ज्यादा दिन नहीं हुए। एक मित्र मेरे पास आए। वैसे कोई खास मित्रता नहीं, लेकिन पत्रकार बिरादरी के ही हैं। बस इसीलिए उनके साथ हो लिया। कहने लगे चलो कहीं कॉफी पीते हैं। दोपहर के तीन बज रहे थे। खबरों का इनफ्लो नहीं था। हम चल पड़े। हमारा पड़ाव था, एक पांच सितारा होटल का कॉफी शॉप। थोड़ी हैरानी हुई। कुछ संकोच भी। हैरानी इसीलिए क्योंकि आम तौर पर तो पीआर वाले ही पांच सितारा होटल लेकर आते हैं, आज एक पत्रकार बंधु लेकर आए। परेशानी इसलिए, क्योंकि जेब में सिर्फ पांच सौ रुपये थे। लेकिन संतोष था कि जेब में डेबिट ही नहीं, ज्यादा इस्तेमाल नहीं होने वाला डेबिट कार्ड भी था।
खैर वापस पत्रकार बंधु के पास आते हैं। बंधु का नाम नहीं लेना चाहूंगा, उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। बैठते ही कहने लगे, “गुरु, बहुत जरुरी काम है। एक बैंक से कर्ज दिलाना है।” मैंने सोचा, कर्ज लेने के लिए इतनी बड़ी भूमिका क्यों। चूंकि लंबी चौड़ी बातें सुनने का आदी नहीं हूं। छूटते ही कहा, “भाई कितना?” उसने कहा “बस, 85 लाख रुपये।” चौंक गया मैं, अब इसमें अगर बैंकिंग नियमों के मुताबिक, अगर कम से कम 15 परसेंट का बयाना जोड़ लें तो मोटा मोटी कीमत बनती है एक करोड़ रुपये। फिर भी सवाल पूछने से लाचार, पूछा “घर की कीमत कितनी है?” बंधु ने कहा, “बड़ी मुश्किल से बिल्डर को सवा करोड़ पर पटा पाया हूं, 40 लाख रुपये नकद का इंतजाम है।” एक और रहस्य उजागर कर दूं, अगर सौदा पूरा हुआ तो ये बंधु का दूसरा घर होगा। मुंबई में 80 लाख रुपये का एक घर दो साल पहले ही लिया जा चुका है।
अब आपको उस पत्रकार बंधु के बारे में कुछ बता दूं। कुल मिलाकर 6-7 साल हुए पत्रकारिता करते हुए। संप्रति एक प्रतिष्ठित संस्थान में प्रधान संवाददाता हैं। तनख्वाह मुझे नहीं लगता कि लाख रुपये से ज्यादा का होगा, काट कूट कर 70 हजार रुपये मिलते होंगे। कुछ पड़ताल भी की, तो पता चला कि वो खानदानी रईस भी नहीं है। अब ऐसे में जरा सोचिए कि 85 लाख रुपये के कर्ज पर कम से कम 75 हजार रुपये का मासिक किश्त कैसे चुकेगा?
क्यों मैं आपको सुना रहा हूं ये किस्सा? बस इसलिए कि आखिरकार 70 हजार रुपये कैरी होम सैलरी वाला भला कोई 85 हजार रुपये का EMI कैसे चुका सकता है? कहीं से कुछ कमाई जरूर है और वो भी थोड़ी बहुत नहीं, मोटी कमाई। पिछले 16 साल के अपने अनुभव के आधार पर मैं आपको बता सकता हूं कि कारोबारी पत्रकारिता में इस तरह की कमाई हो सकती है, बस कुछ हटकर करने की चाहत होनी चाहिए। हट कर यानी खबर ढूंढने के बजाए जो खबर आपको दी जाए, उसे छापा जाए। वैसे इस काम के लिए खास शर्त ये है कि आपकी औकात खबर छपवाने की होनी चाहिए, वरना हट कर काम करने के बजाए आप पीआर एजेंसियों और कॉरपोरेट दलालों की लिस्ट से हटा ही दिया जाएंगे, संभव है कि संस्थान से भी।
मुझे पिछले पांच सालों में कम से कम तीन बड़े मौके मिले, हट कर काम करने के लिए। पहला मौका आज से करीब पांच साल पहले मिला। एक बड़े उद्योग घराने में बंटवारा हो रहा था। एक धड़े से सहानुभूति रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने प्रेस क्लब बुलाया। मेरा पसंदीदा वोदका पिलाया, फिर कहा, “काफी अच्छा काम कर रहे हैं। बिजनेस बुलेटिन भी पढ़ते हो, मेरी एक बात मानोगे?” मैने पूछा, “क्या करना है?” उन्होंने कहा, “हम तुम्हें कागज भेजवाएंगे, ये भी बताएंगे कि कैसे और कब उसे ऑन एय़र करना है।” तीसरे पैग की चुस्कियों के साथ ये भी जोड़ दिया, “हर ऑन एयर होने वाली खबर की कीमत होगी, कैश या काइंड में जैसा तुम चाहो।” मैने बस यूं ही पूछ लिया, “काइंड में क्या होगा?” उन्होंने कहा, “जो चाहो, ऑल पेड हॉली डे, ज्यूलरी या फिर जो तुम चाहो।” एकबारगी तो मुझे लगा कि बहुत अच्छा मौका है, फिर पता नहीं क्या हुआ, मैने कहा, “माफ कीजिए, मैं ऐसा नहीं कर पाउंगा।” वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “इतनी जल्दी क्या है, सोच कर फोन कर देना।” दो पैग का मेरा कोटा खत्म हो गया। औपचारिक बातों के साथ मुलाकात खत्म। वैसे आजतक मैं उनको वापस फोन नहीं कर पाया हूं।
दूसरा मौका ज्यादा ही बोल्ड था। गैस की लड़ाई शुरू हो चुकी थी। संस्थान भी मेरा बदल चुका था। एक खास कंपनी के खास अधिकारी का बुलावा आया। उनके दफ्तर गया। भूमिका नहीं थी, सीधे प्वाइंट पर आ गया। मुझे कहा गया, “एक खास परियोजना के बारे में खबर कुछ इस कदर चलानी है कि लोगों को लगे परियोजना शुरू नहीं हुई तो राज्य का विकास तो पूरी तरह ठप होगा ही, राष्ट्रीय राजधानी का भी नुकसान होगा।” विकास के नाम पर ब्लैकमेलिंग ही थी, लेकिन मेरे लिए इसे पॉजिटिव रिपोर्टिंग कहा गया। खास अधिकारी ये कहने से नहीं चूके कि पॉजिटिव रिपोर्टिंग का आउटकम भी पॉजिटिव होगा, लेकिन कितना, ये मुझे बताना होगा। इस बार भी कोई जवाब नहीं दे सका मैं। मुझे सोचने के लिए समय दिया गया, अभी भी मैं सोच ही रहा हूं।
तीसरा मौका कुछ महीने पहले का है। एक लॉबिंग फर्म के वरिष्ठ अधिकारी मुझसे मिले। इस बार डील का साइज बड़ा ही नहीं, ज्यादा ही हट कर था। मुझे बस इतना करना था कि अपने पूरे नेटवर्क पर नजर रखनी थी और बतानी थी कि एक खास औद्योगिक घराने को लेकर क्या कुछ प्रसारित होने वाला है। शर्त इतनी कि जानकारी खबर चलने के पहले देनी होगी। उसके बाद मामला संभाल लिया जाएगा, ऐसा मुझे कहा गया। पहले दो मौकों की ही तरह फिर से कीमत देने का भरोसा दिया गया। लेकिन यहां कीमत खबरों के हिसाब से नहीं, बल्कि हर महीने तय एकमुश्त रकम मिलेगी।
तीन मौके और तीनों ही बार मैं कोई फैसला नहीं कर पाया। आप इसे मेरी नासमझी ही कह लीजिए। अंग्रेजीदा लोगों की शब्दों में आप मुझे इम्प्रैक्टिकल भी कह सकते हैं। लेकिन एक बात बता दूं, आज भी मैं खुश हूं।
वैसे चलते-चलते आपको बता दूं कि शुरुआती पंक्तियों में जिक्र किए गए पत्रकार बंधु का आज बरसों बाद फोन आया। कुछ चिंतित थे। पूछा, “सुना है कि आयकर विभाग आय से ज्यादा संपत्ति रखने वालों की एक लिस्ट जारी करने वाला है और इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं, तुम्हें कुछ खबर है?” चूंकि आज ही वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत हुई थी, मैंने जवाब नहीं में दिया। बंधु बड़े ही खुश हुए और लगे हाथ पार्टी का न्यौता भी दे डाला। पार्टी सवा करोड़ के घर के लिए।
नाटकीय तौर पर लिखी ये सभी बातें बिल्कुल सच है। नाम नहीं लेने की मजबूरी है।
भड़ास4मीडिया के पास एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. वरिष्ठ पत्रकार ने अपने नाम, पहचान और काम का खुलासा नहीं करने का अनुरोध किया है.












rajan c
January 7, 2011 at 10:54 am
बंधुवर आपने जो किया वो अच्छा किया पर अफ़सोस की बात ये है की जो काम करने से आपने मन किया, उसे किसी और ने कर दिया होगा और खूब कमाया होगा.
rm
December 31, 2010 at 1:38 pm
bhai yes tho aaj kee majboori hain aura aaj key yug main paisa kelsey nahi chahiye …aap ney bjp leader kee whah beat tho yaad hogi jeesemain kahaa tha kee paisa tho bhagawan nahi hain lenin bhagawan sey bhadhakar bhi nahi hain tho bandhu aap ney aasey kasey amaze liya kee patrakar pheechey raha sakthain hain …janab ear dalal dhoodhgey tho hazaro pawho gey …aaj patrakarita aapney sabchey neechaley star par hain sir itna hain kee kisi ko mukaa milan jaise kee aap jeese sacjan kaa naam ney rahe hain aura aap koo mauka nahi mila aur aap yahain par logo koo zuti kahaniya data rahe hoo……jai hind
Abhishek sharma
December 31, 2010 at 12:50 pm
JABARDHASHT…GANDAGI HAI TO DIKHNEE BHI CHAHIYE…NAAM KHULASE ME KUCHH NAHI RAKHA HAI…
ABHISHEK SHARMA
ETV NEWS
AURAIYA (UP)
ajay tripathi bhopal
December 31, 2010 at 11:16 am
शिशिर जी,
खबर पढ़कर एकबारगी मुझे लगा कि किसी साथी ने कहीं मेरे अनुभवों की कहानी तो यशवंत जी को नहीं भेज दी। अच्छा लगा। काफी दिनों बाद अपनी सोच वाला कोई मिला है। आप सोचने में समय ऐसे ही निकालो ऊपर वाला बहुत देगा। अगर नहीं भी देगा तो….पीठ पीछे गाली देने वाले मित्र भी नहीं देगा। ऐसे ही रहो दोस्त…।
जैसा कि आपने लिखा है कि आपका १६ साल का अनुभव है। मेरा सिर्फ प्रिंट का १६ साल का अनुभव है सात साल का इलेक्ट्रानिक का…। इसलिए अगली बार हम किसी भी तरह मिले तो मैं शिशिर के साथ जी और आप नहीं लगाऊंगा।
अजय त्रिपाठी
, स्टेट कार्डीनेटर साधना न्यूज भोपाल मप्र 09425019001
यशवंत
December 31, 2010 at 6:45 am
लेखक ने अपना नाम खोलने की अनुमति दे दी है. उनका नाम है शिशिर सिन्हा. उनकी मेल आईडी है- [email protected]
आभार
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया
Ajai Kumar
December 31, 2010 at 8:14 am
पढ़कर लगा कि शायद शिशिर ही होंगे…करीब सात साल पहले उनसे मुलाकात हुई थी जब वो आजतक में थे…किसी की सिफारिश लेकर उनके पास गया था नौकरी मांगने…बड़े प्यार से मिले, चाय पिलाकर कहे कि ‘यार तुम्हें झूठे सपने नहीं दिखाना चाहता, मेरी इस चैनल में इतनी हैसियत नहीं है कि मैं तुम्हें यहां नौकरी दिला पाऊं…हां तुम्हारी सीवी सीधे एचआर के पास देते जाऊंगा, मेहनत करो और नौकरी मिल जाएगी…
जल्द मौका भी मिला…उसी चैनल की लॉन्चिंग टीम में शामिल हुआ जिसमें आज शिशिर हैं…
जितने सज्जन वो स्क्रिन पर दिखते हैं, उससे कहीं ज्यादा असलियत में हैं..ये मैंने एक बार की ही मुलाकात में जान गया…
Amit Singh Virat
December 30, 2010 at 8:57 am
jo bhi patrakar bandhu is tarah ki khabar likh kar naam na chhapne ki guzarish karte hain hunhein is tarah ki khabar ya vichar likhne ka koi adhikar nahin hai. kya auchitya hai is khabar kha isse achchha to to koi kalpnik kahani likh dete bhai
बिल्लू
December 30, 2010 at 9:13 am
पूरे देश की हर भाषा की पत्रकारिता में ऐसे किस्से खूब हैं। जिन्होंने यह घटना लिखी है संभवत: वे राजा हरिश्चंद्र के वंशज से आते हैं।
shravan kumar shukla
December 30, 2010 at 9:25 am
Wahh yashwant sir ji,, kya sach kahi aapne ….. aur yah sawa crore wale mahashay jo kuch bhi kiye aap parda utha diya hai…waristha patrakaar mahoday ne jo lekh bheja uske liye shukriya
shravan kumar shukla
December 30, 2010 at 9:29 am
achhi pol kholi…sach kahe to aaj ke patrakaarita ki disha aur dasha aise hi logo ne badli hai….ek baat aur kahna chahunga sir ji…aap jaise chand logo ne hi patrakaarita ki maryada ko jeewant rakha hai..warna aaj to saare patrakaar ya media house government ki rakhail bankar rah gaye hai…kya karu? isse ghatiya word nahi mila
nikunj
December 30, 2010 at 9:30 am
the story written is nice we get to know about the chance which you got in your life and also one thing that you shoul always think before you start any thing
kranti kishore Mishra
December 30, 2010 at 11:57 am
Dear Yashwant ji.
Unknowingly you are becoming the part of corrupt services by publishing this story.If a person cant dare to open names than proves that his entire exercise is for self praising ,no matter he opens up his name or not.
Dharmendra Kumar
December 30, 2010 at 12:52 pm
कृपया नाम दें उन पत्रकार महोदय का… वैसे ही कागज काले करने का क्या मतलब है। खासकर तब जब लिखने वाला वरिष्ठ पत्रकार है।
vikram
December 30, 2010 at 1:00 pm
read every point but if u r saying i m white colar then y not to disclose the name these r not ethicks of journlism
satya prakash "AZAD"
December 30, 2010 at 2:30 pm
शायद नए पत्रकार साथी अब समझेंगे, पत्रकारिता क्या चीज़ है…
malik
December 30, 2010 at 2:39 pm
padhane se TV Juornalist, Anchor lagte ho vo bhi buss. channel ke …bhai sahab jab likhane ki himmat rakhte ho to nam batane se kayon darte ho…darte ho to mat likho…………..
mahmood alam
December 30, 2010 at 5:50 pm
ye bhai sahab mujhe noutanki baj jyada dikhate hai likhane ke liye sab kuch likh dala lekin nam likhane mai pareshani kyon likhane ki himat rakhate ho to nam likhane ki himat rakho .yaise log midea ko badnam karke rakhe hai…mahmood alam
Directer