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व्याख्यान में तहलका की प्रबंध संपादक सोमा चौधरी का बिगड़ा सुर-ताल

पटना : ”देश में लोकतंत्र की दशा और दिशा” विषयक 16वें चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यानमाला के दौरान तहलका की प्रबंध संपादक सोमा चौधरी का सुर-ताल ऐसा बिग़ड़ा कि वह विषय पर अपनी बात रखने के बजाय तहलका और अन्य कारपोरेट मीडिया की वकालत करती नजर आईं। अपने संबोधन में सुश्री चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिये यह आवश्यक है कि मिडिल क्लास अपनी जिम्मेवारियों को समझे और उसके अनुरूप पहल करे।

पटना : ”देश में लोकतंत्र की दशा और दिशा” विषयक 16वें चंद्रशेखर स्मृति व्याख्यानमाला के दौरान तहलका की प्रबंध संपादक सोमा चौधरी का सुर-ताल ऐसा बिग़ड़ा कि वह विषय पर अपनी बात रखने के बजाय तहलका और अन्य कारपोरेट मीडिया की वकालत करती नजर आईं। अपने संबोधन में सुश्री चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिये यह आवश्यक है कि मिडिल क्लास अपनी जिम्मेवारियों को समझे और उसके अनुरूप पहल करे।

चौधरी ने मौके पर मौजूद लोगों को सूचित किया कि आजादी के 64 वर्षों में देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ है। उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि जहां एक ओर लोकतंत्र की जड़ें गहरी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसी विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं, जिनके कारण कारण लोकतंत्र पर सवाल उठने लगा है। इन्होंने यह भी कहा कि हर आंदोलन में मिडिल क्लास की विशेष भूमिका होती है। अपने संबोधन में खुद अंतर्द्वंद्वों से जूझती नजर आईं सोमा चौधरी। उनकी बेबसी उस समय ज्यादा नजर आई जब उनके व्याख्यान के बाद लोगों ने उनसे लोकतंत्र के अस्तित्व, कारपोरेट की भूमिका, सिविल सोसायटी की परिभाषा एवं उसकी प्रासंगिकता के संबंध में सवाल पूछे।

हैरत तो तब हुई जब सुश्री चौधरी ने सवालों का जवाब देने के बजाय तहलका की नीतियों के बारे में बताना शुरू कर दिया। इसके अलावा अपने मुख्य संबोधन के दौरान भी इन्होंने तहलका की नीतियों में हुए परिवर्तन की जानकारी देते हुए कहा कि तहलका को प्रकाशित करने में सलाना 8 से 10 करोड़ रुपये का खर्च आता है। इतनी बड़ी राशि चंदा के माध्यम से नहीं जुटाया जा सकता है। इसलिये तहलका ने कारपोरेट जगत से विज्ञापन लेना शुरू किया है, इसमें कोई गलत बात नहीं है। सोमा ने स्वीकार किया कि मीडिया का स्वरूप बदला है।

लोग कानाफूसी करते रहे कि सुश्री चौधरी जिस मुद्दे पर अपनी बात रख रहीं थीं, उसमें तहलका का एजेंडा शामिल ही नहीं था। इससे पहले अपूर्वानंद ने अपने संबोधन में स्व. चंद्रशेखर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चंद्रशेखर ने बिहार में एक नई सोच के साथ राजनीति की शुरुआत की थी। परंतु, 31 मार्च 1997 को अपराधियों ने उनकी हत्या सीवान में उस समय कर दी थी, जब वे एक नुक्कड़ सभा को संबोधित कर रहे थे। इन्होंने यह भी कहा कि चंद्रशेखर के चले जाने के बाद उनके सिद्धांतों और कार्यशैली की प्रासंगिकता बढ गई है।

इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में अरशद अजमल ने कहा कि कानून बनाये जाने के तरीके पर विचार करना होगा। इन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में बहुमत की परिभाषा को फ़िर से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है। व्याख्यान में प्रो विनय कंठ, प्रो नवल किशोर चौधरी, प्रो डेजी नारायण, प्रो वसी अहमद, वरिष्ठ वामपंथी नेता के डी यादव, समाजसेवी रुपेश सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।

‘अपना बिहार’ के एडिटर की नवल किशोर की रिपोर्ट

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0 Comments

  1. priyanka

    September 21, 2011 at 10:44 am

    Nawal kumar caste ki soch wala ek ghatiya patrakar hai….isliye inki kisi report par vishleshan ke bajay chintan jaroori hai…..Patna me inko har koi pahchanta hai….

  2. gaurav

    September 21, 2011 at 10:26 pm

    priyanka, main bhee patna me patrikarita kar chuka hoon. ye naval kaun hai? mughe yad aa raha hai ke aapna bihar us samay market me nahi tha.

  3. nawal

    September 26, 2011 at 9:48 am

    Respected Priyanka ji,

    Thanks for your complements. Please visit http://www.apnabihar.org

    with regards,

    nawal

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