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‘लोकमत’ की ईमानदारी, मालिक के पीए की रिश्वतखोरी की खबर प्रकाशित

मुंबई : इसे कहते है ईमानदार पत्रकारिता. मराठी के सबसे बड़े अखबार लोकमत के मालिक और महाराष्ट्र के स्कूली शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा का निजी सहायक मंत्रालय में किसी से घूस लेते हुए पकड़ा गया. लोगों को लगा कि मामला अख़बार के मालिक का है इस कारण लोकमत ग्रुप में यह खबर प्रमुखता से नहीं छपेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सुबह लोकमत (मराठी) सहित लोकमत समाचार (हिंदी)  व लोकमत टाइम (अंग्रेजी) में यह खबर पहले पेज पर प्रमुखता से छापी गयी.

मुंबई : इसे कहते है ईमानदार पत्रकारिता. मराठी के सबसे बड़े अखबार लोकमत के मालिक और महाराष्ट्र के स्कूली शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा का निजी सहायक मंत्रालय में किसी से घूस लेते हुए पकड़ा गया. लोगों को लगा कि मामला अख़बार के मालिक का है इस कारण लोकमत ग्रुप में यह खबर प्रमुखता से नहीं छपेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सुबह लोकमत (मराठी) सहित लोकमत समाचार (हिंदी)  व लोकमत टाइम (अंग्रेजी) में यह खबर पहले पेज पर प्रमुखता से छापी गयी.

लोकमत समाचार और लोकमत (मराठी) में छपी खबर इस प्रकार है-

मंत्रालय में रिश्‍वत लेते 3 गिरफ्तार

आरोपियों में निजी सहायक, लिपिक और सहायक शामिल

मुंबई । 22 सितंबर (ब्यूरो) : मंत्रालय में आज तीन लोगों को रिश्‍वत लेते रंगेहाथ गिरफ्तार किया गया. इनमें से एक आरोपी दीपक रामचंद्र कारंडे शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा का निजी सहायक है तथा अन्य दो लोग प्रवीण कचरेश्‍वर बोड.के (लिपिक) व प्रशांत दादासाहेब अंधारे (सहायक) शालेय शिक्षण विभाग में कार्यरत हैं.

भ्रष्टाचार प्रतिबंधक विभाग से मिली जानकारी के अनुसार फरियादी की नासिक में एक शिक्षण संस्था है. उसे जिला परिषद के प्राथमिक शिक्षण अधिकारियों ने मान्यता दी है. इस संस्था ने 2010 -11 सत्र से आठवीं से बारहवीं तक की अंग्रेजी माध्यम की कक्षाओं को गैर अनुदानित आधार पर मान्यता देने के लिएशालेय विभाग की ओर प्रस्ताव भेजा था. उस पर अवर सचिव द्वारा कुछ निर्देश दिए गएथे. उसके अनुसार त्रुटियां दुरुस्त कर फिर से प्रस्ताव शालेय विभाग की ओर भेजा गया था. इस संदर्भ में विभाग की ओर से कोई जानकारी नहीं मिलने पर संस्था संचालक ने सहायक प्रशांत अंधारे से मुलाकात की.

उन्होंने प्रस्ताव आगे बढ.ाने के लिए50 हजार रु. की मांग की. अंतत:यह सौदा 30 हजार में तय हुआ. उसमें से 15 हजार रु. की पहली किस्त लेने के बाद अंधारे ने प्रस्ताव को शिक्षक सूची में दर्ज किया और शेष राशि लेकर आने के लिए कहा. उसने उनसे कहा कि उसके अधीन का काम हो गया है. आगे की प्रक्रिया के लिएमंत्री महोदय के निजी सहायक दीपक कारंडे से मिलें. इस पर फरियादी ने उनसे संपर्क किया. उन्होंने फाइल आगे सरकाने के लिए90 हजार रु. की मांग की. उसमें पहली किस्त 50 हजार रुपए देने के लिए कहा. भ्रष्टाचार प्रतिबंधक विभाग के दस्ते ने उपमहानिरीक्षक निकेत कौशिक के मार्गदर्शन में जाल बिछाया और कारंडे को 50 हजार रुपए तथा प्रवीण बोडके को 15 हजार रुपए की रिश्‍वत लेते रंगेहाथ पकड. लिया. इन दोनों सहित अंधारे के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है.

मीडिया से जुड़ी किसी भी प्रकार की सूचना भड़ास4मीडिया तक पहुंचाने के लिए आपको बस सिर्फ एक मेल करने की जरूरत है. भड़ास की गोपनीय मेल आईडी [email protected] है. सूचना देने वाले के नाम-पहचान का खुलासा किसी भी कीमत पर नहीं किया जाएगा.

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0 Comments

  1. हिना रब्बानी खार हिन्दुस्तानी

    September 23, 2011 at 7:35 pm

    इसे शायद विशुद्ध पत्रकारिता कहें लेकिन खबर लिखने वाले पत्रकारों के साथ प्रबंधन क्या सुलूक करता है. देखना उचित होगा. कृपया उसको भी छापने की कोशिश करें..

  2. कुमारसौवीर, लखनऊ

    September 25, 2011 at 7:28 pm

    हिना रब्‍बानी खान जी।
    पहली बात तो आप कभी हिन्‍दुस्‍तानी हो ही नहीं सकती़ या सकते।
    दूसरी बात यह कि आपकी यह उम्र केवल इसी लायक है कि आप जहां भी जाएं, अपनी अदाओं से मीडिया को नचाती रहें।
    तीसरी बात यह कि आपको पाकिस्‍तान के आतंकवादियों का समर्थक न होने देने के बयान जारी करने से ही फुर्सत नहीं है।
    चौथी बात यह कि अमेरिका में आप फिलहाल यह धमकी देती घूम रही हैं कि अमेरिका अगर यही रवैया अपनाये रखेगा तो एशिया में वह पाकिस्‍तान जैसा दोस्‍त खो देगा।
    पांचवीं बात यह कि आप राजनीति में कठमुल्‍लावाद से न उबर पाने में ही अपनी जीत समझ रही हैं।
    तो अब हो गयी ना पांच चवन्‍नी, यानी पूरा का पूरा सवा रूपया। यह हिन्‍दुस्‍तान में प्रसाद चढाते समय बहुत शुभ माना जाता है और इस दौरान अशुभ बातें करने की इजाजत नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे आपके यहां बलात्‍कार का सुबूत एक नमाजी के मुकाबले दो महिलाओं के बराबर माना जाता है।
    तो अब असल बात पर आ जाएं। हिन्‍दुस्‍तान ही नहीं, दुनिया का शायद कोई भी समाचार संस्‍थान ऐसा नहीं है जिसका संपादक या रिपोर्टर अपने संस्‍थान के मालिक से जुड़ी किसी भी खबर को बिना इजाजत छाप सके।
    तो गुजारिश है कि यकीन मानिये, लोकमत में भी यही हुआ होगा।
    अब तो यह राजेंद्र दर्डा की दयानतदारी है कि वे न तो इस मामले में लिप्‍त थे, बल्कि ऐसी हरकतों को प्रश्रय भी नहीं देते थे। जैसा कि खबर से ही स्‍पष्‍ट है।
    कहां मिलते हैं आजकल ऐसे मालिक और संपादक।
    मैं तो कहूंगा कि इन लोगों ने ही आजाद पत्रकारिता की मशाल को अपने स्‍वार्थ में भले ही इस्‍तेमाल किया हो, लेकिन उसे जलाये रखने का दमखम तो दिखाया ही है।
    खैर छोडि़ये। आप अपनी बताइये, कैसी सिंवइयां पसंद करते हैं आपके यहां के आपके प्रियतम आतंकवादी जिन्‍हें आप लोग अपने दामाद की तरह सम्‍मान देते हैं।
    हालांकि हमारे यहां भी कसाब और अफजल गुरू भी सरकार की ओर से मिलने वाली बिरयानी और बंदगोश्‍त के खासे मुरीद हैं।
    जाहिर है कि हमारी और आपकी सरकार नीयत के मामले में एक जैसी ही है।
    तो, सरबजीत सिंह के लिए रस्‍सा-वस्‍सा तो तैयार करवा ही लिया होगा आपने।

  3. shravan shukla

    September 27, 2011 at 10:18 am

    sauvir ji.. hahaha.. aap is khar par kyu bhadak uthe? aur faltu me hi itni mehnat kar dali? pahli haai ki pakistaniyon ko hindi padhni nahi aati to likhengi.. upar yeh kisi bhi videsh mantri ke pass wokt nahi hota.. aap dono par vichar kare.. urdu-hindi lafz ek hain magar likhne me ekdam ulte.. so yeh wo rabbani nahi hai jinhe aap samajh rahe hain…

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