11 वर्षों से वे दैनिक हिंदुस्तान में थे। छह साल दैनिक हिंदुस्तान, पटना में और पांच साल यहां दिल्ली में। पर वे रह गए रिपोर्टर के रिपोर्टर ही। न तो पद बढ़ा, न पैसा। जिस पद पर ज्वाइन किया, उसी पद व पैसे पर आज उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लेकिन बीच में 11 वर्ष का लंबा समय गुजर गया जिसमें मीडिया जगत में इतना सारा पानी बहा कि देखते-देखते कल के बच्चे उछलकूद मचाते हुए धड़ाधड़ प्रमोशन व पैसा पाकर विभिन्न अखबारों में जगह-जगह बास बन बैठे हैं। पर सुनील सौरभ के लिए 11 वर्ष का वक्त उस धैर्य व परीक्षा का वक्त रहा जिसमें वे हर पल अपना काम करते रहे, फल का इंतजार किए बगैर, यह मानकर कि कभी न कभी तो उनके दिन भी फिरेंगे। पर उनके दिन यहां नहीं फिरे।
कहा जाता है कि देर है पर अंधेर नहीं लेकिन सुनील सौरभ के साथ यह मुहावरा फिट नहीं बैठा। वे अंधेर और देर, दोनों स्थितियों के बीच आखिरकार दैनिक हिंदुस्तान को बाय बोल बैठे। वे कहां जा रहे हैं, अभी उन्होंने कुछ बताया नहीं है लेकिन उनका कहना है कि दैनिक हिंदुस्तान छोड़ना ही उनकी अब सबसे बड़ी उपलब्धि है क्योंकि यहां पिछले तीन महीनों से उनसे कोई काम नहीं लिया जा रहा था। इससे पहले वे बिजनेस ब्यूरो में थे लेकिन बिजनेस ब्यूरो को खत्म कर दिया गया। उसके बाद उन्हें डेस्क पर फिर रिपोर्टिंग में भेजा गया। रिपोर्टिंग में न तो कोई बीट दी गई और न ही कोई काम। सिर्फ प्रेस रिलीज बनवाया जाता था। इस जिल्लत और जलालत से मुक्ति पाकर वे अब बेहद खुश महसूस कर रहे हैं।











