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राडिया ने चमकाई पीआर कंपनियों की किस्मत!

अर्जुन जिस प्रकार आजकल नीरा राडिया मीडिया के निशाने पर है, उससे तो ये लगता था कि पीआर कंपनियों की साख भी डूब जाएगी पर इस मामले में उल्टा हो रहा है। राडिया प्रकरण के नंगे होने के बाद हर व्यावसायिक घराना अपनी पीआर कंपनियों को नीरा राडिया की तरह प्रभावी होने को कह रहा है। इससे तो ऐसा लगता है कि नीरा राडिया का मामला पीआर के धंधे में नया बूम लाएगा।

अर्जुन जिस प्रकार आजकल नीरा राडिया मीडिया के निशाने पर है, उससे तो ये लगता था कि पीआर कंपनियों की साख भी डूब जाएगी पर इस मामले में उल्टा हो रहा है। राडिया प्रकरण के नंगे होने के बाद हर व्यावसायिक घराना अपनी पीआर कंपनियों को नीरा राडिया की तरह प्रभावी होने को कह रहा है। इससे तो ऐसा लगता है कि नीरा राडिया का मामला पीआर के धंधे में नया बूम लाएगा।

क्या आपको पता है कि इस प्रकरण के लपेटे में आने के बाद वीर सांघवी का क्या बना? पहले वे एचटी मीडिया लिमिटेड के संपादकीय सलाहकार थे। अब वे एचटी मीडिया लिमिटेड के सलाहकार बना दिए गए हैं। दरअसल, इससे न उनका रुतबा घटा है न वेतन, बल्कि उनकी शान बढऩे के ही आसार हैं, क्योंकि बड़े व्यावसायिक घरानों की तरह बड़े मीडिया घरानों ने भी वेल कनेक्टेड लोगों की शक्ति का लोहा मानना शुरु कर दिया है। आज हम उस दौर में जी रहे हैं जहां हर कोई (ज्यादा से ज्यादा लोग) बेईमान होने के लिए बिल्कुल शर्मिंदा नहीं है, बशर्ते कुछ मोटा लाभ मिलने की गुंजायश हो।

पुराने जमाने में यदि किसी इलाके में प्लेग फैल जाती तो सारा इलाका एक औरत को उस बीमारी के फैलने का दोषी मान कर उसे अलग थलग कर देता था। जबकि प्लेग के फैलने का कारण गंदा रहन सहन-चूहे व अन्य कई कारण होते हैं। समाज अपनी गंदगी को एक औरत के सिर डाल कर अपने आप को साफ मान लेता था। मुझे तो यही लग रहा है कि नीरा राडिया, वीर संघवी और बरखा दत्त पर निशाना साध कर हम समाज की गंदगी को उसी तरह जस्टीफाई करने में लगे हैं, जैसा कि प्लेग के मामले में पहले हुआ करता था। इस मुल्क में हर टाटा या अंबानी के पास कोई न कोई नीरा राडिया मौजूद है। हर नीरा राडिया किसी न किसी स्तर के वीर सांघवी या बरखा दत्त से जुड़े हुए हैं। इस सारे प्रकण में मीडिया की भूमिका उस कर्मकांडी ब्राह्मण जैसी रही है कि उसने तो शादी करवाने की दक्षिणा लेनी ही है, वधु चाहे घर जाते ही विधवा हो जाए।

अब  नीरा राडिया, वीर सांघवी या बरखा दत्त होना शर्मनाक नहीं है, स्टेटस सिंबल है। जो पत्रकार स्पेक्ट्रम की अलाटमेंट करवाने की कूव्‍वत रखता हो, केंद्र में जिसकी मर्जी से मंत्री बनाए जाते हों, उसके लिए संस्थान बदनामी के डर से दरवाजे बंद करने के स्थान पर लाईन लगा कर उसके दरवाजे पर खड़े होंगे। यही आज का सच है। मेरा ख्याल है कि हमें अब इस प्रकरण पर लिखना बंद कर देना चाहिए क्योंकि हम परोक्ष रूप से इस गंदे धंधे को ही प्रमोट कर रहे हैं।

लेखक अर्जुन शर्मा हिंदी मीडिया में 20 वर्षों से सक्रिय हैं। लगभग एक दर्जन छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों व पत्रिकाओं में काम कर चुके अर्जुन ने इससे इतर भी कई काम किए हैं। पत्रकारिता शिक्षा पर किताब लिखने, कई पंजाबी उपन्यासों का अन्य भाषाओं में अनुवाद करने व डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने जैसी उपलब्धियां भी उनके हिस्से में हैं।

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0 Comments

  1. Vaibhav

    December 17, 2010 at 8:09 am

    This can be one view.

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