kal ki chinta mat karo vartmaan chal raha h. jo huaa achchha hua. jo hoga achchha haga.
Shantu
September 1, 2011 at 10:45 am
All right but Yashwant jee aap CNBC Awaj me jo Ajit dayal Mandi ke bare me bata rahe hai to aap uska sabhar Keou nahi likhate hai?IBN7 wale se mile hue hai kya? Aap yah jante hai ki CNBC Awaj Economic system wala India ka one of the Channel hai.IBN7 ki khabar se jaida CNBC ki Economic khabar ka People par effect parta hai.IBN7 ne jo 7point lekar India me Mandi kee bat kar rahe hai.Wo to Harsal Indian Economic ka problem hai.Points me nai bat to kuchh nahi hai.
Dev Joshi
November 20, 2018 at 9:28 am
Bahut Hi Achcha POst Hai. Thanks
firoz
November 4, 2019 at 12:49 pm
bahut accha article hai magar