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वे कमेंट मारते हैं तो सोचती हूं कि उन्हें गालियां सुना दूं

: शुरुआत के लिए हिम्मत ही काफी है : पिछले 5 सालों से मैं नोएडा शहर में रहती हूं। इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करती हूं… काम के सिलसिले में कई बार रात को 10 बजे के बाद भी मुझे अकेले घर जाना होता है, ऐसे में मुझे पूरी तरह सतर्क रहना पड़ता है कि मेरे आस पास के लोग जो मेरे साथ चल रहे हैं किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं…

: शुरुआत के लिए हिम्मत ही काफी है : पिछले 5 सालों से मैं नोएडा शहर में रहती हूं। इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करती हूं… काम के सिलसिले में कई बार रात को 10 बजे के बाद भी मुझे अकेले घर जाना होता है, ऐसे में मुझे पूरी तरह सतर्क रहना पड़ता है कि मेरे आस पास के लोग जो मेरे साथ चल रहे हैं किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं…

क्योंकि पता नहीं रहता कब कौन क्या करे, कभी कोई कमेंट मारता है तो कभी अश्लील शब्दों का प्रयोग, अक्सर अकेले होने की वजह से कुछ नहीं कह पाती ऐसे में लगता है जैसे किसी ने मेरे साथ जाने क्या कर दिया कई बार घुटन होती है, कि लोग ऐसा क्यों करते हैं, कई बार लगता है कि गालियां सुना दूं लेकिन अकेलपन और रात का सन्नाटा ऐसा करने की हिम्मत नहीं देता…मन मसोस कर रह जाना होता है, लेकिन वो पल झकझोर देते हैं अंदर तक…ऐसे में कभी सोचती हूं कि जिन बहनों के साथ बलात्कार जैसा कृत्य हुआ होता है वो किस तरह जी पाती होंगी, और वो बच्ची जिसने इस दंश को झेला है उसकी मनहस्थिती कैसी होती होगी…

एक बार पाकिस्तानी लेखक मंटो की एक कहानी पढ़ी थी “खोल दो” अगर आपने नहीं पढ़ी हो तो ज़रूर एक बार पढ़ियेगा हिला कर रख देगी अन्तरात्‍मा को आपकी…मैं सोचती हूं कि किसी के लिखे शब्द जब मानस पटल पर हमें झकझोरते हैं तो बलात्कार की शिकार हुई महिला, युवती या बच्ची का क्या होता होगा??? हर क्षण उस दंश के एहसास के साथ जीना और दोषी को खुले आम देखना कितना दर्द दायक होता होगा… दुर्भाग्य ये है कि जब घटना हमारे साथ घटती है हमें तभी एहसास होता है..  दूसरे का एहसास सिर्फ इतना है कि टीवी पर या अखबार में ऐसी ख़बरें देखकर शायद आपका उस चेनल पर रिमोर्ट थम जाये या अख़बार में इस तरह की ख़बर को देखकर आप थोड़ा अफ़सोस जता लें, लेकिन मुहीम कैसे छिड़ेगी बड़ा सवाल है?

2008 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट में देश में बच्चों के साथ होने वाले बलात्कार के कुल 5,446 मामले दर्ज किये गये… ग़ौर कीजिएगा.. दर्ज किये गये… क्योंकि कितने होंगे ये तो शायद आप समझ ही सकते हैं क्योंकि सरकारी आंकड़ों के बारे में आप भी जानते हैं, और सरकार भी… हमारे देश का दुर्भाग्य ये है कि जिस चीज़ के साथ सरकारी शब्द जुड़ जाता है वहां से विश्वास उठ जाता है, अब इसके बारे में आपको ज़्यादा समझाने की ज़रूरत तो होगी नहीं मुझे क्योंकि ये कोई रॉकेट साइंस तो है नहीं…

कितनी ही बार बलात्कार के मामले में घर के लोग यानी अपने ही लोग शामिल होते हैं, ऐसे में मामले को या तो दबा दिया जाता है या फिर लड़की को घर परिवार की इज़्जत का वास्ता देकर चुप रहने के लिए बोल दिया जाता है… क्या होता होगा उस लड़की का… कहते हैं जहर से मरना इतना ख़तरनाक मौत नहीं जितना स्लो पॉइज़न यानी धीमे ज़हर से मरना ख़ौफनाक होता है, वो लड़की तो हर रोज़ स्लो पॉइज़न से मरती होगी न… अभी हाल ही की घटना लखीमपुर खीरी में 14 साल की सोनम के साथ जो हुआ वो कितना ख़ौफनाक था,  इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बलात्कार के बाद उसकी लाश को पेड़ से लटका दिया गया और उसे आत्महत्या का नाम देने की भी कोशिश की गयी…

पहले उस बच्ची का मानसिक, शारिरिक और फिर आत्मिक तक बलात्कार किया गया और वो भी उन लोगों के द्वारा जिन्हें देश और समाज की सुरक्षा के लिए बैठाया गया था…  सोनम के ग़रीब मां बाप कितनी लड़ाई लड़ पायेंगे अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए, कुछ दिनों बाद बाकी पड़े बलात्कार के मामलों की तरह ये केस भी बंद हो जायेगा… लेकिन सवाल ये है कि हम कब तक सोये रहेंगे.?  उत्तर प्रदेश के ही कन्नौज ज़िले में भी एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश का मामला सामने आया,  जिसमें लड़की के विरोध करने पर बलात्कारियों ने उस लड़की की आंखों को चाकू से रौंदा… मानवता और मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर ऐसा करने वाले लोगों के ख़िलाफ क्या होता है हमारे समाज में, यहां तो न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह? मीडिया पर प्रश्नचिन्ह? सुरक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह? मानवता पर प्रश्नचिन्ह? मानव मूल्यों पर प्रश्न चिन्ह? यानी हर बात पर, हर व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं… क्या हिम्मत है हम सब में इन सब प्रश्नचिन्हों को मिटाने की… एक बार इस बात पर बात पर प्रश्नचिन्ह? लगाकर देखिए भले ही इन्हें मिटा न पायें लेकिन मिटाने की हिम्मत तो आ ही जायेगी और शुरुआत के लिए हिम्मत ही काफी है….

लेखिका बबिता अस्‍थाना सीवीबी न्‍यूज में एसोसिएट प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर कार्यरत हैं.

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0 Comments

  1. shakti

    June 29, 2011 at 3:32 pm

    des me ase kaei mamle he jish pr nahi sarkar or nahi samaj gamvrta se leraha he aane wo le dino me esthti or v bhya wo ho skti he.

  2. श्रीकांत सौरभ

    June 29, 2011 at 6:43 pm

    बबीता जी,आपने लेखनी से मुद्धा तो बढ़िया उठाया है लेकिन सामाजिक तौर पर ही यह सटीक बैठता है.वह भी कथित बुद्दिजीवियों को पढ़ाने के लिए व्यक्तिगत सोच मात्र है,जिससे आपकी रचनात्मकता झलकती है.यदि सच में यह आपके निजी अनुभव पर आधारित है तो इतना जरूर कहना चाहुंगा कि आप भीतर से निहायत ही डरी हुई है….और यह मामला हकीकत कम सायकोलॅाजिकल ज्यादा लगता है,क्योंकि जिसे हम डर कहते हैं वह और कुछ नहीं, महज एक भ्रम होता है.एक दिमागी फितुर को बेवजह इतना तूल देना कतई व्यवहारिक नहीं है.आप जिस एनसीआर में रहती हैं वहां कंक्रिटों का जंगल है.इनमें आपकी जैसी लाखों लड़कियां व महिलाएं ,नौकरी या पढ़ाई की मजबूरी को लेकर प्राय: अकेली ही रहती है.यहां का जीवन इतना गतिशील है कि एक-दूसरे की निजी जिंदगी में ताक-झांक करने की फुर्सत शायद ही किसी के पास हो.फिर भी इन जगहों पर कभी-कभी बलत्कार जैसी घिनौनी वारदात हो जाया करती है,जोकि एक सभ्य समाज के लिए करारा तमाचा है.वहीं लड़कियों पर अश्लील फब्तियां कसने या उनसे छेड़खानी की घटना यहां आम बात हो चली है.जिससे आए दिन दो-चार होना महानगरीय लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है.खैर,एक पत्रकार के तौर पर कुछ चीजों की जानकारी आपको जरूर होगी.यह कि भारतीय महानगरों में शादी से पहले 30 प्रतिशत युवा जोड़ों के बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बनाए जा रहे हैं.इसकी वजह है करियर की आपाधापी में देर से शादी का प्रचलन.यानी 70 प्रतिशत वर्जिनटी(कंुवारापन) अभी भी बरकरार है.जबकि महानगरीय आबादी की तुलना में बलत्कार का दर 0.00001 के आस-पास ठहरता है.यह हम नहीं बल्कि भारत के स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं के आंकड़े बतलाते हैं.अब आप ही बताइए,बलत्कार के बारे सोचकर खुद को मानसिक परेशानी में डालना या बेवजह हाय-तौबा मचाना उचित है.या फिर खुद को 70 प्रतिशत के सेफ जोन में रखकर अपने काम में लीन रहना.जहां तक मेरा मानना है कि यदि लड़कियों का पहनावा सलीका भरा हो.सोच सकारात्मक व चेहरे से आत्मविश्वास झलकता हो तो बहुत सारी परेशानियां खुद-ब-खुद दूर हो जाती है.अभिभावकों का भी यह नैतिक दायित्व बनता है कि लड़कियों को शुरू से ही माशर्ल आर्ट की ट्रनिंग दिलवाएं.ताकि स्ट्रीट रोमियो या लोकल गुन से वह खुद ही निपट सकें. श्रीकांत सौरभ मो. 9473361087

  3. purushottam kumar singh

    June 30, 2011 at 4:48 am

    चलिए बढ़िया है जब सारे समाचार चैनल यूपी में बलात्कार की ख़बरों को विशेष कबरेज दे रहे है ऐसे में इस ज्वलंत मुद्दे पर आपका आलेख समय के मुताबिक सही है…..लेकिन जो भी सज्जन आपके आलेख को पढेंगे वो आपके सिर्फ लिख देने के शौक से ठगा महसूस करेंगे ……..बलात्कार समाज के लिए कलंक है ये शायद ही किसी को बताने की जरुरत है…..दिल्ली में एक नर्स के साथ हॉस्पिटल के एक कर्मचारी ने बलात्कार किया था ..जिसमें नर्स की आँखें चली गई थी …आप को याद नहीं होगा किउन की तब इतने गंभीर विषय को शायद ही आप समझ पाती होगी…..उस घटना के बाद आरोपी पकड़ा गया ..उन्ही दिनों किसी अख़बार में मैंने पढ़ा था एक बलात्कारी से पत्रकार द्वारा पूछे गये सवाल का जवाब …..एक पत्रकार ने आरोपी से पूछा था की अब कैसा लग रहा है?अफ़सोस होता है की नहीं..?.आरोपी का जवाब था की फांसी होती तो एक बार मरता …अब हर रोज मरता हूँ …..पांच मिनट के उन्माद ने जिंदगी तबाह कर दी…..इसमें कोई शक नहीं की बलात्कार बेहद ही घिनौना कर्म है और इसे करने वालों को सजा मिले…लेकिन बलात्कार की शिकार सिर्फ महिलाएं नहीं हैं…पुरुषों को भी बनाया जाता है बलात्कार का शिकार …हो सकता है की शारीरिक बलात्कार में पीड़ित महिलाओं की संख्या ज्यादा हो…लेकिन यकीन मानिये मानसिक बलात्कार के शिकार लोगों में महिलाओं से ज्यादा पुरुष हैं………..और कम से कम आप जिस पेशे में हैं उस में तो सौ फीसदी ….. इसलिए शुरुआत जरुर करिए ..मूल समस्या को ध्यान में रखिये….वैसे आप का ये लालेख बेहद घटिया है…..–

  4. बबिता अस्थाना

    June 30, 2011 at 7:00 am

    श्री मान, श्रीकांत सौरभ जी आपने अपना अमूल्य समय निकाल कर लेख पढ़ा और उस पर इतना बड़ा कमेंट भी दिया इससे पता चलता है कि कहीं न कहीं कुढ़न तो आपमें भी है…किस बात की इसके विस्तार में नहीं जाना चाहुंगी क्योंकि आपका व्यक्तिगत मामला हो सकता है। आपके लिखी बातों का जवाब –
    1-सामाजिक तौर पर ही यह सटीक है.और बुद्दिजीवियों को पढ़ाने के लिए व्यक्तिगत सोच मात्र है,
    उत्तर- तो क्या आप खुद को सामज से अलग मानते हैं। या बुद्धिजीवी मानते हैं
    अगर सामाजिक मानते हैं तो आपको समाज से जुड़कर इस पहलू को देखना होगा और अगर बुद्धिजीवी मानते हैं तो भी आपको समाज से जुड़कर ही देखना होगा क्योंकि कोई भी बुद्धिजीवी समाज से अलग रहकर अपनी बुद्धीमता का क्या करेगा क्या उसकी विद्वता केवल उसके अपने लिए है…
    2- आप भीतर से निहायत ही डरी हुई है….और यह मामला हकीकत कम सायकोलॉजिकल ज्यादा लगता है
    उत्तर – श्रीकांत जी ये लेख केवल महानगरीय लड़कियों या महिलाओं को लेकर नहीं बल्कि देश की हर महिला को लेकर है और ये सिर्फ मेरा व्यक्तिगत अनुभव ही नहीं बल्कि मेरे जैसे हर लड़की का अनुभव है कुछ महिला मित्र तो ज़रूर होंगी आपकी, उनसे चर्चा करें इस बात पर क्योंकि गम्भीर विषय है….रही बात ट्रेनिंग की तो उसके लिए इतना कहना चाहुंगी कि हमारे देश की 70 प्रतिशत आवादी गांवो में और कस्बों में बसती है वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत सुविधाओं तक का अभाव है यहां तक कि पूर्ण रूप से शौचालय तक नहीं हैं ऐसे में किस आत्म रक्षा की ट्रेनिंग की बातकर रहे हैं आप ??? और शायद आपने लेख को ध्यान से नहीं पढ़ा क्योंकि उसमें लखीमपुर खीरी की सोनम की व्यथा भी थी जिसका बलात्कार पुलिसवालों ने किया ऐसे में हथियार से लैस पुलिसकर्मियों के सामने अगर सोनम आत्मसुरक्षा की ट्रेनिंग लेकर भी पहुंचती तो क्या कर पाती।
    3- रही बात सलीके के पहनावे की …
    उत्तर- तो इसके लिए यही कहुंगी कि सोच को थोड़ा ऊपर उठाएं, क्योंकि जो लोग स्त्री के प्रति ग़लत भावना रखते हैं उनकी आंखों में गंदगी होती है और उन्हें फर्क नहीं पड़ता की लड़की ने क्या पहना है उन्हें फर्क पड़ता है कि उसने जो पहना है उसे उतारा कैसे जाये। जिस्म के भूखे भेड़ियों को सिर्फ जिस्म चाहिए होता है फिर चाहें वो 6 महीने की बच्ची हो 14 साल की किशोरी या फिर 50 साल की अधेड़, क्योंकि बलात्कार की घटना केवल उन लड़कियों के साथ नहीं होती जिन्होंने सलीके के कपड़े न पहने हों….
    4- बलत्कार के बारे सोचकर खुद को मानसिक परेशानी में डालना या बेवजह हाय-तौबा मचाना उचित है
    उत्तर- अच्छा सवाल है…महोदय जी अपने बारे में सोचना गलत नहीं, लेकिन सिर्फ अपने बारे में पूर्णता ग़लत है जो कि एक इंसान होने के नाते नहीं करना चाहिए और कम से कम पत्रकार होने के नाते तो बिल्कुल नहीं….(मुझे नहीं पता कि आप पत्रकार हैं भी या नहीं) आप इतने स्वार्थी या कोई भी इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है सोच कर तरस आता है…डरी मैं नहीं डरे आप हैं क्योंकि व्यवस्था के ख़िलाफ बोलने का जज़्बा तो छोड़िये हिम्मत तक नहीं है आप और आप जैसे लोगों में….

  5. jitendra kumar jayant

    June 30, 2011 at 7:19 am

    बबिता जी सही लिखा है आप ने यहाँ लोग इन्सान नहीं रहे ओर इंसानियत क्या होती है लोग भूल गए है…………..सच कहू मे गुजरात मे हू ओर बहुत सुखी हू…………….यहाँ इन्सान बसते है………[b][/b]

  6. शिशुराज

    June 30, 2011 at 9:40 am

    जिसे गाली देना चाहती हो दे दो, देर न करो, नहीं तो जीवन भर घुटन महसूस करोगी। अब तुम्हारी लिखित मनोहर कथा के ऊपर कोई प्रतिक्रिया नहीं, तुम्हारी भीतरी कथा कुछ और गाथा कहती है उसी पर प्रतिक्रिया देना चाहता हूं। कहीं ऐसा तो नहीं कि खुद को ही गाली देने का जी करता हो लेकिन दूसरों अपनी व्यथा बताने से डर लग रहा हो… बहरहाल, परंपरा को तोड़ा है उनमुक्त होकर जीने का सोचा है तो थोड़ा बर्दास्त भी करना होगा। आइडल समाज की कल्पना और उस पर चर्चा करना तो किताबी बात है न डियर…उम्रदराज पुरूष समाज का थोड़ा और अध्ययन करें तो लेखनी निखार आएगी…अभी तो मात्र घुटन ही है…आपके लिए मेरे तरफ से नया विषय है–केरल में बिनब्याही माँ को सरकार की आर्थिक मदद। ज़रूर लिखना…

  7. kkumar dilli

    June 30, 2011 at 11:56 am

    are saurabh bhai ekbat puchna chahta hu apse halanki babita ne kya likha , apne kya comment diya padh nahi paya time nahi hai par ye batao niche joapne mobile no.likha usse kya arth nikala jaye! iske alawa apne jo verjinity ,internal relationship jobaat batayi uska kya matlab nikalun ! chalo kuch bhi ho apke vicharo ki abhivyakti hai ! aap jano babita jane bhai apan se kya !

  8. Mamta Malik.

    June 30, 2011 at 12:16 pm

    Babita ji aapne jo lekh likha hai ye baat ye insecurity har kisi ladki ke mann mai hoti, azad desh main bhi dari hu zindagi jeete hain, shahar ho chahe gaon hoi aisi vardatein har jagah hoti hain, socho aajkal jo trend bana hai balatkar karke ladkiyo ko jala dena ya mar dalna, kya kar liya sarkar ne, yeh ghatnaye pahle bhi hoti thee, ab bhi hoti hain or aage bhi hoti rahengi jab tak sarkar ko strict action nahi legi balatkario ke against, seedhi saja honi chahiye faansi, shayad tab hi balatkar ki ghatnaye kam ho. Mamta Malik

  9. Vipin Sajwan

    June 30, 2011 at 12:47 pm

    babita ji bahut sahi likha hai,
    jinke pas shakti hoti hai unhe shuruaat karni chahiye aisa mera sochna tha. lekin jinke pas shakti hai wahi aajkal darinde ban gaye hai, ab to aam aadmi ko hi himmat dikhani hogi….nice article..

  10. viplav

    June 30, 2011 at 1:11 pm

    Babita Ji, Aapke Lekh se kahin adhik Sateek Aapka PratiLekh hai.
    *Wastav me Samaaj ek BHEED ka naam hai jis me sirf Teen tarah ke JAANWAR rahte hai – 1. BHED, 2. BHEDIYE aur 3. BUDDHIJEEWI (tathakathit).
    *BHAAV aur NIYAT se REETE aur HEEN – DEEN in TathaKathit BuddhiJeewiyon se Aapko Niraash hone ki Aawashyakta nahin…kyonki inse adhik niraash koi nahin !!
    *”Par Dukh Kaatarta” yadi MAANAV bana sakti hai to “Par Dukh
    Tatasthta” DAANAV banati hai.
    *Prashn ye hai ki HAM kyaa hain aur kyaa banna chaahte hain.

  11. Arvind Kumar

    June 30, 2011 at 2:09 pm

    har sikke ka 2 pahalu hota hai….jaise adha bhara huaa glass ..ya train ki aisi bogy jahan kuch baithe hai, kuch lete, kuch khade aur kuch latake huee….balatkar sharir ki naheen balki aatma ki hoti hai…sharir to matra ek INTERFACE hai. kast aatma ko hota hai…..chahe wo stri ka ho ya purush ka…..kapade jo aap pahante hain….isase aapaki chaal- chalan ka pata chalta hai….aapake sonch ka….aapaka pura kala/ujala chitha kholta hai aapaka pahnawa…ye ishwar ki banayee huii prakritik reet hai…ki aurat ko dekh kar purush hi aakarshit hota hai …na ki koyee bhi aur prani….bandar chimpanji..ghoda gadaha… koyee bhi nahee …..
    ye manana hai ki ek age ke baad pita aur putri main bhi ek duriya honi chahiye……kaun si aag kab jal uthegi…..isake koyee gyan naheen hota hai…..yahee karan hai ki aaj 30 % aabadi kuwanri naheen hai …..mamla ek hi hai…..prakriya bhi ek hi hai…….bas un 30 % ki aatma naheen unhe dhikkarti hain……….

  12. pooja

    June 30, 2011 at 4:01 pm

    AAP JIS COMPANY M KAAM KArti h wahan par kya cab facility nhi h kya???? madam ji

  13. sanjay das gupta

    July 1, 2011 at 2:25 am

    babita ji, main aapke is lekh aur aapki takleef se sehmat hun.aur yeh takleef ya dar sirf aapki nahi balki is desh ki laakhon mahilaon ki hai. mera ek sujhav hai aapko,aap news channel ya agencey mein rahte hue is samaj ke aise logon ke khilaaf muhim ki shuruaat kare jo sabhya samaj ke muh par tamacha hain. is muhim mein aap apne saath media ke logon ke alawa aam logon ko bhi jode kyuki aapki tarah sochne waale logon ki kami nahi. kami hai to ek safal netritva ki jo aapme hai. tabhi to itni nidarta aur bebaaki ke saath aapne likhne ka saahas dikhaya hai. kuch logon ne aapke is lekh ko behad ghatia karar diya hai to aapko use gambhirta se lene ki jarurat nahi kyuki aise hi logon ke karan aaj samaj ki yeh haalat hai.kabhi noida aaya to aapse milna jaroor chahunga kyuki aap kamzor nahi balki ek saahsi aur himmatwaali mahila hain.

  14. मयंक सक्सेना

    July 1, 2011 at 6:08 am

    आदरणीय श्रीकांत सौरभ जी,
    तमाम तरह से लिबरल दिखने और फेमिनिस्ट दिखने की कोशिश के बाद भी आपकी टिप्पणी के अंत तक आपका असली चेहरा सामने दिख गया…एक लाइन लिखना आपके लिए भारी पड़ गया जनाब…सारी मेहनत बेकार हो गई…लड़कियों का पहनावा सलीके भरा हो…अब ये कौन निर्धारित करेगा कि सलीके भरा पहनावा क्या है…वो पुरुष जो उन्हें घूरते हैं…तो यकीनन मानिए…जो भी लड़कियां उत्तर प्रदेश…या दिल्ली या कहीं भी और बलात्कार का शिकार हुई हैं…वो यकीनन अशालीन पहनावा नहीं पहने थीं…बल्कि ज़्यादातर ग्रामीण लड़कियां थी…दूसरा ये कि आप या मैं होते कौन हैं पहनावे को निर्धारित करने वाले….पुरुषों को अपना व्यवहार निर्धारित करना होगा…न कि किसी का पहनावा….आपके अंदर का पुरुष प्रधान फ्यूडल सिस्टम वही है जो सदियों से केवल महिलाओं पर चीज़ें थोपना जानता है….
    मैं बबीता के लेख के तकीनीकी सौष्ठव पर जाने की बजाय…भाव सौष्ठव पर जाने की वकालत करूंगा….मुझे ये लेख वाकई प्रभावित करता लगा…मैं इसके साथ खड़ा हूं…और हां अगर किसी को लगता है कि ये लेख घटिया है…तो साहब जिन हरकतों के खिलाफ ये लेख है….वो भी कोई महान नहीं…मैं पूरी तरह मानता हूं कि ज़्यादातर अवसरों पर गाली बक देना अनुचित भी नहीं…

  15. बबिता अस्थाना

    July 1, 2011 at 11:11 am

    पुरुषोत्तम जी, सबसे पहले लेख को घटिया कहने के लिए शुक्रिया….क्योंकि मैं मानती हूं कि – निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटि छवाय…..यक़ीन मानिये महोदय जी मुझे आपके द्वारा लेख को घटिया कहने का ज़रा भी अफ़सोस नहीं है, क्योंकि ये आपकी व्यक्तिगत राय हो सकती है कि आप किसी बात को सही माने या नहीं और आपको इसकी पूर्ण स्वतंत्रता भी है…लेकिन यहां बात सामाजिक दायित्व की है इसलिए आपके लिखे का उत्तर देना अपना दायित्व समझा जो कर रही हूं….
    1.इस समय समाचार चैनलों के बलात्कार विषय पर विशेष बनाने के समय लेख लिखने को लेकर कटाक्ष-
    उत्तर – इस विषय पर लेख पहले भी लिखे लेकिन प्रकाशित होने के लिए नहीं दिया, और भड़ास पर भी ये मेरा पहला लेख है….
    2.(पत्रकार अपराधी से)अफ़सोस होता है की नहीं..?. आरोपी का जवाब था की फांसी होती तो एक बार मरता …अब हर रोज मरता हूँ …..पांच मिनट के उन्माद ने जिंदगी तबाह कर दी.
    उत्तर- हर रोज़ नहीं उसे हर क्षण मरना चाहिए, और इतना मरना चाहिए कि उस 5 मिनट के उन्माद की अहमियत हर उस व्यक्ति को समझ आ जाये जो ऐसा करने का ख़्याल भी अपने ज़हन में लायें…मुझे समझ नहीं आता कि आप किसी आरोपी (जो सिर्फ उस लड़की का ही नहीं बल्कि उसके परिवार सहित अपने ख़ुद के परिवार और सम्पूर्ण समाज का दोषी है) उसके साथ इतनी सहानुभूति कैसे रख सकते हैं…
    3.पुरुषों के साथ होने वाले शारिरिक और मानसिक दोनों तरह के बलात्कार की बात
    उत्तर- आपके इस कथन से पूरी तरह सहमत हूं, कि ऐसा होता है और इसे लेकर अफ़सोस भी है लेकिन बताना चाहुंगी कि लेख में कहीं ये नहीं कहा गया कि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता, या सिर्फ़ स्त्रियां ही प्रताड़ना की शिकार होती हैं…रही बात पत्रकारिता के क्षेत्र में पुरूषों को प्रताड़ित करने की बात तो कहना चाहुंगी कि यहां पुरूषों को प्रताड़ित पुरूष ही करते हैं, इसके बारे में मुझसे बेहतर आपका ख़ुद का अनुभव होगा शायद मुझे, विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप भी एक पुरूष हैं….

  16. संजय ओझा

    July 1, 2011 at 3:07 pm

    बबीता जी….अच्छा लगा पढ़कर…इसके दो कारण मुझे दिखाइ देते हैं—पहला समाज में फैल रही विकृतियां और दूसरा गुनाह पर कानून का ढीलापन….यही कारण है कि गुनाह करने वाला बेखौफ होकर अपना काम कर रहा होता है…बाकी हम लोगों में विरोध करने की हिम्मत कम होती है…हम किसी लड़की के खिलाफ जुर्म होते देखकर भी चुप रह जाते हैं…और विरोध करने की हिम्मत कम जुटा पाते हैं..

  17. Khursheed alam

    July 3, 2011 at 11:02 am

    Babita Ji ,Pranam

    May Ek engineer hu lakin mara ghar may 2 patarakar hai mummy or papa , Dono log acha banner ka nicha kam karta hai mummy electronic or papa print media may kam karta hai , iss risat say may bhi BHADAS 4 MEDIA ka hisa dar hu . aaj kal electronic or print media may kya chal raha hai may achi tharah janta hu ,kon ladki uchi par kasa pahuchti hai may achi taraha janta hu , malikano ka julm sahta rahiya kamyabi aap ka kadam chumagi verna aap “SABSA BURI WORKER KAHLAYA GI”

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