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भिंड के वाटर वर्क्स से दिल्‍ली के सीआर पार्क तक एक जैसे आलोक

16 जनवरी 2011, सवेरे अचानक फिर शरद श्रीवास्तव का फोन आया.. बगैर भूमिका के बोले -अभी दिल्ली चलना है, जल्दी से कपडे़ अटैची में डालो. शरीर में एकदम बिजली सी कौंध गयी. रात को ही बात हुई थी और तय हुआ था 21 को चलेंगे.. अचानक क्या हुआ?  एकदम मुंह से निकला- क्या भाई साहब की तबीयत बिगड़ गयी है… जबाब हाँ में था… मात्र एक घंटे में हम लोग दिल्ली रवाना हो गए.

16 जनवरी 2011, सवेरे अचानक फिर शरद श्रीवास्तव का फोन आया.. बगैर भूमिका के बोले -अभी दिल्ली चलना है, जल्दी से कपडे़ अटैची में डालो. शरीर में एकदम बिजली सी कौंध गयी. रात को ही बात हुई थी और तय हुआ था 21 को चलेंगे.. अचानक क्या हुआ?  एकदम मुंह से निकला- क्या भाई साहब की तबीयत बिगड़ गयी है… जबाब हाँ में था… मात्र एक घंटे में हम लोग दिल्ली रवाना हो गए.

एक गाड़ी में मैं था. शरद जी थे, भगवान सिंह तोमर जी और अरुण सिंह तोमर जी थे और दूसरी गाड़ी में मालनपुर के पूर्व सरपंच सुरेन्द्र शर्मा जी और सहारा हॉस्पीटल ग्वालियर के मालिक डॉ. भल्ला. डॉ भल्ला को छोड़कर बाकी सब वे लोग थे, जिन्हें आलोक तोमर अपने गुलदस्ते के फूल कहते थे. शरद श्रीवास्तव का पत्रकारिता से कभी कोई वास्ता नहीं रहा. वे व्यवसायी हैं और समाजसेवी लेकिन आलोक तोमर 1978 में जब ग्वालियर पहुंचे और स्वदेश अखबार में नौकरी पाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तब से दोनों का साथ था. उनके घर में आलोक जी ने अपना पहला नीड़ बनाया और फिर डी-11 गांधी नगर, ग्वालियर हमेशा के लिए उनका स्थाई पता बन गया. कहने को तो शरद उन्हें मामा कहते थे, लेकिन दोनों में भाई का रिश्ता था या दोस्त का कोई नहीं जान पाया. पारिवारिक और निजी मामलों में आलोक सुनेंगे भले सब की लेकिन करेंगे वही जो शरद कहेंगे, यह बात सब दोस्त जानते थे. उनके माता पिता भी.

अरुण सिंह तोमर भी उनके शुरुआती दौर के साथी रहे, लेकिन आलोक जी ने उन्हें दोस्त कभी नहीं माना. वे उन्हें बड़े भाई का दर्ज़ा देते थे. मुरैना के भगवान सिंह तोमर को उनके घर में बड़े भाई का दर्जा था. खास बात और देश में सिर्फ ये तीन आदमी ऐसे थे जो आलोक जी पर नाराज होते थे, लेकिन कभी भी उनके सामने आलोकजी ने जवाब नहीं दिया. जहाँ तक मेरा सवाल है, देश भर में मुझे लोग उनके शिष्य के तौर पर मानते हैं. स्वदेश अखबार को छोड़कर अंतिम साँस तक आलोक जी जहाँ भी रहे… मुझे उन्होंने सदैव  जोड़कर रखा… जनसत्ता से लेकर शब्दार्थ और डेटलाइन इंडिया तक. मुझे याद है जब वे मुझे लेकर प्रभाष जोशी जी के पास गए थे, प्रभाष जी बोले -आलोक तुम इस लड़के को जनसत्ता का संवाददाता क्यों बनवाना चाहते हों, तो आलोकजी का जवाब था- क्योंकि मुझे इसका लिखा हुआ पढ़ना अच्छा लगता है… और मैं जनसत्ता से जुड़ गया.

दिल्ली पहुँचते-पहुँचते 6 बज चुके थे. सबको जल्दी थी बत्रा हॉस्‍पीटल पहुंचने की सवेरे सुप्रिया भाभी ने फोन पर बताया था कि उनकी आवाज़ नहीं निकल रही… वे बहुत चिंतित थी. हम लोग सीधे अस्पताल पहुंचे. कमरे में घुसे तो वे सो रहे थे… डॉ. ने उन्हें कोई दवाई दी थी, जिससे नींद आती है, लेकिन जैसे ही उनके कानों में हम लोगों की खुसुर-फुसुर गयी, दवा का असर छू मंतर हो गया. वे मुस्कराए और थोड़ी ही देर में उठकर बैठ गए… बोले मैं बिलकुल ठीक हूँ… और फिर शुरू हो गया भिंड, ग्वालियर, मुरैना  पुराण… कई घंटे बीत गए… इस बीच भोपाल से मित्र अजीत भास्कर का फोन आया तो लपककर मोबाइल उठा लिया, वह कुछ बोल पाता इससे पहले ही बोल पड़े- भास्कर तुम क्या सोच रहे थे काम हो गया? यार हम अभी नहीं मर रहे… पूरी ग्वालियर मंडली बैठी है… नहीं मान रहे तो इनसे पूछ लो.. और मोबाइल शरद को थमा दिया.. शर्त यह कि बताओ कि मैं ठीक हूँ.

आलोक तोमर मुरैना में पैदा हुए. लेकिन उनका पूरा बचपन भिंड में बीता. उनके माता और पिता दोनों शिक्षक थे और वे अपने बड़े बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन आलोक साहित्यकार बनना चाहते थे. अपनी आदत के मुताबिक वे वही बने जो वह बनना चाहते थे. बीते 17 मार्च को ग्वालियर से भोपाल जाते समय सुप्रिया जी से बात हुई तो उन्होंने बताया हालत ठीक हो रही है… लेकिन मात्र एक घंटे बाद फिर फोन आया तो पता चला कि अचानक हालत बिगड़ गयी… भोपाल पहुंचकर फिर बात की तो पता चला कि वे बेहोश हो गए हैं… डॉक्टर्स से बात की तो उन्होंने बताया कि होश आते ही इलाज शुरू हो पायेगा. फिर ठीक होने की उम्मीद के साथ एक-एक पल काटने लगा… सब दोस्तों ने तय किया कि होली निकलते ही सब लोग फिर दिल्ली चलेंगे… लेकिन होली के रोज़ 20 मार्च को सवेरे ही वह दुखद खबर आ गयी, जिसको मानने को कभी मन तैयार नहीं था…आलोक जी नहीं रहे…

फिर पांचों दोस्त फटाफट गाड़ी से दिल्ली को निकले 21 मार्च की दोपहर जब हमलोग अंत्येष्ठि के बाद सीआर पार्क लौटे तो उनके पिता मध्य प्रदेश के पूर्व आईपीएस अफसर विजय वाते को देखकर भावुक हो गए, बोले- आलोक विज्ञान की किताबों में छुपाकर निराला और मुंशी प्रेमचन्द की किताबें रखते थे. वाते साहब उनके पहले गुरु थे. लोधी रोड के शमशान पर आलोकजी की पार्थिव देह की उठती लपटें और सामने खड़ी सुप्रिया और मिष्‍ठी का वे सामना नहीं कर पाए… तेज़ी से एकांत में गए और फफक-फफकर रोये. उन्होंने वह पल बताया जिस पल ने आलोक को पत्रकार आलोक तोमर बनाया. दरअसल तब वाते साहब भिंड में नए नवेले डीएसपी थे. उनकी गिनती साहित्यकारों में होती थी. यह पता चलने पर आलोक तोमर अपने एक दोस्त केपी सिंह के साथ हाफ पैंट पहनकर उनके बंगले पर पहुँच गए… बड़े संकोच के साथ उन्होंने जेब से कुछ पन्ने निकाले और कहा- सर मैंने एक कहानी लिखी है,मैं चाहता हूँ कि आप इसे पढ़ों, वाते जी ने उसे पढ़ा और सराहा और फिर एक रिश्ता जुड़ गया. भिंड के इटावा रोड पर स्थित ऑफिसर्स कालोनी से शुरू हुआ यह संपर्क लोधी रोड के शमशान घाट पर ख़त्म होगा? अंदेशा भी नहीं था.

आलोक जी से दोस्ती करना और निभाना भी बड़ी टेढ़ी खीर थी. उनसे इकतरफा मुहब्बत रखना पड़ती थी, लेकिन एक खास बात यह कि वे किसी के प्रति दुर्भावना भी नहीं नहीं रखते थे. खबर के प्रति उनकी निष्ठा इस कदर थी कि करोड़ों का लालच-प्रलोभन या फिर मौत का दबाव भी उन्हें इस निष्ठा से टस से मस नहीं कर पाता था. उन्होंने अंतिम सांस तक अपने विचार व्यक्त करने के अधिकार की पूरे समर्पण के साथ रक्षा की. इसके लिए मैं एक और घटना का जिक्र करना चाहूँगा.. आलोक जी का स्वास्थय जानने 16 जनवरी को जब हम लोग ग्वालियर से निकले थे, तब ही मध्य प्रदेश के जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव से बात की थी. उन्हें बताया था कि आलोक जी की तबीयत और बिगड़ रही… राकेश जी और आलोक जी के रिश्ते भी परवारिक थे. उन्होंने अपनी ओर से ही प्रस्ताव दिया कि एक आवेदन भिजवा देना मेरी सीएम साहब से बात हो गयी है… यह बात बत्रा हॉस्पीटल में हम लोग सुप्रिया जी को बता रहे थे. साथ ही आलोकजी से निवेदन कर रहे थे कि अभी वे कम से कम मध्य प्रदेश सरकार के बारे में न लिखें… पहली बार था कि वे बोले कुछ नहीं… उनके होठों पर एक मुस्कान थी और ख़ामोशी… हमें लगा उन्होंने हमारी बात मान ली, लेकिन ग्वालियर आने से पहले ही भ्रम टूट गया… सच यह था… हम लोगों के ग्वालियर पहुंचने के पहले ही उन्होंने मेल करके सरकार से कह दिया था – हमें कोई सहायता नहीं चाहिए.. और दूसरे ही दिन किसानों की आत्महत्याओं को लेकर देश के अखबारों में उनका लेख छपा था- किसानों की मौतों पर सियासी आडम्बर बंद करे शिवराज सरकार.

आलोक तोमर ने अपनी पत्रकारिता में सामाजिक सरोकारों के लिए खोज को अपना औजार बनाया. अर्जुन सिंह को उनका दोस्त माना जाता था, लेकिन इस दोस्ती की नींव एक ऐसी खतरनाक खबर पर रखी थी. आलोक तब स्वदेश ग्वालियर में काम करते थे. मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल वाले श्योपुर जिले में कुपोषण से दो दर्ज़न आदिवासी बच्चों की मौत हो गयी. विधानसभा में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने मौतों की बात से इनकार किया, लेकिन दूसरे दिन आलोक तोमर ने एक खोजपूर्ण रिपोर्ट छापी. शीर्षक था- मुख्यमंत्री झूठ  बोलते हैं. इसमें मृत बच्चों के नाम पते और परिजनों से बातचीत शामिल थी. मारुति कार घोटाला, यूनियन बैंक घोटाला जैसे जाने कितने घोटाले उन्होंने उजागर किये. अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अर्जुन सिंह तक सबके वे नजदीक थे, लेकिन जब भी समय आया आलोक जी ने उन्हें अपनी कमान की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर खबर की दुनियां तक पहुंचाने में रंच मात्र भी गुरेज नहीं किया. हर कोई उनकी खबर के प्रति निष्ठा का कायल था.

चम्बल की छवि को ठीक ढंग से प्रस्तुत करने में हरदम रूचि दिखाई. चम्बल से उन्हें बहुत प्रेम था. मैंने कुछ वर्ष पहले उनके साथ भिंड, मुरैना और श्योपुर का कई दिनों तक भ्रमण किया, हजारों फोटो खींचे. फिर वहां की एतिहासिक, पुरातात्विक संपदा पर एक किताब लिखी -“चम्बल : तस्वीर का दूसरा पहलू”, इस पुस्तक को मध्य प्रदेश सरकार ने प्रकाशित किया था. प्रभाष जोशी और आलोक जी ग्वालियर-चम्बल अंचल के हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में आने को तैयार रहते थे. उन्होंने अपने को किसी खास विषय से बांधकर नहीं रखा. उन्होंने उन्होंने जहाँ माफिया पर निशाना साधते हुए -“काला धंधा गोरे लोग” नामक किताब लिखी वहीं अकाल किस तरह अफसरों को अमीर करने का रास्ता बन गया है, इस बात का खुलासा करने के लिए उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी में कई महीनों रहकर किताब लिखी नाम था- “एक हरा भरा अकाल”.

उनके मित्र अरुण सिंह तोमर सच ही कहते हैं -आलोक को हर काम की बहुत जल्दी रहती थी. वे बाथरूम में सिर्फ घुसते थे और नहाकर इतनी जल्दी निकलते थे कि आपको शक हो जाये कि उन्होंने नहाया भी है कि नहीं? यही बात खबर को लेकर भी थी. एक बार कोई खबर दिमाग में आई नहीं कि लिखकर तैयार. वे सरस्वती के पुत्र थे. उनके विरोधी भी कहते थे- लगता है सारी पत्रकारिता भगवान ने आलोक को ही दे दी है. खूब पढ़ना और समय पर याद आ जाना यह उनकी शख्सियत की विशेषता थी. वे बगैर लिखे सबके फोन नंबर याद रखते थे. वे कहते थे फोन नंबर वे नहीं उनकी उँगलियाँ याद रखती हैं… आलोकजी को हर काम की ज़ल्दी रहती थी. उन्होंने अंत तक अपनी इस आदत को कायम रखा. वे ज़ल्दी ठीक होना चाहते थे. उन्होंने अंतिम समय में एक कविता लिखी- काल तुझसे होड़ है मेरी…

आलोक हार मानने वालों में नहीं थे… उन्हें लम्बी लड़ाई में भरोसा नहीं था… वे सबकुछ जल्दी करना चाहते थे… कैंसर से मुकाबला भी.. लेकिन उन्हें लगा कि कैंसर से लड़ने में उन्हें जल्दबाजी की अपनी आदत बदलनी पड़ेगी… तो चम्बल का यह जिद्दी क्षत्रिय कैसे तैयार होता… उसने अपनी जल्दबाजी की आदत की रक्षा के लिए ज़ल्दी से दुनियां छोड़ जाने में भी देर नहीं की… हिन्दी पत्रकारिता को देश दुनिया में आलोकित करने वाले इस आलोक ने मात्र पचास साल की अल्पायु में दुनिया छोड़ दी. आलोक तोमर की हर जल्दबाजी से भले उन्हें नुक्सान हुआ हो लेकिन उन्होंने किसी को कभी कोई नुकसान नहीं किया.

यद्यपि जीवन त्यागने की इस अंतिम जल्दबाजी ने तमाम लोगों को मझधार में छोड़ दिया.. उन सुप्रियाजी को जिन्होंने उनका साथ हर कदम पर दिया. लोधी रोड के शमशान पर जब 19 साल की उनकी सबसे लाडली बेटी मिष्‍ठी अपने उस पापा की पार्थिव देह पर पिंड दान कर रही थी तो सुप्रियाजी एक पल अपने आंसू रोककर बोली- देव क्या मिष्‍ठी के यह सब करने की उम्र है? मेरे आंसू फव्‍वारे की तरह निकल पड़े. लेकिन मिष्‍ठी एकदम गुमसुम और खमोश थी. जब अंत्येष्ठि के बाद हिन्दू कालेज के उसके दोस्त आँखों में आंसू भरकर विदाई ले रहे थे, तो पता है मिष्‍ठी उनके कानों में क्या फुसफुसा रही थी? -अब पापा नहीं है.. मैं नहीं रो सकती… मैं नहीं रोउंगी… मैं रोउंगी तो माँ और टूट जायेंगी… आलोक जी सुप्रिया जी से बहुत प्यार करते थे… मिष्‍ठी दोनों का साझा प्यार है. मिष्‍ठी जानती है अब माँ को उसे दो प्यार देना होगा… पहला भी और दूसरा भी.

श्‍मशान से लौटकर घर पहुँचने पर सुप्रिया बँगला में मिष्‍ठी को समझा रही हैं -अब तुम्हें वह सब खाना है जो पापा खाते थे -अरहर की दाल, बालूशाही की मिठाई… दोनों के चेहरे पर चमक है मानो मज़ाक चल रहा हो… लेकिन तभी आलोक जी की अंतिम दौर में अद्भुत सेवा करने वाले मित्र अनिल उनकी फोटो को सजाकर माला चढाते हैं. इस तस्वीर पर निगाह जाते ही सुप्रिया की आँखों में कुछ समय रुका आंसुओं का तटबंध फिर टूट पड़ता है… सबकी आँखें एक जैसी हो जाती है… मिष्‍ठी पहले जैसी खामोश रहती है… गुमसुम.. अपने जुझारू पापा की जुझारू बेटी को पता है… वह अब सिर्फ बेटी नहीं रही… पापा भी है… माँ के लिए आलोक तोमर भी.

जब हम लोग वापस लौटने को तैयार हैं… सुप्रियाजी कहती हैं घर रहेगा… पेड़-पौधे रहेंगे… सब कुछ रहेगा… बस आलोक नहीं होंगे, अचानक वह हम लोगों की तरफ मुड़कर कहती हैं अब आप लोग कभी नहीं आओगे यहाँ? मैं, शरद, भगवान सिंह भाई साहब, अरुण सिंह भाई साहब, राहुलदेव जी सबकी आँखें पानी उगलने लगती हैं. मुंह निशब्‍द हो जाता है… भगवान सिंह जी कहते हैं- नहीं ऐसा कैसे हो सकता है… हम हमेशा आयेंगे… पहले से ज्यादा आयेंगे… मेरे सामने पैदा हुई…. हम लोगों की गोद में खेली मिष्‍ठी खामोश बैठी है… मुखिया की तरह… उसे पता है… माँ की हर समस्या का इलाज़ अपनी जेब में रखने वाले पापा अब नहीं हैं… उसे मिष्‍ठी भी रहना है और पापा भी बनना है… वह शायद जान गयी है कि वह रोकर पापा द्वारा सौंपी गयी जिम्मदारी के प्रति अपनी निष्ठा को कमज़ोर नहीं होने देगी. पापा नहीं चाहते थे मिष्‍ठी की आँखों में आंसू आयें… सो वह उनकी इस इच्‍छा को पूरा कर रही है… लेकिन हम जैसे उन लोगों का क्या होगा? जिनकी तो पहचान ही सिर्फ आलोक तोमर थी.

आलोक जी ने चम्बल-ग्वालियर की ख़बरों को राष्ट्रीय पहचान दी. देश को डाकू और बागियों में अंतर बताया. देश भर के पत्रकारों को आगे बढ़ाया. उत्तर भारत में हजारों ऐसे एकलव्य हैं जो द्रोणाचार्य आलोक तोमर की लेखनी पढ़कर मुकाम तक पहुंचे. वे खेमेबाजी के पत्रकार नहीं थे… दिल्ली में पत्रकारिता में भाग्य आजमाने पहुंचे हर शख्स की उम्मीद और सहारा थे. अब यह सहारा हमेशा हमेशा के लिए टूट गया. विवादों, अड़चनों का मुकाबला आलोक तोमर ने सिर्फ अपनी लेखनी से किया… न वे झुके, न टूटे और न बिके. लोधी रोड के श्मशान पर पत्रकार जगत की जो नामचीन हस्तियाँ थी, उनमें दर्ज़नों ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पत्रकारिता के शुरुआती दिन आलोक जी के जमुना पार, कालीबाड़ी, निज़ामुद्दीन, कालकाजी स्थित आवास में गुजारे. आलोक जी ने उनके रोटी-पानी ही नहीं नौकरी का भी इंतजाम किया. वे आज भौतिक हैसियत से भी शिखर पर हैं, लेकिन आलोक तोमर जैसे दो दशक पहले थे, वैसे अंतिम सांस तक रहे… जिस बुलंदी, फांकामस्ती, फक्कड़पन और अक्खड़पन के लिए जाने और माने जाते थे… उस पूंजी को उन्होंने तब भी नहीं छोड़ा जबकी उनकी आत्मा ने शरीर से विदाई ले ली. आलोक जी का जाना आंचलिक, देशी और राष्ट्रीय पत्रकारीता की एक साथ क्षति है. विनम्र श्रद्धांजलि.

तुम्हारे शहर के सारे चिराग बुझ गये लेकिन,
वो कौन है जो देहरी पर अब भी टिमटिमाता है.

लेखक देव श्रीमाली मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्वर्गीय आलोक तोमर से नज़दीकी से जुड़े थे.

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0 Comments

  1. alok pandya

    March 24, 2011 at 12:59 pm

    आलोक जी कही नहीं गए, हमारे बीच आज भी है, कल भी रहेंगे. एक कालजयी पत्रकार कभी नहीं मरता. आलोकजी ने अपनी कलम से जो आलोक पूरी दुनिया में फैलाया है वो हमेशा रास्ता दिखता रहेगा. जीवट, जुझारू और शिद्दत के साथ पत्रकारिता के लिए समर्पित कलम के ऐसे सिपाही को भौतिक देहावसान पर अश्रुपूरित श्रधांजलि…..वैसे आलोकजी हमेशा जिन्दा रहेंगे.

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