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ये पत्रकारिता है या भड़वागिरी!

मुंबई में फिर से मनपा चुनाव आ रहे हैं। चुनाव मतलब मीडिया के लिए कमाई का सुनहरा मौका। अब पत्रकार किसी नेता से पैसे लेकर उसकी अच्छी खबर छापेंगे या फिर किसी का स्टिंग ऑपरेशन कर उसे ब्लैकमेल करेंगे। पिछले चुनाव ने यह साबित कर दिया कि मीडिया अब सिर्फ और सिर्फ मंडी बनकर रह गया है। मंडी, मतलब बिकने का बाजार। जहां खबरें बेची जाती हैं और पत्रकार खबरे बेचनेवाले दलाल। इसे खरीदते हैं चुनाव ल़डने वाले राजनेता। आज की पत्रकारिता का यही एक समूचा परिदृश्य है। ऐसे हालात के बावजूद जिनको आज की पत्रकारिता वेश्यावृत्ति नहीं लगती उनसे अपना करबद्ध आग्रह है कि इस पूरे नजारे को, अब आप जरा सीधे और सपाट अपने तरीके से समझ लीजिए। कईयों को यह सपाट तरीका कांटे की तरह बहुत चुभेगा। लेकिन सच तो सच होता है।

मुंबई में फिर से मनपा चुनाव आ रहे हैं। चुनाव मतलब मीडिया के लिए कमाई का सुनहरा मौका। अब पत्रकार किसी नेता से पैसे लेकर उसकी अच्छी खबर छापेंगे या फिर किसी का स्टिंग ऑपरेशन कर उसे ब्लैकमेल करेंगे। पिछले चुनाव ने यह साबित कर दिया कि मीडिया अब सिर्फ और सिर्फ मंडी बनकर रह गया है। मंडी, मतलब बिकने का बाजार। जहां खबरें बेची जाती हैं और पत्रकार खबरे बेचनेवाले दलाल। इसे खरीदते हैं चुनाव ल़डने वाले राजनेता। आज की पत्रकारिता का यही एक समूचा परिदृश्य है। ऐसे हालात के बावजूद जिनको आज की पत्रकारिता वेश्यावृत्ति नहीं लगती उनसे अपना करबद्ध आग्रह है कि इस पूरे नजारे को, अब आप जरा सीधे और सपाट अपने तरीके से समझ लीजिए। कईयों को यह सपाट तरीका कांटे की तरह बहुत चुभेगा। लेकिन सच तो सच होता है।

इस जमाने में अब जागरूक पत्रकार बहुत कम हैं। आज के जमाने में जागरूक पत्रकारों का मतलब नेताओं की पार्टी में देर रात तक जागकर मांस और मदिरा के साथ शबाब के मजे उड़ाना। आज की पत्रकारिता भी मात्र सनसनी खबर को ही बढ़ावा देते हैं। पहले तो ये होता था की क्या घटना घटी। अब क्या हो रहा है वह लाइव टीवी चैनेलों पर देखने को मिल जायेगा। आगे क्या होनेवाला है ये भी खबरे सनसनी पैदा करेगी। किन्तु समाज में क्या होना चाहिए ये कोई भी मीडिया नहीं बताता। क्योंकि समाज का आईना और लोकशाही का चौथा स्तंभ माने जानेवाले इस मीडिया जगत का अब पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया है।

मौजूदा हालात देखते हुए ऐसा लग रहा है कि मीडिया बिक चुका है और अब उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है। बहुतों को शायद बहुत बुरा भी लगे। मगर यह सच तो यह है कि मिडिया एक वेश्या व्यवसाय की तरह बन गया है और पत्रकार इसकी भड़वागिरी करते हैं। कई पत्रकार यह भी पूछेंगे कि लिखनेवाला ऐसे कैसे इस पेशे में आ गया हैं, जिसको वेश्यावृत्ति का नाम दिया जा रहा है। लेकिन पाठक खुद ही तय करें कि जो सरे बाजार बिकता हो, डंके की चोट पर बिकता हो, और जिसे खरीदे जाने के बावजूद उसके अपने होने का आपको विश्वास नहीं हो, तो उसे क्या कहा जाए। शास्त्रों तक में उदाहरण है कि गणिकाएं खरीदे जाने के बावजूद किसी की कभी नहीं हुईं। अब पत्रकारिता में भी जब ऐसा ही हो रहा है। तो, इसे वेश्यावृत्ति नहीं तो और क्या कहा जाए। पूजा पाठ? या सत्संग? जिनको मीडिया मिशन लगता हो, उनको सलाह है कि वे अपना ज्ञान जरा दुरुस्त कर लें।

पत्रकारिता को वेश्यावृत्ति कहने पर साथियों को बुरा इसीलिए लगेगा कि वे मीडिया में आए तो थे पत्रकारिता करने, और करनी प़ड रही है वेश्यागिरी। हमको अपने किए का आंकलन लगातार करते रहना चाहिए। तभी पता चलता है कि हमसे हो क्या रहा है। जिधर जा रहे हैं, वह दिशा तो सही है कि नहीं। अगर गलत है, तो रास्ता बदलने में काहे की शरम भाई…। वरिष्‍ठ पत्रकार राममनोहर त्रिपाठी तो इस दुनिया में नहीं रहे। मगर वे कहा करते थे कि पत्रकारिता एक समाजसेवा है। इससे कमाई की अपेक्षा न करें। जिन्हे रुपया कमाना हो वे मेहबानी करके दूसरा पेशा अपनाएं। किन्तु आज की पीत पत्रकारिता ने समूचे मीडिया समाज को बदनाम कर दिया है। कई पत्रकार तो मटके और जुओं के अड्डों पर खुलेआम हफ्ता मांगते हुए नजर आते हैं। जबकि शिवसेना के कार्यकारी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी कुछ दिनों पहले अपने भाषण में पेड न्यूज वाली पत्रकारिता को दलाली का नाम दिया है।

कुछ हद तक पत्रकारों की इस अवस्था के लिए अखबार मालिक भी जिम्मेदार हैं। एक तो पत्रकारो को तनख्वाह नहीं दे पाते और चले अखबार का प्रकाशन करने। उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर हाशिए पर रखना चाहते हैं। इनमें चैनल वन न्यूज, नवभारत, इंडिया टीवी, महानगर जैसे आदि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिक भी शामिल हैं। सरकार को चाहिए कि ऐसे अखबारों और न्यूज चैनलों का प्रसारण ही बंद करवा दे या पत्रकार संगठनों के माध्यम से उचित कदम उठाया जाए। ताकि अखबार मालिक पत्रकारों को समय पर वेतन दें। साथ ही दलाली पर रोक लगाने के लिए भी पत्रकारों का अधिकृत पंजीयन भी होना जरूरी है।

लोकतंत्र में अपने आप को चौथा खंभा कहनेवाले मीडिया ने कमाई की कोशिश में समाज के प्रति अपनी वास्तविक जिम्मेदारी को पूरी तरह भुला दिया है। और मीडिया अपनी असली भूमिका से बहुत दूर जा चुका है। पिछले दिनों प्रेस दिवस पर चेन्नई में भारतीय मीडिया का बदलता चेहरा सेमिनार में भी जस्टिस रे यही भाषा बोले। वहां तो उन्होंने यह तक कहा कि संपादक अब सिर्फ दो कौ़डी की चीज है। और खबरें कॉमोडिटी यानी सामान हैं, जिसको खरीदा जा सकता है। मीडिया में पैसे देकर अपनी बात कहने के लिए भ्रामक प्रस्तुतिकरण का सहारा लिया जा सकता है। अखबारों में आप जो पढ़ते हैं वह खबर है या पैसे लेकर छापा हुआ विज्ञापन, यह पता भी नहीं चले। यह तो, एक तरह का छल ही हुआ ना भाई। अपनी भाषा में कहें, तो जिसे आप अखबार में पढ़ या टीवी पर देख रहे हैं वह खबर है या विज्ञापन? यह आपको पता होना चाहिए। लेकिन यहां तो मालिकों को पैसे देकर कुछ भी छपवा लीजिए। यह ठीक वैसा ही है, जैसे अपनी किसी छोकरी को कोठे की मालकिन दुनिया के सामने खरीदार की बीवी के रूप में पेश करे।

अच्छे और खूबसूरत लगने वाले शब्दों में कह सकते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के बाद हमारा मीडिया भी इंटरनेशनल मीडिया की तरह आज पूरी तरह से बाजारवाद का हिस्सा बन गया है। मीडिया का आज पूरी तरह से कॉर्पोरेटाइजेशन हो गया है, और मार्केट उस पर हावी हो गया है। लेकिन यह भाषा किसको समझ में आती है? इसलिए सीधी भाषा में सिर्फ और सिर्फ यही सकते हैं कि मीडिया अब मंडी बन गया है। फिर, मंडी वेश्या की हो या खबरों की क्या फर्क पड़ता है। मंडी सिर्फ मंडी होती है। जहां कोई खरीदता है, तो कोई बिकता है। इस मंडी में खबरें बिकती है। कोई भी खरीद सकता है। इसलिए आज की पत्रकारिता सिर्फ दलाली है। और अगर इस सच को आप नहीं मानते तो बताइए, इसे क्या कहा जाए?

लेखक शैलेष जायसवाल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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0 Comments

  1. shakti

    February 5, 2011 at 12:16 pm

    sb ptrakar aise nhee hain mhashya,pr adhikansh hain ye bhee shee hai

  2. waseem ahmad

    February 5, 2011 at 1:17 pm

    sirf mumbai kyo u.p. me bhi yahi chal raha hai. yaha bhi nazar ghumaiye
    waseem ahmad

  3. waseem ahmad

    February 5, 2011 at 1:23 pm

    sirf mumbai kyu . u. p. me bhi yahi hal hai. kabhi idhar bhi nazar daudaey
    waseem ahmad
    basti

  4. chandan goswami

    February 5, 2011 at 2:57 pm

    yeh BHADVAGIRI to niche se lekar ooper tk hei,aapne dekha nahi abhi hal hi me 2gspectrum Ghotale me kitne bade naam aaye , yeh sabh KYA HEI

  5. सिक्ता सिंह

    February 5, 2011 at 4:01 pm

    निरंजन परिहार जी मुंबई के जाने – माने पत्रकार हैं। उनके लेख को हू – बहू कॉपी करके शैलेष जायसवाल ने भड़ास पर डाल दिया है। भरोसा नहीं हो तो लिंक पर क्लिक करके देख लीजिये। भड़ास4मीडिया के विचार पोर्टल के सबसे पॉपुलर लेखों की सूची में निरंजन परिहार का यह लेख है। परिहार जी के इसी लेख पर – मीडिया की मंडी और खबरें रंडी – शीर्षक वाले इस लेख पर ही सबसे ज्यादा कमेंट भी हैं। शैलेष जायसवाल पत्रकारिता से जुड़े हुए चोर लेखक हैं। यशवंत जी को शैलेष जैसे चोर लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। शर्म करो चोर लेखक शैलेष। तुमने तो पूरी बिरादरी को नाम ही बदनाम कर दिया। चोरी पकड़ने के लिए – Please Click link… http://vichar.bhadas4media.com/media-manthan/189-niranjan-parihar.html

  6. सिक्ता सिंह

    February 5, 2011 at 4:02 pm

    मीडिया की मंडी और खबरें ‘रंडी’
    Wednesday, 18 November 2009 16:00 निरंजन परिहार कहिन – मीडिया मंथन
    E-mail Print PDF
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    PoorBest

    आप बताइए, इस पत्रकारिता को क्या कहा जाए? : अपन पहले भी कहते थे, अब भी कह रहे हैं। और हालात अगर नहीं सुधरे, तो आगे भी कहते रहेंगे कि मीडिया बिक चुका है और अब उसकी कोई विश्‍वसनीयता नहीं है। अपन ने यह भी कहा कि ऐसी पत्रकारिता को अपन वेश्यावृत्ति मानते हैं। तो, बहुतों को बहुत बुरा लगा। कई नए – नवेलों को तो कुछ ज्यादा ही बुरा लग गया। लगा कि वे ऐसे कैसे पेशे में आ गए हैं, जिसको वेश्यावृत्ति का नाम दिया जा रहा है। लेकिन आप ही बताइए कि जो सरे बाजार बिकता हो, डंके की चोट पर बिकता हो, और जिसे खरीदे जाने के बावजूद उसके अपने होने का आपको विश्वास नहीं दो, तो उसे क्या कहा जाए। शास्त्रों तक में उद्दरण है कि गणिकाएं खरीदे जाने के बावजूद किसी की कभी नहीं हुई। अब, पत्रकारिता में भी जब ऐसा ही हो रहा है। तो, इसे वेश्यावृत्ति नहीं तो और क्या कहा जाए। पूजा–पाठ? या सत्संग? जिनको मीडिया मिशन लगता हो, उनको अपनी सलाह है कि वे अपना ज्ञान जरा दुरुस्त कर लें।

    पिछले चुनाव ने यह साबित कर दिया कि मीडिया अब सिर्फ और सिर्फ मंडी बनकर रह गया है। मंडी, मतलब बिकने का बाजार। खबरें हैं प्रोडक्ट। यानी सामान। पत्रकार हैं मीडियेटर। यानी दलाल। और चुनाव लड़ने वाले राजनेता हैं खरीदार। यानी ग्राहक। आज की पत्रकारिता का यही एक समूचा परिदृश्य है। ऐसे हालात के बावजूद जिनको आज की पत्रकारिता वेश्यावृत्ति नहीं लगती। उनसे अपना करबद्ध आग्रह है कि इस पूरे नजारे को, अब आप जरा सीधे और सपाट अपने तरीके से समझ लीजिए। अपन जानते हैं कि यह सपाट तरीका कांटे की तरह बहुत चुभेगा। लेकिन सच तो सच होता है। और सच यह है कि रंडियों की मंडी में दलाल को ‘भड़वा’ कहा जाता है। अपन जब आज की पत्रकारिता को वेश्यावृत्ति कहते हैं तो साथियों को बुरा इसीलिए लगता है क्योंकि वे मीडिया में आए तो थे पत्रकारिता करने, और करनी पड़ रही है ‘भड़वागिरी’। हमको अपने किए का आंकलन लगातार करते रहना चाहिए। तभी पता चलता है कि हमसे हो क्या रहा है। जिधर जा रहे हैं, वह दिशा तो सही है कि नहीं। अगर गलत है, तो रास्ता बदलने में काहे की शरम, भाई…।

    हमारे गुरू प्रभाष जोशी इस बारे में लगातार बोलते थे। धुंआधार बोलते थे। पर वे तो अब रहे नहीं। चले गए। देश में अभी अपनी तो खैर, कोई इतनी बडी हैसियत नहीं है कि अपने कहे को पूरा देश ध्यान से सुने। पर, एक आदमी है, जो पिछले लंबे समय से लगातार बोल रहा है। जब भी जहां भी मौक़ा मिले, वह बोले जा रहा है कि मीडिया आज बिक चुका है। और अब उसकी विश्‍वसनीयता भी बिल्कुल खत्म हो गई है। वह आदमी कह रहा है कि मीडिया को अब देश और समाज की कोई चिंता नहीं है। अब मीडिया सिर्फ धंधा है। लेकिन कोई भी उस हैसियतदार आदमी को भी सुन नहीं रहा। प्रभाषजी तो खैर, पत्रकार थे। आपके और हमारे बीच के थे। उनकी बात सारे लोग सुनते थे। आंख की शरम के मारे कहीं – कहीं लिख भी लेते थे। मीडिया के मंडी बन जाने के मामले पर अखबारों में कम, पर वेब पर खूब चले प्रभाषजी। और हम सारे ही लोग उनकी बात को आगे भी बढ़ाते थे। लेकिन जस्टिस जी एन रे, तो आजकल प्रेस कौंसिल के अध्‍यक्ष हैं. जज रहे हैं। उनके कहने का भी कहीं कोई वजन ही नहीं पड़ रहा है। सिवाय वेब मीडिया के कोई उनको भाव नहीं दे रहा है। लगता है, सच के लिए अब जगह कम पड़ने लगी है। एक बार इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में मुलाकात हुई थी। और जिक्र हुआ तो प्रभाषजी के बारे में बोले, कि मीडिया के आदमकद आदमी होते हुए भी मीडिया उनकी भी नहीं सुनता। उन्‍होंने कहा कि मीडिया आज सामान से अधिक कुछ नहीं है।

    लोकतंत्र में अपने आप को चौथा खंभा कहनेवाले मीडिया ने कमाई की कोशिश में समाज के प्रति अपनी वास्तविक जिम्मेदारी को पूरी तरह भुला दिया है। और मीडिया अपनी असली भूमिका से बहुत दूर जा चुका है। पिछले दिनों प्रेस दिवस पर चेन्नई में ‘भारतीय मीडिया का बदलता चेहरा’ सेमिनार में भी जस्टिस रे यही भाषा बोले। वहां तो उन्होंने यह तक कहा कि संपादक अब सिर्फ दो कौड़ी की चीज है। और खबरें कॉमोडिटी, यानी सामान हैं, जिसको खरीदा जा सकता है। मीडिया में पैसे देकर अपनी बात कहने के लिए भ्रामक प्रस्‍तुतिकरण का सहारा लिया जा सकता है। अखबारों में आप जो पढ़ते वह खबर है या पैसे लेकर छापा हुआ विज्ञापन, यह पता भी नहीं चले। यह तो, एक तरह का छल ही हुआ ना भाई। अपनी भाषा में कहें, तो जिसे आप अखबार में पढ़ या टीवी पर देख रहे हैं, वह खबर है या विज्ञापन? यह आपको पता होना चाहिए। लेकिन यहां तो मालिकों को पैसे देकर कुछ भी छपवा लीजिए। यह ठीक वैसा ही है, जैसे अपनी किसी छोकरी को कोठे की मालकिन दुनिया के सामने खरीदार की बीवी के रूप में पेश करे।

    अच्छे और खूबसूरत लगने वाले शब्दों में कह सकते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के बाद हमारा मीडिया भी इंटरनेशनल मीडिया की तरह आज पूरी तरह से बाजारवाद का हिस्सा बन गया है। और सधी हुई भाषा में अपन यह भी कह सकते हैं कि मीडिया का आज पूरी तरह से कॉर्पोरेटाइजेशन हो गया है, और मार्केट उस पर हावी हो गया है। लेकिन यह भाषा किसको समझ में आती है। अपन पहले अखबार, फिर टेलीविजन होते हुए फिलहाल वेब पत्रकारिता में भी हैं। इसलिए सीधी भाषा में सिर्फ और सिर्फ यही सकते है कि मीडिया अब मंडी बन गया है। फिर, मंडी रंडी की हो या खबरों की। क्या फर्क पड़ता है। मंडी सिर्फ मंडी होती है। जहां कोई खरीदता है, तो कोई बिकता है। इस मंडी में खबरें बिकती है। कोई भी खरीद सकता है। जाते जाते अपना एक आखरी सच यह भी सुन लीजिए कि खबरों की दुनिया में अपन जब तक रहे, खबर को कभी किसी को नहीं बेचा। लेकिन आपसे एक विनम्र प्रार्थना है कि यह सवाल अपने से कभी मत करना कि खबरों को कभी बेचा नहीं तो, खरीदा तो होगा ? क्योंकि उसका जवाब अगर अपन देंगे, तो कई इज्जतदार चेहरों का नूर फीका पड़ जाएगा। इसलिए थोड़ा लिखा, ज्यादा समझना। अपन सिर्फ मानते ही नहीं, बल्कि अच्छी तरह जानते हैं कि आज की पत्रकारिता सिर्फ दलाली यानी ‘भड़वागिरी’ है। और अगर इस सच को आप नहीं मानते तो बताइए, इसे क्या कहा जाए?

    लेखक निरंजन परिहार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

  7. virendra gupta A2Z NEWS CHANNEL

    February 5, 2011 at 4:05 pm

    kade kadam uthane honge

  8. Sujit

    February 5, 2011 at 4:41 pm

    Mai es baat se puri tarah se sahmat hu. Apne reportaro aur workaro ko time se selery de to koi bhi patrakarita k naam par dalaali nahi karega. Sarkar ko es baat ko dhyan me rakhkar kade kadam zarur uthana chahiye. Mana kuch log aise ho sakte hai,lekin sab nahi

  9. m.k.gouri gwalior

    February 5, 2011 at 5:23 pm

    likhe gaye iss vichar main moujuda halaton ke aadhar par satyata parkat ki gai hai kyonki kuchh media karmiyon ne halat ese bana diye hain.

  10. GA

    February 5, 2011 at 7:54 pm

    sikta bilkul sahi hai.. ye article maine 15 din pahle padha tha aur wo hi phir se dala gaya hai

  11. Bharat Solanki, Mumbai

    February 6, 2011 at 6:44 am

    शैलेष जायसवाल जी आप सबसे बड़े भड़वे हैं। क्योंकि आप भड़वागिरी कर रहे हैं। पत्रकारिता भड़वागिरी है या क्या है, यह आप जैसे लेखन के चोरों को रहने का हक ही नहीं है। निरंजन परिहार जी का लिखा लेख जस का तस शब्दश: चुराकर यूं का यूं य़शवंत साहब को भेजकर आपने जो किया है, वह वास्तविक भड़वागिरी है। यह भड़ास 4 मीडिया के साथ धोखा है। शेलेष ने पूरा का परिहार जी का पूरा पैराग्राफ, पूरा लेख उठाकर अपने नाम से छाप दिया है। पत्रकारिता में शैलेष जायसवाल जैसे भड़वे जब तक जिंदा है, तब तक सब चलता रहेगा।

  12. Ramesh Jain Gulshan

    February 9, 2011 at 5:03 am

    भडवे लेखक की भडवागिरी. यशवंत साहब, मुंबई के मीडिया विशेषज्ञ निरंजन परिहार जी का लिखा ये लेख मैंने एक साल पहले पढ़ा था. शैलेश जायसवाल ने परिहार साहब का लेख अपने नाम से
    आप को भेज के लहक की चोरी की है, साथ ही आप के साथ गद्दारी भी जी है. भड़ास 4 मीडिया पे जायसवाल जैसे भडवे लोगों को बैन करना चहिये.

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