: पुण्य तिथि पर विशेष : इंदिरा जी ने हमेशा धर्मनिरपेक्षता को भारत की राजनीति की बुनियाद माना था : स्वर्गीय इंदिरा गांधी की शहादत के 26 साल पूरे हो गए. उनकी मृत्यु से करीब सात साल पहले उनकी प्रेरणा से मैंने कांग्रेस में प्रवेश किया था. बहुत बुरा वक़्त था. देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी.
जयप्रकाश नारायण के साथ जो जमातें कांग्रेस के खिलाफ आन्दोलन में शामिल हुई थीं उनको सफलता मिली थी. इंदिरा जी खुद रायबरेली से चुनाव हार गयी थीं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी. और मैं उनकी उसी हिम्मत का भक्त हूं. मैं जौनपुर जिले के अपने गांव से मुंबई नौकरी की तलाश में आया था और यहीं काम करता था. जब इंदिरा जी 77 के चुनाव में अपनी और कांग्रेस की पराजय के बाद मुंबई आयीं तो उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ था. नौजवानों में उनको लेकर बहुत उत्साह था. मैं भी उनसे मिला और मैंने कहा कि मैं भी कांग्रेस में शामिल होकर देश सेवा करना चाहता हूं. उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा कि जब घर से बाहर निकले हो तो वही काम करो जिसको ठीक समझो. राजनीति का यही सबसे बड़ा मन्त्र है.
बस मैं शुरू हो गया. मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक मामूली परिवार से आया 27 साल का नौजवान था. इंदिरा जी को मैंने मन ही मन अपना गुरु मान लिया और जुट गया कांग्रेस की शुरुआती राजनीति
में. इस बीच इंदिरा गांधी का वह बयान आया जिसने मेरी राजनीति की दिशा तय कर दी. जब मोरारजी देसाई की सरकार में सिर फुटौव्वल शुरू हुई और स्व. मधु लिमये ने आरएसएस वालों की दोहरी सदस्यता के खिलाफ अभियान चलाया तो अखबारों के माध्यम से पता चला कि जनता पार्टी के एक घटक दल, पुराने जनसंघ वालों ने पेशकश की कि वे लोग मोरारजी देसाई को छोड़कर इंदिरा जी के साथ आने को तैयार हैं. इंदिरा जी ने साफ़ मना कर दिया.
उस वक़्त जो बयान इंदिरा जी ने दिया था वह आज की राजनीति का प्रकाश स्तम्भ है. उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिक ताक़तों के खिलाफ अगर मैंने कांग्रेस की लड़ाई को ज़रा सा भी कमज़ोर किया तो आने वाली पीढिया मुझे माफ़ नहीं करेगीं. सत्ता रहे या न रहे, मैं कभी भी आरएसएस के साथ सहयोग नहीं करूंगी. इस के बाद तो देश में क्या हुआ मैं नहीं जानता लेकिन मैंने प्रतिज्ञा कर ली कि जीवनभर उनकी इस बात को याद रखूंगा. यह बात इतनी मजबूती से कही गयी थी कि मेरे दिल में घर कर गयी. जब भी कभी राजनीतिक दुविधा आई तो उनके दोनों ही मन्त्र बहुत काम आये. मैंने हमेशा वही काम किया जो सही लगा और कभी भी साम्प्रदायिक ताक़तों की तरफ राजनीतिक दोस्ती का हाथ नहीं बढाया.
इंदिरा जी के वे सात साल किसी भी नेता की राजनीतिक ताक़त का इम्तिहान ले सकते थे और लिया भी. 1980 में इंदिरा जी की अगुवाई में कांग्रेस की मजबूती के साथ वापसी हुई और कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन अमरीका के नेतृत्व में पूरी दुनिया की दक्षिणपंथी और पूंजीवादी ताक़तें जुटी रहीं कि इंदिरा गांधी और भारत को कमज़ोर किया जाय, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. पाकिस्तान में उन दिनों फौजी हुकूमत कायम हो गयी थी, जिसका मुखिया अमरीका का ख़ास भक्त था और उसने पंजाब में अपने लोगों को भेजकर और सिख आतंकवादियों को आर्थिक मदद देकर भारत को कमज़ोर करने की कोशिश की. लेकिन इंदिरा जी को उनके सिद्धान्तों से डिगाया नहीं जा सका. अपनी धर्म-निरपेक्ष सोच को उन्होंने राजनीतिक आचरण की धुरी बनाए रखा.
पंजाब के आतंकवाद के वक़्त, गृह मंत्रालय की सूचना थी कि सिख आतंकवादियों ने देश की सबसे बड़ी नेता को ख़त्म करने की साज़िश रची है. इंदिरा जी को सरकारी स्तर पर सलाह दी गयी कि उनकी सुरक्षा से सिखों को हटा लिया जाएगा, लेकिन इंदिरा जी ने साफ़ कहा कि जिस देश की आज़ादी की लड़ाई की बुनियाद ही धर्म निरपेक्षता पर बनी है वहां कभी भी धार्मिक कारणों से विभेद नहीं किया जाएगा. इंदिरा जी के मन में सिद्धातों की इतनी इज्ज़त थी कि उन्होंने अपनी जान के खतरे को जानते हुए भी धर्मनिरपेक्षता के स्वतंत्रता संगाम के आदर्शो को संभाल कर रखा. और उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी. आज 26 साल बाद उनको याद करना, भारत की राजनीति की मजबूती को याद करना है.
लेखक कृपा शंकर सिंह मुंबई प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं.












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October 30, 2010 at 9:52 pm
Indira ji ki punyatithi par unhe bhaw-bhini Shraddhanjali !
Par Kripa-Shankar singh ji , Aap ka lekh padhkar laga ki aap bhi congress mein CHAAPLUSI parampara ko badhaane waale *PURODHAAON* mein se ek hain ! Aap ne Punjab ke aatankwaad ki baat ki , par ye khulaasa chipa gaye ki BHINDARAWAALE ko badhaane mein kiska haath tha ? Aap ne likha — बहुत बुरा वक़्त था. देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी. Yaani aap ke mutaabiq desh mein Gair-Congressi sarkaar ban na buri baat hai, to Democracy ka matlab aap ke liye kya hai ? ! Aap ne 1977 ki baat ki par emergency ke zariye loktantra ki hatya ka mudda chipa le gaye ! Aap ne likha ki –1980 में इंदिरा जी की अगुवाई में कांग्रेस की मजबूती के साथ वापसी हुई और कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन अमरीका के नेतृत्व में पूरी दुनिया की दक्षिणपंथी और पूंजीवादी ताक़तें जुटी रहीं कि इंदिरा गांधी और भारत को कमज़ोर किया जाय, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. Yaani aap maante hain ki Aaj ki congress, Jo America ki PICCHLAGGU hai , Indira gandhi aur Bharat ko kamzor karne ka, kabhi, Mansuba rakhne waalon ki jee huzuri kar galat kar rahi hai ! Aap saamprdaayik tattwon ki taraf dosti ka haath nahi badhaate , to ye bhi saaf kar dijiye ki TUSHTIKARAN ka matlab kya hota hai ? Kya aap nahi maante hain ki isi desh mein quam ke naam par 2 qanoon hain ? . Shahbaano case ke baare mein aap logon ko kya bataana chahenge ? Desh mein buri tarah se panpa BHRASHTAACHAAR kya achaanak is desh mein a gaya ya lambe samay tak ku-shaashan ka parinaam hai ? Kaun si aisee party hai , jisne desh mein lambe samay tak raaj karne ke bawjud NAXALWAAD, AATANKWAAD AUR BHRASHTAACHAR ko rokne ka kaam bilkul nahi kiya, jiske chalte ye har jagah fail raha hai ek NAASUR ki tarah !
Kripa Shankar ji , Chaaplusi kar aap Congress mein apna kad badha sakte hain , Par sach bolne ka saahas bhi apne andar paida kijiye , kyonki qaabil hone ke baawjud , Aap congress ke raashtriya adyaksha ya Pradhaan mantri nahi ban sakte , kyonki ye seat GANDHI PARIWAAR ke liye reservrd hai . Ye hai loktantra ki numaaindagi , CONGRESS ke andar !
[b]Aap chaaplus neta dikhne ki bajaay sashakt netaaon ki tarah baat katre to achcha lagta ![/b] Khair koi baat nahi, Congress ke ander rahna hai to Indira- Sonia -Rahul ka gugaan karna hi padega ! Rahul Gandhi ji ki aulaad rahti to aap unka bhi gudgaan shuru kar dete !
Par yakin maaniye —- [b]Ye public hai, sab jaanti ha[/b]i !
पवन कुमार अरविंद
October 31, 2010 at 1:30 am
ये बातें देश के सभी लोग जानते हैं कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपकर भारतीय लोकतंत्र की अविरल धारा को रोकने का घृणित कार्य किया था। उनके इस अपराध के लिए यह पंथनिरपेक्ष देश उनको कभी माफ नहीं कर सकेगा।
पवन कुमार अरविंद
नई दिल्ली
dhirendra pratap singh
October 31, 2010 at 5:10 am
achha aur jankaripurn lekh h. agar aap apne jeevan ke suruvaati sangharsho ke baare bhi kuchh likhate to usase uva pidi ko rah aur kuchh kar gujarane ka jajba milata.maine pahle bhi is baare me aapko delhi me salah di thi.
dhirendra pratap singh dehradun uttrakhand
Prdeep
November 1, 2010 at 2:40 am
yashwant ji BHADAS ko political manch na banayen to jayada achaa rahega………. 🙂
हरिओम गर्ग
November 2, 2010 at 5:41 am
भाई यशवंत जी .
माननीय कृपाशंकर सिंह जी का लिखा इंदिरा जी का गुणगान पढ़ा .
समझ में नहीं आ रहा की इस लेख के बारे में क्या लिखूं ?
बस इतना ही लिखूंगा की भविष्य में “भड़ास “पर इस तरह के राजनितिक गुणगान से परहेज ही करें तो
बेहतर रहेगा .
हरिओम गर्ग
बीकानेर