Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

मदद-अपील

‘राष्‍ट्र चिन्‍ह’ के लिए पुत्रों ने पिता से छल किया, प्रशासन ने आंख बंद की

टीम भड़ास को सबसे पहले मैं उनके पहल के लिए साधुवाद देना चाहता हूं। इसके बाद मैं अपने मन की बात कह रहा हूं। मैं गोरखपुर शहर का रहने वाला हूं। मैं एक स्थानीय अखबार से जुड़ा हुआ हूं। यहां से प्रकाशित इस स्थानीय समाचार पत्र को मेरे ही परिवार के लोगों ने शुरू किया है। वर्ष 1984 को मेरे दादाजी  रामवचन प्रसाद ने गोरखपुर शहर से राष्‍ट्र चिन्ह शीर्षक से एक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया।

टीम भड़ास को सबसे पहले मैं उनके पहल के लिए साधुवाद देना चाहता हूं। इसके बाद मैं अपने मन की बात कह रहा हूं। मैं गोरखपुर शहर का रहने वाला हूं। मैं एक स्थानीय अखबार से जुड़ा हुआ हूं। यहां से प्रकाशित इस स्थानीय समाचार पत्र को मेरे ही परिवार के लोगों ने शुरू किया है। वर्ष 1984 को मेरे दादाजी  रामवचन प्रसाद ने गोरखपुर शहर से राष्‍ट्र चिन्ह शीर्षक से एक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया।

इस समाचार पत्र में रामवचन प्रसाद जी के तीन पुत्रों ने भी अपना सहयोग दिया और समय बीतने के साथ ही उक्त समाचार पत्र चतुर्मुखी विकास की ओर अग्रसर हुआ। दिनों-दिन तरक्की के राह पर चलते हुए राष्‍ट्र चिन्ह समाचार पत्र काफी लोकप्रिय और प्रभावशीली बन गया। प्रसार बढ़ने के साथ ही इस समाचार पत्र में विज्ञापनों की भी भरमार होने लगी। विशेषकर सरकारी विज्ञापनों की कमी तो कभी भी इस समाचार पत्र को नहीं रही है। इसी कारण इस समाचार पत्र का विज्ञापनों के मद में विभिन्न विभागों में लगभग लाखों रुपये का बकाया हो गया।

संस्थापक सम्पादक रामवचन प्रसाद जो कि प्रेस और समाचार पत्र से संबंधित अन्दर का ही कार्य देखते रहे हैं जबकि बाहर का सभी कार्य इनके दो पुत्र रामजी प्रसाद गुप्त व लालजी भ्रमर करते रहे। लालजी भ्रमर व रामजी प्रसाद गुप्त की शासन प्रशासन के उच्चाधिकारियों, मंत्रियों, विधायकों, सांसदों सहित अन्य सम्मानित व प्रभावशाली लोगों में काफी पकड़ मजबूत हो गयी। ये लोग अपना सभी काम आसानी से लोगों से करा लेते हैं। लोगों में अच्छी पकड़ व लोकप्रियता के अहंकार में लालजी भ्रमर इतने मदमाती हुए कि उन्होंने अपनी ब्याहता साली को जबरन अपनी पत्नी बना लिया। पत्नी बनाने के साथ ही उनका खर्च दोगुना हो गया। इस खर्च के बढ़ने के साथ ही लालजी भ्रमर की नीयत में बदलाव आने लगी और वह रात-दिन राष्‍ट्र चिन्ह के विज्ञापनों का भुगतान व्यक्तिगत तौर पर नगद लेकर हड़पने लगे। उनकी धन की हवस इस बदर बढ़ने लगी कि उन्होंने इस पर सोचना ही बन्द कर दिया कि उनके पिता द्वारा शुरू किये गये इस कारोबार का क्या परिणाम होगा?

रामवचन प्रसाद जी को लालजी भ्रमर के इस कुकृत्य की जानकारी जब होने लगी तो पहले तो उन्होंने इस बात के लिए समझाना शुरू किया। स्वभाव से मनबढ़ व बिगड़ैल लालजी भ्रमर ने पिता की बातों को अनसुना करते हुए अपनी ही मनमानी करने की ठान ली। लालजी भ्रमर के इनक कार्यों में उनके बड़े भाई रामजी प्रसाद गुप्त व छोटे भाई लालचन्द गुप्त भी बराबर के साझीदार होने लगे और लालजी भ्रमर का पुरजोर समर्थन करने लगे। पुत्रों के इस बर्ताव से दुःखी पिता ने लालजी भ्रमर को अपने समाचार पत्र से निष्‍कासित करते हुए उनकी शासन से प्रदत्त पत्रकार मान्यता को समाप्त करा दिया। मान्यता समाप्त होने से नाराज लालजी भ्रमर ने पिता व राष्‍ट्र चिन्ह समाचार पत्र को पूरी तरह से बरबाद करने की ठान ली और विभागों में फर्जी व मनगढ़न्त शिकायत करते हुए राष्‍ट्र चिन्ह के विज्ञापनों व भुगतान को रोकवा दिया जिसके परिणामस्वरूप राष्‍ट्र चिन्ह धरातल में जाने लगा।

पिता के स्वामित्व वाले समाचार पत्र को हथियाने का कुचक्र भी लालजी भ्रमर करने लगे और मार्च 2003 को जब रामवचन प्रसाद के पेट का आपरेशन हुआ तो उसी के दूसरे दिन लालजी भ्रमर ने राष्‍ट्र चिन्ह को हथियाने के लिए एक फर्जी घोषणा पत्र तत्कालीन सिटी मजिस्‍ट्रेट गोरखपुर के यहां अभिप्रमाणित कराकर पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने हेतु आरएनआई को भेज दिया। पुत्रों की मंशा पर पानी तब फिर गया जब रामवचन प्रसाद को जीवनदान मिल गया और वह धीरे-धीरे स्वस्थ्य होने लगे। स्वस्थ होने के दौरान ही मेरे द्वारा रामवचन प्रसाद को जब इस बात की सूचना दी गयी कि आपके स्वामित्व वाले अखबार को लालजी भ्रमर ने अपने नाम करा लिया है,  तो इस बात को सुनकर रामवचन प्रसाद जी सन्न रह गये। तत्काल इसे संज्ञान में लेते हुए उन्होंने सिटी मजिस्‍ट्रेट  गोरखपुर सहित शासन प्रशासन के उच्चाधिकारियों व आरएनआई को पत्र लिखकर वस्तुस्थिति से अवगत कराया।

सिटी मजिस्‍ट्रेट ने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर जांच में पाया कि लालजी भ्रमर ने जालसाजी किया है और उन्होंने स्थानीय कैन्ट पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। मुकदमा कायम होने की खबर मिलते ही लालजी भ्रमर घबरा गये और उन्होंने पहले प्रार्थना पत्र और बाद में शपथ पत्र के जरिए राष्‍ट्र चिन्ह को पुनः रामवचन प्रसाद जी को सौंपते हुए यह कहा कि वह भविष्‍य में कभी भी इस तरह का बर्ताव नहीं करेंगे। उनके पिता रामवचन प्रसाद ही राष्‍ट्र चिन्ह के स्वामी, मुद्रक प्रकाशक व सम्पादक थे और आगे भी रहेंगे। तीनों भाई अपने पिता के अनुसार पूर्व की भांति समाचार पत्र में सहयोग करते रहेंगे। इस समझौते के बाद भी तीनों पुत्रों के मन में राष्‍ट्र चिन्ह को हथियाने की ललक बनी हुई है।

रामवचन प्रसाद ने अपने जीवनकाल में ही तीनों पुत्रों के लिए अलग-अलग जमीन लेकर मकान आदि बनवाकर स्थापित करा दिया है। तीनों के नामों से विभिन्न समाचार पत्रों को संचालित करा दिया है ताकि उनके किसी प्रकार का कोई तकरार न रहे और वे सभी अपने परिवार का भरण पोषण करते रहें। बावजूद इसके इनके तीनों पुत्रों को सिर्फ और सिर्फ राष्‍ट्र चिन्ह का ही स्वामित्व चाहिए क्योंकि राष्‍ट्र चिन्ह का मार्केट व विभागों में लगभग 25 लाख रुपए बकाया है,  जिसे इनके पुत्रों द्वारा ही रोका गया है। 86 वर्षीय रामवचन प्रसाद चूंकि शुरू से ही अन्दर का ही कार्य करते आ रहे हैं इसलिए उनके द्वारा इन भुगतानों को लाना संभव नहीं है,  जिसका लाभ इनके पुत्रों द्वारा उठाया जा रहा है। इनके पुत्रों की मंशा है कि वह राष्‍ट्र चिन्‍ह को हथिया लें,  जबकि रामवचन प्रसाद अपने जीवनकाल में ऐसा नहीं होने देना चाहते। उनका मानना है कि उनके इस सम्पत्ति में उनके सभी पुत्रों व पौत्रों का अधिकार हो।

इसी क्रम में 6 जनवरी 2011 को पुनः जब रामवचन प्रसाद बीमार हुए तो उनके पुत्रों ने उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया और उसी दरम्यान एक बार पुनः राष्‍ट्र चिन्ह को हथियाने का कुचक्र रचा और इस बार भी उन्होंने धोखाधड़ी करके अस्वस्थ पिता से कई दिनों तक सादे कागजों पर हस्ताक्षर कराकर उक्त समाचार पत्र का स्वामित्व अपने नाम करने का षडयंत्र रचा,  जिसमें वह सफल हो गये। स्वस्थ्य होने पर पुनः पिता रामवचन प्रसाद को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से किया। एडीएम सिटी गोरखपुर अखिलेश तिवारी को जब इस बात की जानकारी हुई तो वह अवाक रह गये और उन्होंने रामवचन प्रसाद जी का कलमबन्द बयान लेकर एक पत्र आरएनआई को जारी किया। आरएनआई ने एडीएम सिटी गोरखपुर के पत्र पर विचार करते हुए रामवचन प्रसाद को ही राष्‍ट्र चिन्ह का स्वामी मानते हुए एक पत्र जारी किया। इसके बावजूद भी गोरखपुर जिले का प्रशासन, सहायक सूचना निदेशक, गोरखपुर और पुलिस के आला अधिकारी लालजी भ्रमर के प्रभाव में आकर कार्य कर रहे हैं और रामवचन प्रसाद लगातार उत्पीड़ित हो रहे हैं।

रामवचन प्रसाद ने अपनी बात बीती स्थानीय थाने से लेकर जिलाधिकारी, आयुक्त, आरएनआई, मुख्यमंत्री, गृह सचिव, सहित तमाम प्रशासन व पुलिस के अधिकारियों को लगभग दर्जनों शपथ पत्र व शिकायती व प्रार्थना पत्र दिये लेकिन उनके किसी भी पत्र पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और न ही लालजी भ्रमर के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई की गयी,  बल्कि लालजी भ्रमर के प्रभाव में आकर पुलिस व प्रशासन के लोगों द्वारा रामवचन प्रसाद के साथ नाइंसाफी ही की जा रही है। 86 वर्षीय वृद्ध, बीमार और लाचार रामवचन प्रसाद आज भुखमरी के कगार पर पहुंचे हैं,  तो सिर्फ इसलिए कि उनके पुत्रों ने तो कपुतता का परिचय दिया ही है,  न्याय की कामन संभालने वाली पुलिस व प्रशासन के लोग भी उनका साथ नहीं दे रहे हैं। स्थानीय पुलिस ने तो उनका मुकदमा तक दर्ज करने से इनकार कर दिया,  जिससे उनके पुत्रों का मनोबल बढ़ता जा रहा है।

डीआईजी तक इस मामले में कुछ नहीं कर सके। थानेदार लालजी भ्रमर से दोस्ताना निभा रहे हैं और सभी उनका ही सहयोग कर रहे हैं। मीडिया जगत से जुड़े लोग भी रामवचन प्रसाद की नहीं सुन रहे हैं। आज कोई एक भी उनकी आपबीती सुने और उनका साथ दे तो सच्चाई सामने आ जायेगी। रामवचन प्रसाद अपने पूरे जीवनकाल में हर जरूरतमंदों की मदद करते रहे हैं। उनके बताये रास्ते पर चलकर आज पूर्वांचल के कई लोग अखबारों के मालिक बने मलाई काट रहे हैं जबकि रामवचन प्रसाद सूखी रोटी के लिए तरस रहे हैं। दवा कराने का भी उनमें कुव्‍वत नहीं रह गया है क्योंकि मतलब सिद्ध होने के बाद पुत्रों ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है। भुखमरी व बीमारी से दम तोड़ देंगे रामवचन प्रसाद तो पुत्रों की जीत तो निश्चित ही है।

इतना ही नहीं कुछेक पत्रकार संगठन भी लालजी भ्रमर के इशारे पर कार्य कर रहे हैं और रामवचन प्रसाद को गलत व धोखेबाज कहते हैं जबकि सच्चाई यह है कि धोखेबाज लालजी भ्रमर और उनके सहयोगी हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो राष्‍ट्र चिन्ह को हथियाने के लिए ही लालजी भ्रमर क्यों परेशान रहते हैं जबकि उनके पास अपना खुद का तीन-चार अखबार है। अगर राष्‍ट्र चिन्ह के धन से उन्हें प्रेम नहीं है तो वह अपना अखबार क्यों नहीं चला रहे हैं जिससे उनका धनपोषण हो सके। अंत में मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि यह मेरे मन की भड़ास है। अगर रामवचन प्रसाद के मरने के बाद उनके साथ इंसाफ हो तो उस इंसाफ का क्या लाभ!

जितेन्द्र कुमार

09454958146

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. jitendra kumar

    September 21, 2011 at 6:44 pm

    putra to kuputra hote hi hai.

  2. ram ji

    November 5, 2011 at 7:32 pm

    chup ba

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...