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लांचिंग के पहले ही हमवतन में आंतरिक घमासान

साईं प्रसाद मीडिया ग्रुप के साप्‍ताहिक अखबार हमवतन में लांचिंग के पहले ही उठापटक शुरू है. अखबार अभी लांच भी नहीं हुआ और यहां काम करने वाले लोगों के इगो टकराने लगे हैं, जिसके बाद एक दूसरे को निपटाने के अंदाज में राजनीति तेज हो गई है. बड़े-बड़े दावों के साथ शुरू होने की घोषणा करने वाला यह अखबार लांचिंग के पहले ही रणक्षेत्र में तब्‍दील होने लगा है. पुराने लोग हटाए जाने की आशंका से परेशान हैं. संपादकों को लेकर भी तमाम तरह की चर्चाएं हैं.

साईं प्रसाद मीडिया ग्रुप के साप्‍ताहिक अखबार हमवतन में लांचिंग के पहले ही उठापटक शुरू है. अखबार अभी लांच भी नहीं हुआ और यहां काम करने वाले लोगों के इगो टकराने लगे हैं, जिसके बाद एक दूसरे को निपटाने के अंदाज में राजनीति तेज हो गई है. बड़े-बड़े दावों के साथ शुरू होने की घोषणा करने वाला यह अखबार लांचिंग के पहले ही रणक्षेत्र में तब्‍दील होने लगा है. पुराने लोग हटाए जाने की आशंका से परेशान हैं. संपादकों को लेकर भी तमाम तरह की चर्चाएं हैं.

इस अखबार को लेकर कहा जा सकता है कि पूत का पांव पालने में ही नजर आने लगा है. राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक अखबार के प्रकाशन को लेकर प्रबंधन भ्रम की स्थिति में है. ऐसा लग रहा है कि कुंए में भांग पड़ी हुई है. प्रबंधन ने पहले इस अखबार को दिल्‍ली से लांच करने की घोषणा की थी.  इसके लिए आउटलुक से इस्‍तीफा दिलाकर सुमंत भट्टाचार्या को लाया गया. उन्‍हें हमवतन के संपादक की जिम्‍मेदारी सौंपी गई. अखबार के लांचिंग और टीम तैयार करने की जिम्‍मेदारियां उनके कंधों पर डाल दी गई.

अचानक प्रबंधन ने अपना विचार बदल दिया. घो‍षणा हुई कि अब इस अखबार को मध्‍य प्रदेश की राजधानी भोपाल से पहले लांच किया जाएगा. सुमंत भट्टाचार्या को जब अखबार की लांचिंग के लिए भोपाल जाने का ऑफर दिया गया तो उन्‍होंने इसे ठुकरा दिया. जिसके बाद उनकी एंट्री ग्रुप के समाचार चैनल न्‍यूज एक्‍सप्रेस में करा दी गई. उन्‍हें एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर का पद दे दिया गया.  इसके बाद भोपाल में ‘पंचायत पोस्‍ट’ नामक खुद का अखबार निकालने वाले रवि प्रकाश श्रीवास्‍तव उर्फ आरपी श्रीवास्‍तव को इस अखबार का संपादक बना दिया गया.

भोपाल से भी लांचिंग की तैयारियां शुरू कर दी गईं. तमाम लोगों की नियुक्तियां की गईं. इसके बाद आरपी श्रीवास्‍तव के नेतृत्‍व में इस अखबार के दो-तीन डमी भोपाल से निकाले गए. फिर इसको लांच करने की अंतिम तैयारी को अंजाम दिया जाने लगा. अचानक प्रबंधन को फिर नशा हुआ और उस ने अपना विचार बदल दिया.  अखबार को दुबारा दिल्‍ली से लांच कराने की तैयारी शुरू कर दी गई. अखबार की लांचिंग कराने की जिम्‍मेदारी आरपी श्रीवास्‍तव के साथ स्‍वाभिमान टाइम्‍स को छोड़कर आए निर्मलेंदु साहा को सौंपी गई. साहा को अखबार का कार्यकारी संपादक बना दिया गया.

इसके बाद से ही अखबार के भविष्‍य को लेकर आशंकाएं व्‍यक्त की जाने लगीं. कारण निर्मलेंदु साहा का करियर रिकार्ड और उनकी काबिलियत पर उठाए जाने वाले सवाल थे. साहा दैनिक जागरण से इस्‍तीफा देकर वे पी7 न्‍यूज चैनल पहुंचे थे, पर वे वहां ज्‍यादा दिन तक टिक नहीं पाए. उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया. इसके बाद वे न्‍यूज 24 पहुंचे वहां भी उनका गुजारा नहीं हुआ. वहां से गिरे तो स्‍वाभिमान टाइम्‍स पर आकर अटक गए. यह अखबार भी इनकी छाया में फल-फूल नहीं सका. यह अखबार भी बंद हो गया. इसके बाद निर्मलेंदु हमवतन आ पहुंचे. अब इस अखबार के लांचिंग में इनको भी जिम्‍मेदारी निभानी है.

सूत्रों का कहना है कि इसके बाद से ही हमवतन के भीतर की फिजां गड़बड़ा गई. निर्मलेंदु साहा ने स्‍वाभिमान टाइम्‍स के अपने कई साथियों को लाकर यहां फिट करा दिया. आरपी श्रीवास्‍तव द्वारा की गई कई नियुक्तियां लटका दी गईं. नए लोगों की टीम ने पुराने लोगों को महत्‍व देना कम कर दिया, जिससे ऑफिस के अंदर अविश्‍वास का माहौल उत्‍पन्‍न होने लगा. रही सही कसर एक दूसरे को निपटाने की कोशिशों ने बिगाड़ दिया. खबर है कि डमी अखबार निकलने के बाद से स्थिति और भी खराब हो गई है. अखबार के लुक और कंटेंट को लेकर तो तमाम सवाल हैं हीं, प्रिंट लाइन पर विवाद शुरू हो गया है.

हमवतन के डमी में सबसे पहले कार्यकारी संपादक निर्मलेंदु साहा का नाम है, इसके बाद संपादक का नाम प्रकाशित किया गया है. इसके बाद महाप्रबंधक सुबोध आचार्य का नाम है. खबर है कि हमवतन के कार्यालय पहुंचे संपादक आरपी श्रीवास्‍तव को बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी गई. जिससे आहत होकर वो वापस भोपाल लौट गए. माना जा रहा है कि अपने साथ हुए इस अपमानजनक व्‍यवहार के बाद उन्‍होंने अखबार छोड़ने का मन बना लिया है. अब पूरी सच्‍चाई क्‍या है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, परन्‍तु बताया जा रहा है कि उन्‍होंने वापस लौटने का विचार त्‍याग दिया है.

दिल्‍ली से हमवतन की जो डमी निकाली गई है, इसको लेकर भी संपादकीय के लोगों में संतुष्‍िट नहीं है. यह अखबार समाचार से ज्‍यादा फीचर से भरा पड़ा है. और ज्‍यादातर खबरें कट और पेस्‍ट की गई हैं. मौलिकता का भी अभाव पूरी तरह झलक रहा है. भीतर के पेजों का ले आउट तथा लुक भी स्‍तरीय नहीं है. जिससे इस अखबार के भविष्‍य को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. इतना खर्च के बाद भी जब लोगों को स्‍तरीय कंटेंट और खबरें नहीं मिलेंगी तो फिर क्‍यों कोई इसे खरीदेगा.

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0 Comments

  1. दीपक खोखर, आकाशवाणी संवाददाता, रोहतक(हरियाणा)

    July 16, 2011 at 3:50 am

    शुरू होने से पहले ही बंद होने के संकेत

  2. Anil Pande

    July 16, 2011 at 5:39 am

    ये तो होना ही था !

    आप पहले नियुक्तियों के लिए विज्ञापन निकलते हो , फिर अपने साले – बहनोइयों और अपने अंडकोष से चिपके रहने वाले पिस्सुओं को पिछले दरवाज़े से भर देते हो .
    उसी का ये रिजल्ट है .

    हिंदी के ऐसे कुडानुमा, कुकुरमुत्ते अख़बार-चैनल निकलते रहेंगे .
    करोड़ों रूपये के वेंचर हिंदी पत्रकारिता के ये कीड़े चाट जाते हैं , फिर दूसरे ठिकाने की ओर रवाना हो जाते हैं .

    अफ़सोस की बात है !

  3. haji quabiz

    July 16, 2011 at 11:24 am

    राष्ट्रिय अख़बार निकलना कोई बच्चो का खेल नहीं हे थोड़ी बहुत परेशनी तो होती हे राष्ट्रिय अख़बार हमवतन को शुभकामनाय

  4. news time of india

    July 16, 2011 at 5:26 pm

    chitfundi akhbaar ka yahi haal hona hai.

  5. devesh pal singh

    July 25, 2011 at 6:54 pm

    gadhe panjeeree khaa rahe hain …………

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