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हिंदुस्‍तान, कानुपर में पत्रकारों का टोटा, साप्‍ताहिक अवकाश बंद

हिंदुस्‍तान, कानपुर की हालत इन दिनों ठीक नहीं चल रही है. अंदरखाने से मिल रही सूचनाओं पर भरोसा किया जाए तो संस्‍थान पत्रकारों की कमी से जूझ रहा है. पिछले तीन महीने में दर्जनों लोग संस्‍थान छोड़कर दूसरे संस्‍थानों में चले गया या इस्‍तीफा देकर खाली बैठे हैं. खबर है कि इन सब मामलों को लेकर प्रबंधन ने कानपुर से जुड़े पन्‍द्रह जिलों के ब्‍यूरोचीफों की मीटिंग बुलाई थी, जिसमें तमाम मुद्दों पर चर्चा की गई.

हिंदुस्‍तान, कानपुर की हालत इन दिनों ठीक नहीं चल रही है. अंदरखाने से मिल रही सूचनाओं पर भरोसा किया जाए तो संस्‍थान पत्रकारों की कमी से जूझ रहा है. पिछले तीन महीने में दर्जनों लोग संस्‍थान छोड़कर दूसरे संस्‍थानों में चले गया या इस्‍तीफा देकर खाली बैठे हैं. खबर है कि इन सब मामलों को लेकर प्रबंधन ने कानपुर से जुड़े पन्‍द्रह जिलों के ब्‍यूरोचीफों की मीटिंग बुलाई थी, जिसमें तमाम मुद्दों पर चर्चा की गई.

हिंदुस्‍तान से पिछले तीन महीने के अंदर राजीव द्विवेदी, योगेश त्रिपाठी, अशोक निगम, सुभाष त्रिपाठी, चेतन गुप्‍ता, दिव्‍यानी त्रिपाटी, अचलेन्‍द्र कटियार, श्‍वेता अग्निहोत्री, आशीष, पीयूष तिवारी, उमेश त्रिपाठी, मोहम्‍मद आरिफ और अम्‍बर समेत कई लोग जा चुके हैं. आने वालों की रफ्तार काफी धीमी है. यानी इन गए लोगों के खाली स्‍थानों की भरपाई प्रबंधन अब तक नहीं कर सका है. जो काम कर रहे हैं उनपर जबरर्दस्‍त दबाव बना हुआ है.

अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अब तो काम का प्रेशर इतना है कि सभी लोगों का साप्‍ताहिक अवकाश भी बंद कर दिया गया है. एक-एक आदमी के जिम्‍मे जरूरत से ज्‍यादा काम है. किसी तरह संपादकीयकर्मी अपने काम को निपटा रहे हैं. अधिक काम का ही परिणाम बताया जा रहा है‍ कि हिंदुस्‍तान, कानपुर में वर्तनी और ऐसी ही छोटी-मोटी गल्तियां ज्‍यादा देखने को मिल रही हैं. कहा जा रहा है कि जितने लोग भी गए हैं उनमें ज्‍यादातर संपादक के रवैये से परेशान होकर गए हैं और जो हैं वो भी परेशान हैं तथा नए आसरे ढूंढ रहे हैं.

पिछले दिनों कानपुर यूनिट को तमाम तरह की मशीनों दिक्‍कतों का सामना करना पड़ा था. जिसके बारे में कहा जा रहा था कि कर्मचारी जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं, वो यहां अपने वरिष्‍ठों के व्‍यवहार से परेशान हैं लिहाजा वो इस तरह से परेशान करने पर उतारू हैं. अब सच्‍चाई चाहे जो हो पर भीतरखाने में यहां की स्थिति बहुत ठीक नहीं बताई जा रही है. सूत्रों का कहना है कि अब कानपुर में स्थिति ठीक करने के लिए दूसरे जिलों के ठीक-ठाक लोगों को बुलाए जाने की चर्चा भी होने लगी है. यानी दूसरे जिलों में जो रिपोर्टर या डेस्‍क पर काम करने वाला बंदा ठीक है उसे कानपुर लाया जा सकता है.

माना जा रहा है कि इन्‍हीं सभी संदर्भों में इस यूनिट से जुड़े पन्‍द्रह जिलों के ब्‍यूरोचीफों की मीटिंग बुलाई गई थी. अब हिंदुस्‍तान के कर्मचारी और परेशान हैं, नए एग्रीमेंट को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं. सूत्रों ने ये भी बताया कि हिंदुस्‍तान के सीनियर लोगों ने कानपुर के दूसरे अखबारों के लोगों को अपने यहां लाने का प्रयास किया लेकिन वहां की स्थितियों के बारे में देख-सुनकर कोई आने को तैयार नहीं है.

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0 Comments

  1. कुमार सौवीर, महुआ न्‍यूज, लखनऊ

    April 16, 2011 at 3:56 pm

    लतखोर पत्रकारिता की यह जीती जागती मिसाल हैा
    अरे, विश्‍वेश्‍वर कुमार जैसे हत्‍यारे, अराजक और चापलूसी पंसद व्‍यक्ति के साथ कदमताल करने के पहले पत्रकारों को क्‍या यह नहीं समझ लेना चाहिए कि इस आदमी का अतीत क्‍या हैा कानपुर अमर उजाला में अपनी तैनाती के दौरान के उसके साथी बताते हैं कि यह आदमीनुमा कायर व्‍यक्ति दिन में पचासों बार अपनी नौकरी को लेकर आशंकित रहता था।
    हिन्‍दुस्‍तान वाराणसी में इसके कार्यकाल के दौरान दो लोगों को अपनी जान देकर इसके अत्‍याचार की वेदी पर चढना पडा।
    एक थीं विनय पुरी पाण्‍डेय और दूसरे थे सुशील त्रिपाठी। अपने फन में माहिर थे यह दोनों, लेकिन इसके और इसके चिंटू-पिंटुओं की करतूतों ने उन्‍हें मौत के घाट उतरने पर बाध्‍य कर दिया। कितनी छीछालेदर वहां इसकी हुई, कोई वाराणसी से पूछ तो ले। एक निहायत बेहतरीन कामकाज के माहौल वाले वहां के दफ्तर को इसी ने दोजख में तब्‍दील कर दिया था। अपने एक साल के कार्यकाल में उसने वाराणसी में मकान कैसे खरीद लिया, यह तो अलग जांच का मुद्दा है।
    कानपुर से कान पकडकर निकाल बाहर किये जाने के बाद बाकायदा गिडगिडाते हुए इसने नोएडा दैनिक जागरण में चपरासी जैसी नौकरी करने से भी परहेज नहीं किया। एक बार तो जब मैं वहां पहुंचा तो इस डरपोक शख्‍स ने पूरे पौने दो घण्‍टे तक बंद खिडकी की ओर ही नजर लगाये रखी। वजह था मैं, जिसका सामना तक करने का साहस इसमें नहीं है।
    जो शख्‍स केवल चरण-चांपने तक उतर कर चापलूसी के चलते ही नौकरी कर रहा हो, उससे चापलूसी से इतर कैसे देखा जा सकता है।
    वैसे एक बात बताऊं बिसेसर कुमार तुमको, अब ज्‍यादा दिन तुम्‍हारे भी नहीं बचे हैं। अपनी गति को जल्‍दी ही प्राप्‍त करोगे तुम।
    आमीन।
    कुमार सौवीर, महुआ न्‍यूज, लखनऊ

  2. subhas chandra etawah

    April 17, 2011 at 10:05 am

    kanpur mai hindustan ka bantadhar hone wal hai
    ………………………

  3. subhas chandra etawah

    April 17, 2011 at 10:10 am

    hindusatan kanpur kuch bhai theek nahi hai; prabhndahn koi faisla na liya to aage bhagawan malik hai….

  4. pandit

    April 18, 2011 at 9:41 pm

    khas bat to y hai ki kanpur hindustan mai kam km rajneet jyada ho rahi hai. ye sari rajneet ka kandra NE anshuma tiwari ke jariya ho rahi hai. vase ansuman ne banars aur lucknow mai bhi yahe kam kiya tha. kam ke mamle mai inki tareef kahi nahi hoti agar hoti hai bhi to kanafusi mai. inka kam hai kis akbar mai kay chal raha hai.har kise sai hai sawal ki kaya naya taja hai. rahi bat RE ki to yo sashi aur naveen ki tanatani mai mauj mar raha hai. ka kae kitne jankar hai ya to kuamr sauveer bata hi cukai hai. jyada kuch kahane ki jaroorat nahi hai. naveen agar ap jald nahi jage to kanpur ka kya hal hoga ya to ham bhi nahi bata sakte. cr report kud hi dak le.

  5. saurabh pandey

    April 21, 2011 at 11:05 pm

    सौवीर भाई कानपुर हिन्दुस्तान में तो राम मिलाई जोड़ी एक अंधा एक कोढी जैसी दशा है। विश्वेशर जी के बारे में तो आपने जो कहा वह अक्षरशः सत्य है। उनके जो नायब अंशुमान हैं उनके तो कहने ही क्या। तेल के खेल के उस्ताद ये सज्जन काम तो करते नहीं जिसमें पारंगत हैं वहीं उनके साथ हो तो बेहद खुश। बात-बात में अपने से वर्षों जूनियर साथियों को अपनी वरिष्ठता (काम नहीं अंतराल) की दुहाई देते हैं। जब से आये अखबार की लुटिया डुबाने में लगे हैं। वनारस में तो विश्वेशर की लुटाई डुबोई ही थी, कानपुर में भी वही करने वाले हैं। आजकल इन सज्जन को इनके ही पिता जी मिल गये जिनका अंशुमान की तरह ही परिवार कानपुर में है नहीं सो दिन भर आफिस में ही प्रपंच में लगे रहते ज्ञानी इतने कि ओसामा के नाती कितने हैं और मिलेगा कहां ये भी बता देंगे। सोने में सुहागा ये कि सज्जन आजकल विश्वेशर के भी सलाहकार हैं। ज्ञानी सलाहकारों के होते हुए भी अखबार शहर में दूसरे नंबर के अखबार के आधे से भी कम पर पहुंच गया। विश्वेश्वर जी…. भस्मासुरों को पहचानों वक्त है अभी वरना एक एक कर सब निकल लेंगे और फिर आपको जलालत झेल कर जाना होगा। और बार-बार कोई दरियादिल प्रतापगढ़िया सम्पादक नहीं मिलेगा जो चपराई की गति से उबार कर सिंहासन दिला दे। हालांकि वह भी अब पछता रहे होंगे। काश उनका साक्षात्कार सौवीर जी से हो गया होता।

  6. गुमनाम

    April 26, 2011 at 7:36 am

    विश्‍वेश्‍वर जी तुम घुमा के लाठी के देते हो और दर्द भी नहीं देते हो, शशी जी आप ही कुछ करो

  7. एक पूर्व सहारा कर्मी

    May 7, 2011 at 9:45 am

    सौवीर राजा
    बउड़ाए हो का। जीते जी किसी को जहन्नुम में ठेल रहे हो। अबे जीये दो विशेसरा को भी। मर जावेगा तो कौना से लड़ोंगे। विजय विनीत हंस रहे हैं कि सौवीरवा कइसे बउड़ा गया है।

  8. gaurav shukla

    July 30, 2011 at 6:33 am

    🙂 sampadak ji aap ab to kuch karo varna bache-khuche log bhi chale jaienge.

  9. Atul Kushwah

    September 1, 2011 at 2:35 pm

    Chintajanak sthiti ko sambhalo sampadak ji…

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