महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में भारत में उग्र वामपंथ के मुद्दे विषय पर आयोजित दो दिवसीय (30-31 मार्च) राष्ट्रीय संगोष्ठी के उदघाटन समारोह में भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष व न्यायमूर्ति पीबी सावंत ने कहा है कि वर्तमान की सारी समस्याओं का हल लोकतंत्र है। कार्पोरेट सेक्टर चाहते हैं कि आप मौन रहें ताकि वे मुनाफा कमा सकें। माओवाद नक्सलवाद का एक रूप है। क्या आजतक आम जनता को माओवाद के मूल कारणों की जानकारी किसी ने दी है।
उन्होंने कहा कि सरकार जिस तरह से नक्सलवाद से मुकाबला कर रही है क्या वह तरीका सही है। माओवाद की समस्या के लिए विकास नीति आम आदमी के हित के लिए हो तथा उन नीतियों का क्रियान्वयन सही तरीके से हो। विश्वविद्यालय के शोध-समवाय, डॉ. आंबेडकर अध्ययन केंद्र, भदन्त आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र व भारतीय सामाजिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की।
सुप्रसिद्ध मानवशास्त्री व विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. नदीम हसनैन ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि आज जिस रेड कोरीडोर इलाके की बात की जाती है वस्तुत: वह भारत में युद्धरत वामपंथ की समस्या की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। एक लोकतांत्रिक देश में उग्र वामपंथ अपनी शक्ति एवं वैधता शोषित, दमित आदिवासियों के नाम पर प्राप्त करता है। रेड कोरीडोर- ये शताब्दियों से उत्पीड़न के गढ़ रहे हैं यहां गरीबी तथा सभी तरह के शोषण व्याप्त हैं। आदिवासियों की समस्या सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से जुड़ी हैं। आदिवासियों के विस्थापन और भूमि हस्तांतरण के कारण असंतोष पैदा हुआ है।
उन्होंने कहा कि आज कोई नहीं कह रहा है कि राष्ट्र का विकास न हो, पर विकास किस कीमत पर हो, इस पर बहस जरूरी है। जिस तरीके से औपनिवेशिक ताकतें हमारे नैसर्गिक संसाधनों पर कब्जा कर रही हैं और सरकार कहती हैं कि ये पब्लिक इंटरेस्ट में है। कोई भी आदिवासी सरकार से क्यों नहीं पूछे कि आप जिस लोक कल्याणकारी योजना की बात कर रहे हैं, क्या हम उस पब्लिक में नहीं हैं। जिस ‘नेशन डेवलपमेंट’ की बात की जा रही है, ये कैसा विकास है कि कुछ लोगों को ‘गेन’ तो होगा पर अधिक को ‘पेन’ होगा। क्या आदिवासियों की जीवन जीने की लड़ाई में सिविल सोसायटी खामोश रहेगी। उनकी लड़ाई जंगल व जमीन को बचाने की है।
उन्होंने कहा कि पहले वनों पर किसी का सत्ता नहीं थी। अंग्रेजों के आने के बाद औपनिवेशिक सत्ता का विस्तार करने के लिए वनों पर आधिपत्य स्थापित किया जाने लगा। आज आजाद भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा सुनियोजित तरीके से हमारे नैसर्गिक संसाधनों पर कब्जा किया जा रहा है। आदिवासियों के विकास के लिए लैण्ड फॉर लैण्ड की नीति अपनानी चाहिए। सारे ट्राइबल्स एरिया में लैण्ड रिकार्ड को ठीक किया जाय। बंजर भूमि को बनाकर आदिवासियों को दे दिया जाय। आदिवासियों को भूमि के साथ-साथ वित्तीय सहयोग दिया जाय तथा इसे जमीनी स्तर पर लागू भी किया जाय। इतना ही नहीं आदिवासियों के कस्टमरी लॉ का सम्मान करें तथा उनकी भाषा पर पाठ्य-पुस्तकें तैयार हों।
सांप्रदायिकता के विशेषज्ञ प्रो. असगर अली इंजीनियर ने कहा कि प्रकृति आदिवासियों पर मेहरबान है पर वेस्टर्न इंटरेस्ट उनसे छीनना चाहती है। जब से भूमंडलीकरण का दौर शुरू हुआ छीना-झपटी ज्यादा तेज हुई है, जाहिर है कि प्रतिरोध होगा। आदिवासियों की लड़ाई पहले जमींदारों से थी पर आज मल्टीनेशनल्स से है। दंतेवाड़ा में पुलिस आदिवासियों को सुनियोजित तरीके से मार रही है, ट्राइबल्स की बेटियों के साथ पुलिस कर्मी बलात्कार कर रहे हैं, क्या उन आदिवासियों का खून नहीं खौलेगा? बिनायक सेन के मामले में कोर्ट द्वारा जमानत न दिए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो ईमानदार जज होगा वह वेस्टर्न इंटरेस्ट को सपोर्ट नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जब किसी भी व्यक्ति का सबकुछ जाता दिखाई देता है तो नौजवान गुस्से में आकर सोचता है कि सिवाय हिंसा के कोई रास्ता नहीं है। ट्राइबल्स को मुख्य धारा में लाने के लिए सिविल सोसायटी को जागरूक करना होगा तभी वे सरकार पर ज्यादा दवाब बना सकेंगे।
लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक गिरीश मिश्र ने मीडिया को लोकतंत्र का सेफ्टीवॉल्व बताते हुए कहा कि आज अगर मीडिया थोडी़ भी कमजोर पड़ जाए तो स्थितियां और भी बद्तर हो जाएंगी। समकालीन दौर में ट्राइबल्स की जो समस्याएं हैं इसके लिए सिविल सोसायटी, सारी राजनीतिक पार्टियां और हमारे समाज का जो जागरूक तबका है, सभी जिम्मेदार हैं क्योंकि घटनाएं घट रहीं है, फिर भी ट्राइबल्स के सवाल पर सभी खामोश हैं। राजनीतिक पार्टियां नहीं चाहती हैं कि शोषण का दुश्चक्र कमजोर पड़े।
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि 15 राज्यों में ट्राइबल्स के बीच से कोई नेतृत्व उभरता हुआ नहीं दिख रहा है। उन्होंने सबसे खतरनाक राज्य आतंकवाद को बताते हुए कहा कि गांधी जी ने आंदोलन को नए तेवर में लोगों के बीच में सच्चाई को रखा। आज आंदोलन का स्वरूप जनतांत्रिक हो जिसका चरित्र गैर-राजनीतिक हो तथा जो डेमोक्रटिक सोसायटी, पावर के खिलाफ हैं, उन्हें इस यज्ञ में शामिल किया जाय।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के लिए यहां के मूल निवासी आदिवासियों को जंगल से विस्थापित किया जा रहा है। राजनीतिक पार्टियां नहीं चाहती हैं कि राज्य की निरंकुशता में किसी भी प्रकार की बाधा पहुंचे। ट्राइबल्स की मूल समस्याओं पर उन्होंने लोहिया के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि मारेंगे नही, तो मानेंगे भी नहीं, इस तर्ज पर हमें हिंसा नहीं अपितु अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी होगी। किसी भी प्रकार के हिंसा को नकारते हुए उन्होंने कहा कि बंदूक के बल से राज्य पर कब्जा प्राप्त कर गरीबी, असमानता के सवाल को हल नहीं किया जा सकता है बल्कि मजबूत सिविल सोसायटी के रूप में प्रतिरोध शांतिपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए।
संचालन साहित्य विद्यापीठ के प्रो. केके सिंह ने किया। इस अवसर पर प्रो. रामदयाल मुण्डा, राधा भट्ट, जनमोर्चा के संपादक शीतला सिंह, प्रो. एचएम सक्सेना, डॉ. वासंती रमन सहित देशभर से आए विद्वान, विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. केजी खामरे व शैक्षणिक कर्मी व शोधार्थी विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। प्रेस रिलीज











