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दुख-दर्द

हां, मेरी और एलिजाबेथ टेलर की दोस्‍ती थी!

अमिताभजीएलिजाबेथ टेलर हिंदुस्तान में नहीं रहती थीं, उस बिहार और उत्तर प्रदेश में तो कत्तई नहीं रहती थीं जहाँ का मैं रहने वाला हूँ या जहां मेरा ज्यादातर समय बीता है. वे भारत भी शायद ही कभी आई हों, और अगर आई भी होंगी तो मैं तो उनसे नहीं ही मिला हूँ. पर इसके बाद भी मैं जानता हूँ और दावे से कह सकता हूँ कि मैं एलिजाबेथ टेलर को जानता हूँ. जी हाँ, मेरी और एलिजाबेथ टेलर की अच्छी खासी दोस्ती थी, कम से कम मेरी तरफ से तो पूरी तरह.

अमिताभजीएलिजाबेथ टेलर हिंदुस्तान में नहीं रहती थीं, उस बिहार और उत्तर प्रदेश में तो कत्तई नहीं रहती थीं जहाँ का मैं रहने वाला हूँ या जहां मेरा ज्यादातर समय बीता है. वे भारत भी शायद ही कभी आई हों, और अगर आई भी होंगी तो मैं तो उनसे नहीं ही मिला हूँ. पर इसके बाद भी मैं जानता हूँ और दावे से कह सकता हूँ कि मैं एलिजाबेथ टेलर को जानता हूँ. जी हाँ, मेरी और एलिजाबेथ टेलर की अच्छी खासी दोस्ती थी, कम से कम मेरी तरफ से तो पूरी तरह.

मैंने एलिजाबेथ से कई बार बातें भी की थीं और उनको कई बार देखा भी था. साथ ही यह भी बता दूँ कि मैंने उनकी कोई पिक्चर नहीं देखी है, आज तक नहीं. ठीक उसी प्रकार से जैसे मैंने मर्लिन मुनरो को ना तो कभी देखा है और ना ही उस मशहूर अदाकारा की कोई पिक्चर ही देखी है.

इस रूप में आज अभी जब यह खबर मिली कि एलिजाबेथ टेलर नहीं रहीं तो अकस्मात तकलीफ सी हुई, कुछ अजीब सा लगा, कुछ खालीपन सा भी. मैं यह नहीं कहूँगा कि यह भावना अपने किसी नजदीकी की मौत की तरह की भावना है, ना ही मैं इसकी तुलना अभी तीन दिन पहले हमें धोखा दे कर जाने वाले आलोक तोमर जी की आकस्मिक मृत्यु से करूँगा. लेकिन यह जरूर है कि ह्रदय के किसी कोने में एक हलकी सी थरथराहट जरूर हुई, शरीर में थोड़ी झुनझुनाहट तो हुई ही है. इस बात को लेकर एक कसक सी हुई कि एलिजाबेथ टेलर अब नहीं रहीं.

मेरा और एलिजाबेथ का क्या नाता था, हमारे बीच क्या रिश्ता था? यह एक बड़ा ही विचित्र सम्बन्ध है जो लाखों-करोड़ों लोगों का ऐसे कई लोगों के प्रति होता है. तभी तो नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी की हत्या कर देते हैं और रोता सारा संसार है, जैसे हर रोने वाले का अपना कोई सगा चला गया हो. इसी प्रकार से एक ख्यातिप्राप्त फुटबॉलर या मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी की मौत भी ना जाने कितने ही लोगों को रुला देती है. यह अनजाना रिश्ता, यह एकपक्षीय सम्बन्ध, यह दिल के तारों का बंधन इंसानी फितरत की एक और विचित्र मिसाल है, जिसे बहुत सीधी-सरल भाषा में ना तो समझा जा सकता है और ना ही उतनी सरलता से समझाया जा सकता है.

आज मेरी उम्र बयालीस साल है. जब मैं छोटी अवस्था का था, उस समय भी वे लगभग चालीस साल की रही होंगी. पर फिर भी मैं उनका फैन था, उनका दीवाना था. अब कोई फैन है, दीवाना है और अपने मन में इस तरह की दीवानगी पाले हुए है तो दूसरा आदमी क्या कर सकता है? सात समुन्दर पार बैठी एलिजाबेथ हिंदुस्तान के बोकारो शहर में कक्षा पांच में पढ़ रहे अमिताभ ठाकुर की दीवानगी के जोर से अपने आप को कैसे बचा सकती हैं? ना तो उन्हें खबर होनी है, ना तो उन्हें इससे कोई वास्ता है या कभी वास्ता पड़ना है पर फिर भी अमिताभ बाबू है कि अपने दिल के पोरों में एलिजाबेथ टेलर की सम्मोहन मुस्कान और मोहिनी मूरत लिए यहाँ-वहाँ घूम रहे हैं. कभी एलिजाबेथ टेलर की किसी चर्चित फिल्म का कोई पोस्टर या तस्वीर देख कर खुश हो जा रहे हैं तो कभी उनकी और रिचर्ड बर्टन की साथ-साथ की फोटोग्राफ देख कर उनपर सम्मोहित हैं.

मैं समझता हूँ इस तरह के मामले इस संसार में एक-दो नहीं, कई करोड़ होंगे जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का एक पक्षीय दीवाना बना हुआ है, उसकी पूरी जानकारी रखे हुए है, उसके जीवन के छोटे-मोटे डिटेल्स इकठ्ठा कर रहा है, उस पर एक प्रकार से शोध ही कर रहा है और इस प्रक्रिया से इतना अधिक गुजार जा रहा है कि अंत में वह यह हक भी जाहिर करने लगता है कि “मैं फलां को जानता हूँ.” अक्सर ऐसी बातें बचपन में होती हैं पर ऐसा नहीं कि जवानी और बुढ़ापा इससे बिलकुल विलग हो. फिर भी मुझे यही लगता है कि बचपन की ऐसी मोहब्बत या ऐसे वास्ते जीवन भर दिल में कहीं ना कहीं बसे होते हैं.

मैंने एलिजाबेथ टेलर या मर्लिन मुनरो को ही क्यों चाहा या उनके प्रति ही मेरा क्यों लगाव हुआ, या आपके अंदर किसी दूसरे के प्रति ही ऐसी भावना क्यों जगी इसके पीछे आकर्षण का एक पूरा मनोविज्ञान काम करता होगा. सम्मोहन और आकर्षण ऐसे गुण हैं जो चाह कर भी हर किसी में नहीं हो सकते. यह किसी-किसी के व्यक्तित्व की खासियत होती है. मैं दावे से कह सकता हूँ कि एलिजाबेथ टेलर एक ऐसी ही शख्सियत थीं जिनमे आकर्षण और सम्मोहन की कोई कमी नहीं थी. उनके राजसी व्यक्तित्व, चित्ताकर्षक चेहरे-मोहरे, अनन्य अदाएं, सम्मोहक मुस्कान और उनकी भव्यता में ऐसा कुछ था कि हर व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर उनकी ओर खींचा चला जाता था. हॉलीवुड की महानायिकाओं के एक मानी जाने वाली एलिजाबेथ हॉलीवुड के स्वर्णयुग की महानतम प्रतीकों और प्रतिनिधियों में एक हैं. इस पर यदि उनके हर साल कैलेण्डर की तरह पतिदेव बदलने का अंदाज़ जोड़ दिया जाए जो तो चरित्र सामने उभर कर आता था वह था एलिजाबेथ टेलर नामक विश्वसुन्दरी और हॉलीवुड की महासम्राज्ञी का.

लेकिन इन सारी सच्चाईयों से बड़ी सच्चाई तो एक ही है कि समय के सामने सब छोटे हैं, बहुत ही बौने. राजा और रंक का एक ही घाट है, उनकी एक ही परिणति है. जो आज एलिजाबेथ टेलर की हुई है, कल किसी और की बारी है. पर इतना जरूर है कि जिस एलिजाबेथ को मैं जानता था, उन्होंने एक अविस्मरणीय जीवन जी कर विश्वफलक पर अपने लिए एक ऐसा वितान खींच डाला जो इतनी जल्दी समयरुपी रेत पर ओझल नहीं हो पायेगा.

लेखक अमिताभ ठाकुर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.

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0 Comments

  1. ashish kr shukla 09935751550

    March 28, 2011 at 1:30 pm

    achhi lekh apnapan ka ahsas kara raha hai badhai ho ………………….

  2. दयानिधि वत्स

    March 28, 2011 at 1:50 pm

    कई बार बाल्या/किशोरावस्था में कुछ लोग मन पर छाप छोड़ जाते हैं, शायद लिज टेलर ने भी ऐसी ही छाप आपके मन में छोड़ी होगी. लिज टेलर को श्रद्धान्जलि…

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