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साहित्य

अब मैं मार दिया जाउंगा

उमेश डोभालउत्‍तराखंड के पत्रकार एवं कवि उमेश डोभाल की शहादत के 23 साल पूरे हो गए हैं. 17 फरवरी 1952 में पैदा हुए उमेश डोभाल की 25 मार्च 1988 में शराब माफियाओं ने हत्‍या करा दी थी. उनके शहादत दिवस पर उनकी लिखी कुछ कविताओं को उत्‍तराखंड के पत्रकार दीपक आजाद ने उन्‍हें श्रद्धांजलि के रूप में भेजा है. जिसमें एक कविता उमेश डोभाल ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले ही लिखी थी. नीचे प्रस्‍तुत हैं उनकी तीन कविताएं.

उमेश डोभालउत्‍तराखंड के पत्रकार एवं कवि उमेश डोभाल की शहादत के 23 साल पूरे हो गए हैं. 17 फरवरी 1952 में पैदा हुए उमेश डोभाल की 25 मार्च 1988 में शराब माफियाओं ने हत्‍या करा दी थी. उनके शहादत दिवस पर उनकी लिखी कुछ कविताओं को उत्‍तराखंड के पत्रकार दीपक आजाद ने उन्‍हें श्रद्धांजलि के रूप में भेजा है. जिसमें एक कविता उमेश डोभाल ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले ही लिखी थी. नीचे प्रस्‍तुत हैं उनकी तीन कविताएं.

युद्व में हूं

बहते हुए झरने, गाड-गधेरे
पहाड़ों की चोटियां
बुग्याल और उनका फैलाव
अच्छे लगते हैं
गीत गाते ग्वाले को
हलवाहों को
बैलों की चुनींदा भाषा में
निर्देश देते हुए
मैं प्यार करता हूं
पहाड़ी सड़क के मोड़
ढलान पर उगे चीड़-वन
अच्छे लगते हैं
कितने अच्छे हैं वे गीत
जो बेजुबानों की जुबान हों
जो अनगढ़ रूप हों प्यार के
मैं उन्हें तराशना चाहता हूं
वह हवा जो हिमालय से आती है
भली लगती है
मुझे अब भी खींचते हैं
घिंघोरू का डंडा और गुल्ली
हल-बैल बन जाने का खेल
मैं इन सबका हिस्सा होना चाहता हूं
इसलिए युद्व में हूं

वे कौन हैं

वे कौन हैं
जो प्रत्येक सुबह
चिड़ियों के चहचहाने से पहले
उठ जाते हैं और
बिछ जाते हैं हर उस जगह
जहां से तुम्हें गुजरना होता है
अपने महत्वाकांक्षी सपनों के साथ
इस खूबसूरत पृथ्वी पर
वे प्रत्येक जगह हैं
अपने श्रम की सम्पूर्ण महक के साथ
गांव में वे जमीन है
जमीन में वे औंधे लेटे हुए
मानो तो शहर भी वे ही हैं
शहर भर को उठाए हुए
और नहीं भी हैं कहीं
वे लाखों लोग
जो तुमसे ज्यादा हैं ताकतवर भी
निरंतर बढ़ रहे हैं और एक हो रहे हैं
आखिर कोई कब तक किसी को रोक सकता है
जमीन पर सीधे खड़े होने से

अब मैं मार दिया जाउंगा

अब जबकि समाप्त हो रहा हूं मैं
मेरा जिस्म
मैं, इस वक्त भी उन्हीं के साथ हूं
यह पहाड़ी की ऊँची बुलंदियां
और नीचे फैली घाटियों का विस्तार
इससे आगे भी
जहां जमीन और आसमान मिलते हैं
वे मेरे अपने लोग
जीवन और मौत के बीच
इस छोटे से ठहराव में
मैं हरवक्त हरकत में रहा हूं
खौरियाये बैल की तरह
या बहते झरने की मानिंद
मैंने जीने के लिए हाथ उठाया
और वह झटक दिया गया
मैंने स्वप्न देखे
और चटाई की तरह
अपनों के बीच बिछा
उठाकर फेंक दिया गया
अंधेरी व भयावह सुरंग में
रोशनी!
मैंने वहां भी रोशनी तलाश की
भीड़ में खड़े आखिरी आदमी से पूछो
मिट्टी में लोटते इन बच्चों से पूछो
उस पल
जब औरत बाजार बनती है
रोशनी!
रोशनी की दरकार कितनी जरूरी है
सूरज के उगने की तरह
अब मैं मार दिया जाऊंगा
उन्हीं के नाम पर
जिनके लिए संसार देखा है मैंने

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0 Comments

  1. ANIL DABRAL

    March 25, 2011 at 1:57 pm

    उमेश भाई की याद दिला दी….

  2. shravan shukla

    March 25, 2011 at 2:45 pm

    umesh ji ko shat shat naman

  3. Rajendra mishra

    March 25, 2011 at 3:03 pm

    bfgbnmn

  4. Devendra patel

    March 31, 2011 at 7:24 am

    ये शब्द और तुकबंदी की मात्र कविता नहीं , बल्कि यही उनका मुकम्मल जीवंत संसार है जहाँ वह हमेशा विना भय – दहशत के अपनी पहचान की बादाशाहियत कायम रखेगे और उनकी शहादत शाश्वत रूप से अमर रहेगी ! इहलोक में हर आने वाले प्राणी को या तो मारा या मर जाना है

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