मीडिया, बाज़ार और लोकतंत्र पर केंद्रित समयांतर पत्रिका का विशेषांक स्टॉल पर आ चुका है. इसमें बाज़ार के इशारे पर चल रहे मीडिया और लोकतंत्र के खेल को समझने की कोशिश की गई है.
अंक को वैकल्पिक पत्रकारिता की वकालत में एक कोशिश माना जा सकता है. अंक का संपादन पत्रकार और मीडिया प्राध्यापक भूपेन सिंह ने किया है. इस मैग्जीन की कीमत पच्चीस रुपए है. ज़्यादा जानकारी के लिए [email protected] पर मेल किया जा सकता है या 09871403843 पर फोन किया जा सकता है. अंक के लेखकों और उनके लेखों की सूची निम्मवत है…
मीडिया चालित समाज में लोकतंत्र -विपुल मुद्गल, पत्रकारिता : व्यवसाय और सरोकारों का अंतर्विरोध – दिलीप मंडल, समाचार मीडिया में बढ़ता संकेन्द्रण -आनंद प्रधान, मीडिया के लोकतांत्रीकरण की चुनौतियां -पंकज बिष्ट, कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीतिज्ञों का गठजोड़ -सुकुमार मुरलीधरन, मीडिया का कॉरपोरेटीकरण और विश्वसनीयता का ह्रास -प्रफुल्ल बिदवई, समाचार माध्यम: झूठ बोलने की संरचनात्मक बाध्यता -पी साइनाथ, आर्थिक वैश्वीकरण के दौर में बेईमानी: टाइम्स ऑफ़ इंडिया -पीयूष पंत, लोकतांत्रीकरण के लिए नियमन -भूपेन सिंह, समकालीन वैश्विक मीडिया : सूचना का अंत और मनोरंजन का आगमन -सुभाष धूलिया, नया मीडिया-उम्मीद और आशंका के बीच -शिव प्रसाद जोशी, सहमति गढ़ने और असहमति को दबाने की पत्रकारिता -रामशरण जोशी, मीडिया बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी -सत्येंद्र रंजन, मीडिया में युद्धोन्माद और वर्चस्ववादी राष्ट्रवाद -फ्रेंक हुज़ूर, मीडिया और बहुसंख्यकवाद : दक्षिण एशिया के चन्द मुल्कों में के मीडिया के परिदृश्य पर एक नज़र -सुभाष गाताड़े, भूमंडलीकरण के दौर में मीडिया -जवरीमल पारख, वैश्वीकरण के दौर में उर्दू मीडिया -शीबा असलम फ़हमी, समाचार माध्यमों में महिलाएं -भाषा सिंह, वैश्वीकरण के दौर में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग -सुभाष सेतिया, मुक्त बाज़ार में मीडिया शिक्षण -विधांशु कुमार, क्षेत्रीय पत्रकारिता का अंत -अशोक कुमार पांडे, साक्षात्कार : नोम चौमस्की, ओम थानवी, शीतला सिंह, सेवंती नैनन, परंजॉय गुहा ठकुरता, राजेश वर्मा, आनंद कुमार, एचके दुआ, कुलदीप नैयर, श्रवण गर्ग और योगेंद्र यादव
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