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हे अग्रवाल, उत्तराखंड से अपनी दुकान उठाओ

विजय वर्धन लाहोरीनाग-पाला, पाला मनेरी और भैरोंघाटी जलविद्युत परियोजना को रद्द करने के फैसले के साथ, जिस तेजी से उत्तराखण्ड का राजनैतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंचा है। उससे ज्यादा तेजी से राज्य में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर नये ठेकेदारों का भी उदय हुआ है। परियोजनाओ को बंद करना कितना सही और गलत है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार के इस फैसले ने यहां पर्यावरण के नये ठेकेदारों को स्थापित जरूर कर दिया है। इस बार नये गुट के नेता बनकर उभरे है, डा. जी डी अग्रवाल।

विजय वर्धन लाहोरीनाग-पाला, पाला मनेरी और भैरोंघाटी जलविद्युत परियोजना को रद्द करने के फैसले के साथ, जिस तेजी से उत्तराखण्ड का राजनैतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंचा है। उससे ज्यादा तेजी से राज्य में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर नये ठेकेदारों का भी उदय हुआ है। परियोजनाओ को बंद करना कितना सही और गलत है, ये एक अलग बहस का मुद्दा है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार के इस फैसले ने यहां पर्यावरण के नये ठेकेदारों को स्थापित जरूर कर दिया है। इस बार नये गुट के नेता बनकर उभरे है, डा. जी डी अग्रवाल।

जिन्होंने पूरी जवानी कानपुर आईआईटी में पढ़ाते हुए बिताई है। लेकिन कभी भी उन्होंने वहां गंगा की शुद्धता पर आंदोलन करना तो दूर की बात है, दो शब्द बोलना भी उचित नही समझा। जबकि गंगा की सबसे अधिक दुर्गत इसी जिले में हुई है। ऐसे में सवाल ये उठाता है कि आखिर क्यों? रिटायर होने के बाद अग्रवाल महाशय और उनके जैसे कुछ अन्य लोगों को उत्तराखण्ड के पर्यावरण की याद क्यों आई? सवाल सिर्फ इतना सा नही है। सवाल राज्य का विकास बनाम महानगरों को मिलने वाली शुद्द हवा और पानी का भी है। इसमें कोई दो राय नही कि आज पूरे विश्व में ग्लोबल वार्मिंग एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है।

पर्यावरण को बचाने के लिए महान बहसों का दौर जारी है। लेकिन सवाल ये भी है कि आखिर पर्यावरण को बचाना सारा दारोमदार क्या उत्तराखण्ड का ही है? जहां तक बात उत्तराखण्ड की है कि ये प्रदेश उत्तर भारत के साथ ही पूरे भारत के पर्यावरण को नियन्त्रित करता है। जबकि जैव-विविधता के मामले में इसका स्थान विश्व में आता है। इसमें कोई दो राय नही है। लेकिन इस सब की कीमत राज्य के लोग खुद को तमाम मुश्किलों में डालकर चुका रहे हैं। प्रदेश के भू-भाग का 67 फीसदी हिस्से पर जंगलों का कब्जा है। यानी एक करोड़ से अधिक की आबादी के लिए 53 हजार 4 सो 83 वर्ग किलोमीटर में से मात्र 18 हजार 89 वर्ग किलोमीटर ही रहने और खेती-बाड़ी करने लायक है।

वर्तमान में राज्य की कुल भूमि की मात्र 6 फीसदी ही बमुश्किल खेती सम्भव है। ये आंकड़ा इस बात की भी तस्‍दीक कर रहा है कि प्रदेश में विकास की सम्भावनाएं काफी कम है। 67 फीसदी जमीन वन भूमि होने का साफ मतलब है कि इस भूमि पर ना तो राज्य वासियों का हक है और ना ही यहां की सरकारों का। यहीं वजह है कि आज भी राज्य के अधिकांश गांवों में प्रदेश सरकारों के चाहने के बावजूद ना तो सड़कें पहुंच पा रही है, ना ही पेयजल, बिजली और टेलीफोन की लाइनें बिछ पा रही है। कई इलाकों के हालात तो इस कदर बदतर है कि प्राइमरी स्‍कूल के लिए भी जमीन नहीं मिल पा रही है। यानी सबकुछ वन महकमें की अनापत्ति पर निर्भर है और अनापत्ति देने वाले है, दिल्ली में बैठे हुक्मरान। जिन्हें उत्तराखण्ड का भूगोल तक पता नही है। जबकि एक वैज्ञानिक पहलु ये भी है कि 33 फीसदी जंगल पर्यावरण के लिए काफी है।

यहीं नही भागीरथी, अलकनंदा, गंगा, काली और सरयू जैसी प्रदेश से निकलने वाली अनेकों नदियां भले ही देश को पानी दे रही हों। लेकिन ये भी एक बड़े भू-भाग को प्रदेश के लोगों के लिए प्रतिबन्धित किये हुए हैं। ये तमाम आंकड़े इस बात की ओर फिर संकेत कर रहे है कि आखिर जरूरत से ज्यादा पर्यारवरण संरक्षण की राज्य को जरूरत क्या है। क्या प्रदेश की जनता का ये त्याग दिल्ली जैसे महानगरों को शुद्द हवा-पानी देने के लिए है। अगर हां तो बदले में उन्हें क्या मिलने वाला है। जिस राज्य का निर्माण स्थानीय हितों को देखते हुए हुआ था। आज उसके खेवनहार वो लोग बनते जा रहे है।

जिनका पहाड़ से कभी कोई सरोकार ही नही रहा। ऐसे में लाजमी है कि शुद्ध हवा और पानी की कीमत वसूली जाए और साथ ही तय किया जाय कि पहाड़ी प्रदेश के पर्यावरण की चिंता कौन करेगा। जहां तक राज्यवासियों के पर्यावरण प्रेम का सवाल है। पूरे मुल्क में उत्तराखण्डियों से ज्यादा पर्यावरण को बचाने का काम किसी प्रदेश ने नही किया है। चिपको और जंगल बचाओ आंदोलन यहीं चले हैं और यहीं के लोगों ने चलाये हैं। इन्हीं आंदोलनों से पैदा हुई चेतना की बदौलत आज पूरा प्रदेश वनों से पटा है।

शासन और प्रशासन परस्त माफिया ताकतों को छोड़ दे तो आम उत्तराखण्डी अभी भी पर्यावरण संरक्षण को ले कर काफी सचेत हैं। लेकिन फिर भी गंगा की चिंता जताते है, प्रो. जी डी अग्रवाल और उनके साधु-सन्यासी साथी। जबकि सच्चाई ये है कि गंगा की सबसे बुरी स्थिति ऋषिकेश से नीचे है। इससे ऊपर के इलाकों में आज भी गंगा शुद्ध है। फिर भी ना जाने क्यों पर्यावरण के ठेकेदारों की नजर ऋषिकेश से नीचे नही जाती है।

असल में ये पूरा मामला उत्तराखण्ड के लोगों के नाम अघोषित रूप से पर्यावरण संरक्षण का ठेका डालने का है। ताकि महानगरों में रहने वालों को पहाड़ के विकास की कीमत पर शुद्ध हवा-पानी मिल सके। ये एक तरह की साजिश है। अभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए कमजोरों लोगों को बलि चढ़ाने की परम्परा पहले से ही रही है। आज भी यही हो रहा है। पर्यावरण के ये ठेकेदार उत्तराखण्ड के भीतर इन्हीं आभिजात्य लोगों के परोकार है। अगर ऐसा नही है तो दिल्ली और यूपी के बड़े शहरों में अंधाधुंध विकास किस कीमत पर हो रहा है? क्या ये सवाल पर्यावरण के ठेकेदारों को नहीं पूछना चाहिए।

एक तरफ उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों में रोजगार की सम्भावनाएं ना के बराबर है। रोजगार की पूरी तरह सरकारी नौकरियों पर निर्भर है। सरकारों के लाख दावों के बावजूद पहाड़ों में इन दस सालों में एक भी उद्योग विकसित नही हो पाया। पर्यटन और हर्बल प्रदेश के दावें अपनी मौत मर रहे हैं। उम्मीद ऊर्जा प्रदेश की बची थी तो वो भी कभी पर्यावरण के नाम पर तो कभी किसी के नाम पर, अब वे भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। केन्द्र सरकार द्वारा एक झटके में करीब एक हजार मेगावाट की तीन बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं को बंद करना ऊर्जा प्रदेश के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है।

इन सच्चाईयों के मद्देनजर क्या ये सवाल नही उठाया जाना चाहिए कि शुद्ध पर्यावरण देने के नाम पर राज्य को आखिर मिल क्या रहा है। अगर केन्द्र और यूपी को शुद्ध हवा पानी की दरकार है तो बदले में राज्य क्या कुछ रियायतें नही दी जानी चाहिए। आर्थिक पैकेज को छोड़ कर इन रियायतों का रूप भी अलग होना चाहिए। क्यों आर्थिक और ग्रीन पैकेज आदि का लाभ आम लोगों के बजाय नेताओं और अफसरों की झोली भरने का काम ज्यादा आता है। केन्द्र में बैठे लोगों को और प्रो. जी डी अग्रवाल जैसे पर्यावरणविदों को अगर वाकई में पर्यावरण की चिंता है तो उत्तराखण्ड से बाहर अपनी कोशिशें जारी रखें और साथ ही उत्तराखण्ड के लोगों द्वारा पर्यावरण के नाम पर चुकाई जा रही कीमत का मोल भी चुकाये।

लेखक विजय वर्धन उप्रेती टीवी पत्रकार और हिमालयन जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष हैं.

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0 Comments

  1. Hem Pant

    November 16, 2010 at 6:48 am

    विजय भाई आपने सही समय पर एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है.. पहाड़ के लोग भावनात्मक रूप से अपनी नदियों और जंगलो से जुड़ें हैं. इनका संरक्षण करना उनके संस्कारों में छिपा है… बाहरी लोग आकर सिर्फ अपनी नेतागिरी चमकाते हैं और पर्यावरण पुरस्कारों की चाहत में स्थानीय लोगों की भावनाओं के साथ खेलते हैं..

  2. narayan pargain

    November 16, 2010 at 10:56 am

    vijay ji dukardar bhaut hai kis ki band karoogay dukan this is devdhoomi

  3. nk singh

    November 16, 2010 at 2:27 pm

    bewakufi bhara lekh likhnae me aapko nobel prize deta hoon ……..nainital

  4. chandan Singh Bhakuni (Kadam)

    November 17, 2010 at 4:57 am

    [b]bahut badiya lekh likha he vijay g. [/b]

  5. harish singh

    November 17, 2010 at 8:22 am

    विजय जी, लेख तो आपने बहुत अच्छा लिखा। लेकिन लगता है। पर्यावरण के ठेकेदारों को कम ही भाया होगा। आपने सही कहा, उत्तराखण्ड में वन ही बचे है। जो भले ही देश को शुद्ध हवा पानी देते हो। लेकिन प्रदेश की जनता के लिए किसी अभिषाप से कम नही है।

  6. dipak jishi

    November 17, 2010 at 1:26 pm

    bahut achcha likha he. shayad netao ki aankh khule

  7. aalok pant

    November 17, 2010 at 2:54 pm

    शीर्षक से लगता है कि आपको पर्यावरण से ज्यादा चिंता उभरते अग्रवाल नेतृत्व की है। इस जातीय और क्षेत्रीय विद्वेष से तो देश नहीं चल सकता।

  8. himanshu giri

    November 24, 2010 at 6:49 am

    is lekh main Do ajag alag muddo ko, milakar galat message nikal raha hai, lekin intention saaf hai ki vikas ki kimat hami kyun chukaye, aur iske badale hame rest of country se kya mil raha hai, masala seedha hai ki, hame hamare paryavaran sanrkshan ki poori royalty milni hi chahiye.
    jahan tak savaal agrawal sahab ka hai old age main har koi apne liye swarg ka rasta kholana chahata hai,inhone apne kritya se jitana nuksaan desh ka kiya hoga yah uska pachtava maatr hai, lekin unke rajneetik samarthako ko katai shah nahi di jaani chahiye.

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