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राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ आपस में भिड़े

राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर से खबर है कि कल मुख्यमंत्री मायावती के दौरे के बाद खबर लिखे जाने को लेकर स्थानीय संपादक मनोज तिवारी और ब्यूरो चीफ दीप्त भानु डे के बीच जमकर कहासुनी हो गई. सूत्रों के मुताबिक संपादक मनोज तिवारी जल्दी से जल्दी खबर लिखे जाने की बात कह रहे थे तो ब्यूरो चीफ दीप्त भानु डे ने पर्याप्त सूचनाएं न आ पाने की बात कहकर खबर लिखे जाने में देरी होने की संभावना व्यक्त कर रहे थे.

राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर से खबर है कि कल मुख्यमंत्री मायावती के दौरे के बाद खबर लिखे जाने को लेकर स्थानीय संपादक मनोज तिवारी और ब्यूरो चीफ दीप्त भानु डे के बीच जमकर कहासुनी हो गई. सूत्रों के मुताबिक संपादक मनोज तिवारी जल्दी से जल्दी खबर लिखे जाने की बात कह रहे थे तो ब्यूरो चीफ दीप्त भानु डे ने पर्याप्त सूचनाएं न आ पाने की बात कहकर खबर लिखे जाने में देरी होने की संभावना व्यक्त कर रहे थे.

संपादक का कहना था कि यूपी के अन्य सेंटरों के लिहाज से सीएम के दौरे की खबर महत्वपूर्ण है, इसलिए इसे जल्दी लिखकर सभी के पास भेजा जाना चाहिए. पर ब्यूरो चीफ का कहना था कि आधी-अधूरी सूचनाएं पर तुरंत खबर कैसे बन सकती है, हर जगह से खबरें आ रही हैं और उसे जल्द ही तैयार करा दिया जाएगा. कुल मिलाकर इसी मुद्दे पर करीब डेढ़ दो घंटे सहारा के गोरखपुर आफिस में किचकिच होती रही. कुछ लोगों को कहना है कि दोनों में से एक ने गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया तो दूसरे ने असंसदीय भाषा न बकने की चेतावनी दी. इस कारण मामला और बिगड़ गया. एक दूसरे से निपट लेने की धमकियां भी दी गईं.  वरिष्ठों के बीच इस तरह की बहसा-बहसी के कारण कनिष्ठों ने भी दो घंटे तक कामकाज करने की जगह इस सीन का आनंद उठाया.

कानाफूसी कैटगरी की इस खबर के बारे में अगर किसी को कुछ कहना है तो वह नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकता है.

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0 Comments

  1. prashant tripathi

    February 2, 2011 at 10:12 am

    rashtriya sahara abhi stand kar raha hai is trah ke khabre usse jude logo ka manobal gira sakti hai ……………

  2. RASHBIHARI DUBEY

    February 2, 2011 at 4:01 pm

    laat juta ho jata tab na kuch hota.
    ye mahan ptrakar hain.wahhhhhhh

  3. ROHIT RANA

    February 2, 2011 at 4:22 pm

    Upendra ji, itihas gawah hai kamjore netritava (leadership) hone per ashantosh badhata hai. samasya ka samadhan nahi hone per janta raja me vishwas karna band kar deti hai. Ayogya ko tarjih dene aur yogya ko kadra nahi karne se nirkunsha shashan ho jata hai. Aap sab kucha jante hai. lekin aap tatastha (neutral) bane hai. Jo tatastha hai uska bhi itihas likha jayega. Aap yogya hai per per yeh nahi ho ki janta aapki tulna nero se karne lage. Wahi Rome ka raja Nero. Rome jal raha tha aur niro bansuri baja raha tha. sahara me ab kya baki rah gaya hai. Dehradun, kanpur. patna ke bad Gorakhpur ka number aaya hai. Akhir aisi naubat kyon aayi. please, dekhiye kyon ashantosh paida ho raha hai. lagta hai ab der ho gai hai. Aise hi chalne dijiye. dilli ko bhi dekh lijiye. Aap soch rahe honge ki aapka virodhi ye bate kar raha hai. Lekin aap dhayan se sochiye. kya yeh sachhayi nahi hai.

  4. RP

    February 3, 2011 at 6:21 am

    यशवंत जी .
    ऐसा लग रहा है की अब भड़ास जैसे मंच का उपयोग कुछ आदतन सनसनीखेज लोग भी करने लगे है . ऐसे में आपका दायित्व बढ़ जाता है . दरअसल जब यह घटना घटित हुयी तो मैं भी वही था . सारी बहस वैसी ही सामान्य थी जसी किसी भी अखबार में होती है . कुल मामला सिर्फ खबर कहा लगनी चाहिए इस पर था और यह बमुश्किल ५ – ७ मिनट की घटना थी , कोई अप्सब्द नहीं कहे गए नहीं कोई एक दूसरे को देख लेने की धमकी दी गयी … आपसे फिर निवेदन है की ऐसी खबरों पर सम्बंधित पक्षों से बात अवशय करे लें , हालाकि समय और संसाधनों की कमी के कारन यह थोडा मुश्किल ज़रूर है पर भड़ास के साख की कीमत पर कतई कठिन नहीं है …

  5. arunesh

    February 3, 2011 at 6:22 am

    dipty bhaanu dey k baare mei jaagran jaanta hai ki vo khabaro ko manage karne k liye kaise samjhautaa karte hai. jagran se he unka ye khel chal raha, aur ab sahara mei v paisa he unka maksad rahta hai, khabar der karne k peeche kuch mainage karna hoga..

  6. Ajit.Kumar Pandey

    February 4, 2011 at 1:06 pm

    Manoj ji bahut suljhe hue editor hai…. gupta ji bahut bekar ke patrkar hai ye patrkarita ko kalankit kartey hai aur khabron ko ulta banatey hai yani setting getting ki news hi keval likhtey hai…..kyon gupta ji paid honey me deri thi tabhi news der kar rahe they …….

  7. रहबर-ए-शहाफत

    February 5, 2011 at 11:14 am

    भई – ये गुप्ता जी कौन हैं और कहां से इस मुद्दे मे कबाब मे हड्डी की तरह से आ गये ??? बाबू अजीत कुमार पाण्डेय – सबसे पहले व्यक्ति, मुद्दा और मामले को जान लेना चाहिये, उसके बाद किसी व्यक्ति या मामले पर अपने महान विचार रखने चाहिये. तुम्हे व्यक्ति के बारे मे, मुद्दे/मामले के बारे में ही नही पता – गुप्ता और दिप्ता मे फर्क ही नही मालूम, तो फिर अपने ये नेक विचार किस आधार पर प्रकट कर रहे हो – शायद तुम्हे खुद भी नही पता ! हो सकता है तुम्हारे और तुम्हारे इस नेक विचार के प्रायोजक/प्रायोजकों को इसका आधार और औचित्य पता हो ?!?

  8. ramesh

    February 6, 2011 at 7:35 am

    अब ये मामला ऐसा हो रहा है जिसमें कुछ भाई लोग अपना व्यक्तिगत अकाउंट सेटिल करने में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं. मनोज जी बहुत अछे संपादक है और दीप्ती भानु डे को गोरखपुर का हर पत्रकार सम्मान देता है . ये दोनों ऐसे लोग नहीं हैं जिनके बारे में तथ्यात्मक आरोप लगाये जा सके . बाकि बकने के लिए कोई भी संवैधानिक तौर से आज़ाद है. जिस झगड़े की बात से ये बहस निकली है वो मेरी दृष्टी में किसी भी अख़बार के दफ्तर में लगातार होनी चाहिए. ये ही अख़बार और पत्रकार के जिंदा रहने का सबूत है .
    और टिप्पड़ी करने वाले अजित बाबू जिनको नाम तक सही पता नहीं , जिसकी भी दलाली कर रहे हो अब चुप हो जाओ तुम्हारी इज्ज़त बची रहेगी

  9. durgesh

    February 7, 2011 at 6:06 am

    kaya kare aaddt si pad gaee hai.

  10. mohan

    February 7, 2011 at 6:14 am

    maya yah aap ko batate chaloo ki sant kabir nagar ke chaf ko angreji tak nahi aati aur hindustan ke sthaniy sampadak ji ki ke tan man dhan se unaka dil jita aur jp ojha ko chaf ki jagah ripotar bana diya gaya. jise sab kuchh aaye use ripotar aur tise kuchh nahi aaye use chif.

  11. kumarsingh

    February 13, 2011 at 7:53 am

    यशवंत जी…
    मै भी सहारा में काफी दिनों तक ज़ुड़ा रहा,आज भी मेरे कई मित्र सहारा परिवार से जुड़े है…दरअसल यहां सबसे कमजोर मैनेजमैंट इस काल में आया है…और जहां तक यहां के राजा की बात हैं..तो वह बहुत माहान है…लेकिन उसने जो लोग इस वक्त सत्ता में बैठा रखे है..उन्हें बात करने की तमीज ही नहीं है।
    यशवंत जी यह सौ फिसदी सत्य हैं की आज सहारा अखबरा से लेकर टीवी तक में काम करने वाले बड़े-बड़े पत्रकार गालियां खा रहे है…उन लोगों से जिन्हें पत्रकारिता की ए.बी.सी नहीं आती…।
    यशवंत जी मेरी बात ध्यान रखिएगा…सहारा में वह दिन आना दूर नहीं है..जब वहां लोग इन लोगों को गालिया तो दूर जूते मारेगें…मैं मांफी चाहूंगा…मैं ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहा हूं,,,लेकिन यह बहुत ही दुखद हैं की आज सहारा के तथाकथित चैनल हैड,संपादक यहां के कर्माचारियों को ऐसी-ऐसी गालियां दे रहे हैं कि…पास में खड़े व्यक्ति को शर्म आ जाएं…लेकिन इन्हें शर्म नहीं आती है…फिर चाहे वह मनोज मनु हो…राजेश कोशिक हो या फिर प्रभुत राज…यह लोग सीधे मुह किसी से बात ही नहीं करते..और यह सब जानते हैं की इनकी वौकात है क्या..यह लोग कितनी पत्रारिता जानते है…कुल मिलाकर यह हैं की यह लोग पूरे दिन विजय राय की चमचागिरी में लगे रहते हैं,और बाकि बचे समय में लोगों को गालियां देते है…यह पत्रकारिता के इतिहास में सहारा का सबसे बुरा दौर है…जिसे हमेशा याद किया जाएगा….लेकिन कहते है ना…बुरी चीज ज्यादा दिन नहीं रहती है…एक दिन आएगा…जब इन लोगों को जबाब देने वाला अर्जुन…पैदा होगा….फिर क्या होगा..यह भी बहुत ही दिलचस्प होगा…जय भड़ास जय सहारा

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