मैं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में हूँ, स्वाधीनता के पूर्व इसका नाम आईपी (इंडियन पुलिस) था. यह हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में जो पुलिस व्यवस्था है, उसमे सर्वोच्च पद आईपीएस अधिकारियों को जाता है. यह भी एक सच्चाई है कि आईएएस के बाद जिस सेवा को सरकार और समाज में सर्वाधिक महत्व दिया जाता है वह आईपीएस है. जिस परिवार का कोई एक लड़का आईपीएस में चयनित हो जाता है वह अपने आप को अत्यंत भाग्यशाली परिवार समझता है और इस एक बात से ही उसकी सामाजिक हैसियत में कुछ वृद्धि सी हो जाती है.
पर यह भी बड़ा ही रोचक है कि इसी आईपी/ आईपीएस की सेवा में एक ही परीक्षा पास कर के, एक ही एकेडमी में आ कर, एक ही प्रारंभिक पथ से गुजरते हुए हर व्यक्ति के जीवन की दिशा इतनी अलग-अलग हो जाती है, जिसकी आदमी उस समय कल्पना भी नहीं कर सकता था जब वह इस सेवा में शामिल हो रहा था.
इसी बात को ध्यान में रखते हुए मेरे मन में यह ख्याल आया कि मैं ऐसे ही तीस आईपीएस अधिकारियों का चयन करके उनका संक्षिप्त जीवन वृत्त प्रस्तुत करूँ जिन्होंने एक ही प्रारंभिक अवस्था से गुजरते हुए आगे अपने जीवन को बिलकुल ही अलग परिदृश्यों और स्थितियों में पाया. मैंने इस हेतु जो तीस नाम चयन किये हैं यदि उनमें आईपीएस के नामचीन अधिकारी, पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक केपीएस गिल हैं, जो पंजाब के आतंकवाद का सम्पूर्ण नाश करने के जिमेदार माने जाते हैं तो यूपी कैडर के पूर्व एडीजी सीडी कैंथ भी हैं, जिन्हें बरेली में एक पुलिस इन्स्पेक्टर केके गौतम द्वारा रिश्वत मांगने के आरोप में उसी थाने में मुलजिम बनाया गया, जिस थाने के वे उस समय आईजी थे और जिन्हें जीवन के तमाम झंझावातों को झेलते हुए अंत में आत्महत्या तक करने को मजबूर होना पड़ा.
अपनी नौकरी के प्रारम्भ से ही पूरे देश के लिए प्रतिरूप और मिसाल का काम कर रहीं किरण बेदी को देखें, जो आज रिटायर होने के बाद भी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों की रीढ़ बनी हुई हैं तो उसी सेवा में मधुकर टंडन भी रहे हैं, जो एक गरीब नौकरानी के बलात्कार जैसे जघन्य और घृणित अपराध के ना सिर्फ मुलजिम हैं बल्कि एक लंबे समय से भगोड़े और एक लाख के ईनामिया हैं. जी हाँ, एक आईपीएस अधिकारी जिसने अपनी सेवा के दौरान ना जाने कितने अपराधियों पर ईनाम घोषित किये होंगे, आज स्वयं ही फरार हैं और उनको ज़िंदा या मुर्दा पुलिस के सामने पेश करने वाले को एक लाख रुपये दिए जाने की घोषणा उसी पुलिस विभाग ने कर रखी है, जिसके वे चुनिन्दा सदस्य थे.
यदि पुलिस विभाग में मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और पंजाब के पूर्व डीजीपी जूलियो रिबेरो हैं, जिन पर सारा मुंबई गर्व करता है और जिन की आवाज़ की बुलंदियां आज भी महाराष्ट्र के शासन और प्रशासन को हिला कर रख देती है तो उसी पुलिस विभाग में उसी पद पर हरियाणा में एसपीएस राठौड भी रहे हैं, जिन्हें यदि आज कोई याद करता है तो मात्र रुचिका गिरोत्रा नामक पन्द्रह साल की एक अबोध बच्ची के साथ कथित छेड़खानी और उसे आत्महत्या के लिए बाध्य कर देने के आरोपों और अपनी उस मुस्कराहट के लिए जिसने पूरे देश के लोगों के हृदय पर ऐसा जख्म लगाया कि सब एक साथ कराह से गए.
कोई शायद ही विश्वास करे कि आज एक आईपीएस अधिकारी को लोग आईपीएस के रूप में नहीं, साईं बाबा के सच्चे शिष्य और उनके संभावित अवतार के रूप में जानते हैं और गुरूजी के नाम से विख्यात सीबी सत्पथी आज दिल्ली से ले कर देश-विदेश में लाखों-करोड़ों लोगों को जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्यों और जीवन की सूक्ष्म परिभाषाओं से रूबरू कराते हैं. इससे थोड़े अलग अभयानंद हैं जो हैं तो आईपीएस में पर इनको देशव्यापी ख्याति मिली है एक शिक्षक के रूप में. जी हाँ, आईआईटी जेईई जैसे अत्यंत कठिन परीक्षा के लिए आनंद कुमार के साथ मिल कर पटना में उनके द्वारा शुरू किया गया सुपर थर्टी आज एक ऐसा ब्रांड बन गया है जिसकी धूम हर जगह है.
ये कुछ ऐसी बानगियाँ है उस सेवा की, जिससे एक ही दरवाजे से निकल कर ना जाने कितने ही रास्ते और कितनी ही गालियाँ निकल पड़ीं, जिन्हें स्वयं उस रास्ते का राही भी अपनी यात्रा के प्रारम्भ में नहीं जान रहा होगा.
इन तीस आईपीएस अधिकारियों के परिचयस्वरुप यह पुस्तक मैं लिख रहा हूँ. मेरी पुस्तक में कोई नए रहस्योद्घाटन नहीं होंगे और ना ही इन तीसों अधिकारियों के जीवन का कोई गहन और विषद विश्लेषण होगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तीस लोगों के जीवन को उनकी समग्रता और उनकी सत्यता में प्रस्तुत कर सकना अत्यंत दुष्कर कार्य है. इसके विपरीत पुस्तक मूलतया में पाठकों को ऐसे तीस लोगों से परिचित कराते हुए उनके वैसे स्वरूपों और कार्यों को सामने रखने का प्रयास होगा, जिसने उन्हें एक अलग किस्म की पहचान दी- चाहे वह पहचान अच्छे में हो या बुरे में.
इस पुस्तक में माध्यम से जो मूल बात मैं सामने रखना चाहता हूँ वह यह कि व्यक्ति के प्रारब्ध और उसके भाग्य का उसके कर्मों से कोई बहुत सीधा रिश्ता हो यह आवश्यक नहीं. कई बार यह देखा गया कि एक आदमी जीवन भर किसी दूसरी जगह पर रहा पर जब उसके कुछ खास करने का समय आया तो नियति उसे कहीं और ही खींच कर ले गयी. आप जानते होंगे कि केपीएस गिल पंजाब नहीं असम-मेघालय कैडर के थे और आचार्य किशोर कुणाल थे गुजरात कैडर के पर उन्हें बुलंदियां मिलीं अपने गृह प्रदेश बिहार आ कर जहां अब वे धार्मिक और सामाजिक जगत में एक प्रतिमान के तौर पर स्थापित हो चुके हैं.
इन तीस जीवनों के जरिये ना सिर्फ ‘कलर्स ऑफ खाकी’ (खाकी के रंग) दिखाने का प्रयास होगा बल्कि जीवन के भी अलग-अलग आयामों को प्रदर्शित करने की कोशिश होगी.
लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.












devesh singh
April 18, 2011 at 3:25 pm
sir very nice step
Abhishek sharma
April 18, 2011 at 3:34 pm
achchha hoga ki ateet ke logo per garv karne se behtar hai un bhrasht IPS per kitab likhen jo thane, kotwali,chauki,aur circle bhench rahe hai. aur un achchhe IPS ko bhi jagah de jinko janta sir ankhon per rakhti hai, aur wo satta ke netao ke taluwe na chatte ho.aisee books likhe to pehla reader mai banna pasand karunga.
Abhishek sharma
http://www.exultvision.blogspot.com
syed husain akhtar
April 18, 2011 at 4:30 pm
Bhai saheb un tees me khud ko bhi zaroor shamil kariyega kyonki aap bhi traditional IPS se hat kar hi hain.
Indian citizen
April 18, 2011 at 4:46 pm
बहुत अच्छा काम करने जा रहे हैं, शुभकामनायें..
brajesh kumar
April 18, 2011 at 5:25 pm
All the best! Amitabh ji
अखिलेश कृष्ण मोहन
April 18, 2011 at 6:42 pm
अमिताभ जी आप बातें तो बहुत सदाचार की करते हैं, पिछले कुछ दिनों से बड़ी साफ- सफाई के प्रशासन का उलाहना देते देखे जा रहे हैं , लेकिन क्या आप को याद है कि बस्ती जिले का एसपी जब आप थे तो किस तरह खुलेआम गुंडई के बल पर एक दबंग नेता की मां को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने के लिये सारे नियम कानून ताक पर रखदिये थे । अमित जी याद रखिये बस्ती में अमिताभ ठाकुर के एसपी रहते जो प्रशासनिक नकारापन दिखा था वह हमने कभी भी नहीं देखा । यहां तक कि आपने तो अख़बार और टीवी चैनलों को भी कवरेज नहीं करने दिया था । बस्ती का पूरा नगर क्षेत्र से लेकर बस्ती मुख्यालय तक छावनी बना था । आप अपने आप को पाक साफ न समझे बस अंतर इतना ही है कि आप बच निकले । इतनी बड़ी घटना के बाद भी अख़बार में अगले दिन कोई ख़बर ही नहीं थी । मैं आप की बातों को तहेदिल से स्वीकार करता हूं लेकिन आप के समय में देखा वो मंजर कभी भी नहीं भूल सकता जो एक एसपी कर रहा था । >:(>
brijesh
April 18, 2011 at 6:53 pm
amitabh ji . aap book likhiye hame intzar rahega. lakin ek bat jaroor kahuga ki aap suidha shulk (ghoos) per bhi focus kijiyega . suna hai har PS se maheena bana hota hai
brijesh singh
April 18, 2011 at 7:01 pm
अमिताब जी एक बात जरूर कहूँगा की आप गूस्खोरी के बारे में भी लिखना . सुना है की हर थाने से महीना जाता है
संजय कुमार सिंह
April 18, 2011 at 7:12 pm
अच्छा आईडिया है। नाम भी अच्छा सोचा है – कलर्स ऑफ खाकी। बीच में आईपीएस की नौकरी छोड़ कर किसी और क्षेत्र में सफलता पाने वाले किसी आईपीएस को भी शामिल कर सकें तो अच्छा रहेगा। भिन्न आरोपों से घिरे लोगों के बारे में अपनी जानकारी के अनुसार लिखने के बाद संबंधित लोगों का पक्ष भी लिया जाए तो पठनीयता बढ़ जाएगी। उदाहरण के लिए, यह जानने की इच्छा तो है ही राठौड़ साब अपनी सफाई में क्या कहते हैं।
anuj kumar agarwal
April 19, 2011 at 1:52 am
AMITABH JI,
KRIPYA IMANDAR IPS KO HI SAMIL KAREY BHARSTACHARI NAHI TAKI 12-22 AGE GROUP KEY CHILD KUCH PRERNA PA SAKEY.
PUSTAK KI KIMAT NOMINAL HO TAKI HAR KOI CHILD POCKET MONEY SEY KHARID SAKEY.
REGARDS
“AAPKA”
ANUJ KUMAR AGARWAL
CHAIRMAN
“BEEMA GHAR”
MOB 9412334700
[email protected]
Harishankar Shahi
April 19, 2011 at 3:24 am
भाई साहब आपके विचार काफी जबरदस्त होते हैं. यह अच्छा है आप लिखिए कम से कम कई चीज़े लोगो के सामने आएँगी जिसे लोग जानते ही नहीं है. हमे तो इसका इन्तेज़ार रहेगा.
BRAJ BHOOSHAN TIWARI
April 19, 2011 at 5:52 am
To know this my curiosity is so high, I can’t wait…., But have to ……, Sir, Please print an extra copy for me .
Thanks & Regards
Braj Bhooshan Tiwari
9450701949
कुमार सौवीर, महुआ न्यूज, लखनऊ
April 19, 2011 at 6:27 am
जिया राजा जिया।
लेकिन एक बात जरूर लिखना भइये। केपीएस गिल के बारे में।
कहीं ऐसा ना हो कि रूप्पन देवल बजाज की घटना छूट जाए, जिसके चलते बजाज का पूरा परिवार तबाह हो गया। अपनी मां के साथ हुई हरकत के चलते उसका बेटा लफंगा और अपराधी बन गया।
यशपाल सिंह को क्यों छोडा जाए जिसपर सन 82 में केपी सिंह नाम के एक डिप्टी एसपी की हत्या का आरोप लगा था और किसी तरह वह पूरा प्रकरण इतना मैनेज कर लिया गया कि यशपाल सिंह प्रदेश के पुलिस प्रमुख तक की कुर्सी पर सुशोभित हो गये।
लिखा तो उन आईपीएस अफसरों की साजिश के चलते हत्यारे बने दरोगाओं पर भी जाना चाहिए जो फर्जी मुठभेड में शोहरत हासिल कर चुके हैं।
और उन चापलूसों का भी जिक्र जरूर कीजिएगा जो मायावती के पैर चांपते हैं, पुलिस की टोपी लगाकर पैर छूते हैं या जन्मदिन पर उन्हें अपने हाथों से केक खिलाते हैं।
अमिताभ जैसे एक जिन्दादिल और निहायत बेहतरीन शख्स से तो इससे भी ज्यादा की उम्मीद अगर हमें है तो इसमें गलत क्या है। क्यों।
कुमार सौवीर, महुआ न्यूज, लखनऊ
DivyaShukla
April 19, 2011 at 3:12 pm
आप बहुत अच्छा काम करने जा रहे है शुभकामनायें
कैंथ जी काफी डिप्रेशन में थे तत्कालीन उच्च अफसरों द्वारा की जा रही उनके खिलाफ राजनीत के कारण शायेद इसी तनाव के चलते अकाल मृत्यु को उन्होंने चुना और उनके बेटे भी जहां तक सुना है हत्या का शिकार हुए बहुत दुखद रहा सेना में रह चुके इस अफसर के साथ ….
DivyaShukla
April 19, 2011 at 3:20 pm
अमिताभ जी आपको बधाई आप बहुत अच्छा काम कर रहे है ,सी .डी .कैंथ के बारे में आप लिखेंगे अच्छा लगा जान कर सेना में काम कर चुके वह अपने ही विभाग के उच्च अधिकारीयों की राजनीत का शिकार होकर डिप्रेशन में चले गये और आत्महत्या कर ली ..उनके दो पुत्र भी हत्या का शिकार हुए शायेद बड़ा दुखद रहा सेना रह चुके इस अफसर के साथ
Abhinav
April 20, 2011 at 9:51 am
Dear Mr.Amitabh,
Nice to know that you are wriitng book on Policewalas who have brought a difference in the society.I would be waiting for the book to get published.
Please try to bring out note on blacksheeps of police soceity and camparison of both so that it justifies that number of Policewala doing good work is more than those who have corrupted the system.This will help people’s to have faith in police which is very less at present.One more suggestion,please consider good Policewala of not only IPS cadre but of junior cadre also.I have frequently used the word POLICEWALA and want to see it most respected word in future.
regrads,
Abhinav
MANISH KUMAR PANDEY
April 29, 2011 at 4:15 am
अखिलेश जी और कुमार सौवीर जी के तर्कों को देकते हुए भाई मै तो कुछ कहने की स्थिति में नहीं, हूँ फिर भी अमिताभ जी बेस्ट ऑफ़ लक, पर ध्यान दीजियेगा आप की इस
किताब की वजह से कही महकमे में आपके दुश्मनी बड़ न जाये