विज्ञान पर आधारित पत्रिका ‘लांसेट’ के संपादक ने एंटीबायटिक से बेअसर रहने वाले एक सुपरबग का नाम न्यू डेल्ही रखने पर अपनी गलती मानी है. उन्होंने इसे भूल कहते हुए माफी मांगी है. साथ ही उम्मीद जताई है कि सुपरबग का नाम बदला जाएगा.
दक्षिण एशियाई देशों से लौटने वाले कुछ यूरोपीय एक बैक्टीरिया से प्रभावित पाए गए थे. इस बैक्टीरिया में मौजूद जीन पर किसी एंटी-बायटिक का प्रभाव नहीं पड़ता है. इस जीन का नाम न्यू डेल्ही मेटालो-बीटा-लेक्टोमास (एनडीएम-1) दिया गया, क्योंकि स्वीडन निवासी और सबसे पहला मरीज दिल्ली से ही गया था. पिछले साल मैगजीन में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि सुपरबग न्यू डेल्ही मेटालो-बीटा-लैक्टामीज-1 भारत में पैदा हुआ था. ‘लांसेट’ ने अगस्त 2010 को अपने प्रकाशित लेख में एनडीएम-1 के बारे में विस्तार से बताया. पत्रिका में बताया गया कि यह जीन काफी शक्तिशाली है और कार्बापीनीम्स जैसे मजबूत एंटी बायोटिक का भी इस पर कोई असर नहीं होता है. इस रिपोर्ट पर पूरे देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी. भारत सरकार ने भी उस समय बग का नाम न्यू डेल्ही रखने पर सख्त आपत्ति की थी.
मैगजीन के एडिटर डॉ. रिचर्ड हॉर्नटन ने कहा कि यह रिपोर्ट पूरी तरह से सही है लेकिन इस सुपरबग का नाम दिल्ली शहर के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए था. यह गलत है और मैं इसके लिए माफी मांगता हूं. उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि मुझे लगता है कि इसका नाम बदला जाएगा, लेकिन इसका फैसला तो वे माइक्रो बायोलॉजिस्ट करेंगे, जिन्होंने इस सुपरबग को खोजा था. इस आर्टिकल के छपने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे डराने वाला और अवैज्ञानिक कहा था. स्टडी में अहम भूमिका निभाने वाले कार्तिकेयन कुमारस्वामी ने भी इस नतीजे को ठुकरा दिया कि यह बैक्टीरिया भारत से बाकी दुनिया में फैला.











