औद्योगिक नगरी फरीदाबाद में इन दिनों चर्चा के विषय बन गए हैं फर्जी पत्रकार। यह पत्रकार किसी भी प्रकार की प्रेस वार्ता में बिना बुलाए पहुंच कर अनाप-शनाप प्रश्न पूछते हैं। गत दिनों शहर के एक अस्पताल की प्रेस वार्ता में हाथ घड़ी पाने की लालच में फर्जी पत्रकारों की संख्या काफी अधिक हो गई थी। जिस पर अस्पताल प्रबंधन ने मजबूरन और घडिय़ां मंगवाकर बांटी। पहले समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकार आए, उसके बाद फर्जी व उनके सगे-संबंधी भी पत्रकार वार्ता में पहुंचे। क्योंकि वहां पर अस्पताल प्रबंधन द्वारा खाने-पीने का बढि़या इंतजाम किया गया था।
देखते ही देखते वार्ता में असली व फर्जी पत्रकारों की संख्या बढक़र 80 हो गई। देखा तो यहां तक भी गया कि एक साइड पर समाचार भेजे वाले ने अपने खाने की प्लेट में 10 चिकन टंगड़ी रख ली। मौके पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सूरजमल ने इस बात का विरोध भी किया परन्तु वह पत्रकार इस बात को हंसी में टाल गया। यही नहीं यहां आए फर्जी पत्रकारों ने अस्पताल प्रबंधन को लगातार बधाई देते थके नहीं।
इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय सूरजकुण्ड क्राफ्ट मेले में भी लोक सम्पर्क द्वारा दी गई पत्रकारों की लिस्ट पर पर्यटन विभाग ने आपत्ति भी जताई, क्योंकि इस लिस्ट में फर्जी पत्रकारों की संख्या असली पत्रकारों से कहीं ज्यादा थी। यह फर्जी पत्रकार लोक सम्पर्क से कार्ड बनवाकर मेले में सरकारी खाने पर हाथ साफ करने पहुंच जाते हैं और अपने सगे-संबंधियों व यार-दोस्तों को भी सरकारी खाना खिलवाने का प्रयास करते है। इन दोनों घटनाओं के बाद हरियाणा पत्रकार संघ व क्षेत्रीय पत्रकार संघ फर्जी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने के मूड में है।
सुधीर वर्मा फरीदाबाद में पत्रकार हैं.












मदन कुमार तिवारी
February 13, 2011 at 9:48 am
सुधीर वर्मा जी अगर आपलोग अपनी जिम्मेवारी निभाओ तो यह सब नही हो सकता । आप लोगो के बीच का हीं तो कोई होगा जिसके साथ फ़र्जी पत्रकार आते होंगे , वैसे मुझे लगता है आपको दिखाने का ज्यादा शौक है । जब असली यानी आप जैसा महान पत्रकार प्रश्न पुछने की हिम्मत नही करता तो फ़र्जी कि क्या औकात है । लगता है आपको कहीं खाने -पीने की दिक्कत हुई है , आपका हिस्सा किसी और ने मार लिया या कोई दुसरा जिससे आप जलते हैं किसी छोटे अखबार का रिपोर्टर बनकर आपसे ज्यादा अच्छा प्रश्न पुछने लगा है । डीयर आपके स्वनाम धन्य अखबार दैनिक जागरण , हिंदुस्तान वगैरह के जो पत्रकार या यों कहिये स्थानीय संपादक है , वे सभी दलाल और चम्मचों से ज्यादा कुछ नही है , कहियेगा तो नाम भी गिना दुंगा । इस स्थिति में छोटे अखबारों हीं पत्रकारिता और पत्रकार की इज्जत की रक्षा कर रहे हैं । थोडा उंचा सोचो यार ।