: जेएनयू में लोहिया जन्मशताब्दी के अवसर पर गोष्ठी : डा. राममनोहर लोहिया के जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मंगलवार शाम जयप्रकाश प्रतिष्ठान की ओर से जेएनयू के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज में ‘भारतीय समाज की चुनौतियां और राममनोहर लोहिया’ विषय पर गोष्ठी आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ समाजवादी चिंतक मस्तराम कपूर ने की.
इस अवसर पर त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका ‘अकार’ के ‘लोहिया स्मरण’ अंक का लोकार्पण भी किया गया. कार्यक्रम में बीज वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ समाजशास्त्री प्रो. योगेन्द्र सिंह ने कहा कि लोहिया जी की रचनाओं को समसामयिक संदर्भ में फिर से पढने की जरूरत है. लोहिया की कही हुई बातों को आज स्वीकारा जा रहा है. प्रो. सिंह ने जाति और क्षेत्रीय संस्कृति के संदर्भ में डा. लोहिया की विचारों की सराहना की.
कार्यक्रम का आरंभ में समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार ने भारतीय राजनीति में डा. लोहिया के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि लोकसभा के अपने 4 साल के कार्यकाल में डा. लोहिया ने इतना लिखा और बोला, जितना शायद दुनिया किसी सांसद ने इतने कम कार्यकाल में नहीं किया. यह ‘लोकसभा में लोहिया’ नाम से 16 खण्डों में प्रकाशित है. वे 24 बार जेल गए. जयप्रकाश जी ने उनके जाने के बाद उनके बनाए रास्ते पर चलकर हिन्दुस्तान की जनता को संपूर्ण क्रांति के आंदोलन से जोडा. लोहिया ने भाषा के स्तर पर भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा पर बल दिया, जाति के मसले पर समता के लिए विशेष अवसर के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. उनहोंने आगे कहा कि ‘अकार का यह अंक मार्गदर्शक ज्योतिपुंज की तरह है. लोहिया नर-नारी समता के समर्थक थे.
हिन्दी साहित्यकार और ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक रमणिका गुप्ता ने लोहिया की भाषा नीति की प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि वे स्त्री समता की बात अवश्य करते थे किंतु स्त्री को महिमामंडित करने के पक्षधर नहीं थे. बेबाकी के अपनी बात रखने का साहस लोहिया में ही था. उन्होंने हमें आजादी के आदर्शों में बहकने से रोका और यथार्थ की जमीन पर लेकर आए. अर्थशास्त्री प्रो. सतीश जैन ने कहा कि लोहिया की मदद से ही हम वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा में कदम उठा सकते हैं. राजनीति वैज्ञानिक प्रो. गोपाल गुरू ने लोहिया को एक गंभीर चिंतक के रूप में याद करते हुए कहा कि एक चिंतक के रूप में वे भारतीय और पाश्चात्य, दोनों की परंपराओं को आत्मसात करते हैं. लोहिया ने ही हमें जीवन में जोखिम उठाने का सबक सिखाया और आत्मसम्मान का रास्ता दिखाया. मीडिया विश्लेषक डा. आनंद प्रधान ने कहा कि भारतीय समाज और राजनीति को समझने में लोहिया हमारी मदद करते हैं. आज देश में सचमुच एक वैकल्पिक राजनीति की जरूरत है और उस विकल्क को खडा करने में लोहिया के विचारों की आवश्यकता है.
अध्यक्षीय भाषण देते हुए वरिष्ठ समाजवादी चिंतक मस्तराम कपूर ने कहा कि लोहिया की कही कई अधिकांश बातें आज सच होती दिख रही है. वे कहा करते थे- ‘लोग मुझे याद करेंगे, लेकिन मेरे मरने के बाद’. लोहिया ने हमेशा उपेक्षा सही. उनके लेखों को छपने से रोका गया. वर्तमान में उठने वाली समस्याओं का हल खोजने के क्रम में अब लोहिया की विचाराधारा की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित होने लगा है. ‘अकार’ के संपादक और साहित्यकार गिरिराज किशोर ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि लोहिया को पढते हुए हमें सावधानी बरतनी चाहिए और छद्म लोहियावादियों से भी सतर्क रहना चाहिए.
कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजवादी सुरेन्द्र मोहन, समाजवादी पार्टी के उपाध्यक्ष ब्रजभूषण तिवारी, हिन्दी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, प्रो. राजकुमार जैन, सुधीन्द्र भदौरिया, कुसुम दास, डा. रमण प्रसाद सिन्हा, गंगा सहाय मीणा, विद्यार्थी युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरमान, पत्रकार शशिभूषण कुमार सहित बडी संख्या में विद्यार्थी मौजूद थे. कार्यक्रम के अंत तक कमेटी हॉल खचाखच भरा रहा. प्रेस विज्ञप्ति












मनमोहन
September 24, 2010 at 8:23 am
अच्छी खबर देने के लिए धन्यवाद. इस सेमिनार ने यह साबित कर दिया कि लोहिया बीते जमाने के चिंतक नहीं बल्कि आगामी समय के चिंतक हैं.