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नए भगवानों के खिलाफ नास्तिक होने का दंभ भरे भी तो कौन?

पंकज शुक्‍ल : एक था फिल्‍म समीक्षक : जब से मैंने नियमित और साप्ताहिक फिल्म समीक्षा लिखने का अपना शगल छोड़ा है, मुझे किसी भी फिल्म के पहले दिन का पहला शो देखने की कसक कम ही उठती है। एक वक्त था जबकि तकरीबन एक दशक तक शुक्रवार की दोपहर या फिर उससे पहले दिन यानी गुरुवार की शाम फिल्म के नाम हुआ करती थी। ये सिलसिला बरसों बरस, महीनों दर महीने, हफ्ते दर हफ्ते यूं ही चलता रहा।

पंकज शुक्‍ल : एक था फिल्‍म समीक्षक : जब से मैंने नियमित और साप्ताहिक फिल्म समीक्षा लिखने का अपना शगल छोड़ा है, मुझे किसी भी फिल्म के पहले दिन का पहला शो देखने की कसक कम ही उठती है। एक वक्त था जबकि तकरीबन एक दशक तक शुक्रवार की दोपहर या फिर उससे पहले दिन यानी गुरुवार की शाम फिल्म के नाम हुआ करती थी। ये सिलसिला बरसों बरस, महीनों दर महीने, हफ्ते दर हफ्ते यूं ही चलता रहा।

ना कभी बरसात इसमें बाधा बन पाई, ना आंधी और ना ही जून की तपती दोपहरें। नई फिल्म का शो मायने मेरा वहां मौजूद होना जरूरी था। तब ये फिल्में देखते वक्त कभी कभी पूरा वक्त हंसते-हंसाते निकल जाता, कभी ऐसा भी होता कि बजाय गुदगुदाने के फिल्म दिमाग के किसी कोने को झकझोर कर निकल जाती और कभी तो फिल्म खत्म होने के बाद लगता कि कहीं अकेले में जाकर बुक्का फाड़कर रोया जाए। लेकिन, किसी फिल्म को देखने के बाद ऐसा बिरले ही होता था कि जिंदगी के दो से ज्यादा बेशकीमती घंटे बर्बाद होने का ग़म मनाया जाए। तब तो फ्लॉप फिल्में भी ऐसी होती थीं कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ उनमें ऐसा होता था कि दर्शक हॉल में आने के बाद उसमें बंधे रहते थे। इनमें से अब भी तमाम फिल्में टेलीविजन पर आती हैं, तो अपने समय की कामयाब फिल्में बताई जाती हैं और आज की पीढ़ी ये बात मान भी लेती है।

लेकिन, अब ज़माना बदल रहा है। ज़मान अब बेईमानों की जय जयकार का है। एक ऐसा जमाना जिसमें कलम को बाजार के हाथ गिरवी रख देने के लिए देश के तमाम बड़े अखबारों में पूरी एक फौज तैयार हो रही है। ये गिरोह है मैनेजमेंट के उन उस्तादों का, जिनके लिए अखबार सिर्फ एक उत्पाद है और जिसे बाजार में बेचकर उन्हें अपने मार्केंटिंग और सेल्स ग्राफ को ऊपर जाते देखना है,  क्योंकि ऐसा होगा तभी लोकल ट्रेन में चलने वाले पत्रकार की खबरों से बिकने वाले अखबारों के ये नए मेन इन ब्लैक महंगी चमचमाती गाड़ियों में सफर कर पाएंगे। इनमें से कुछ को हिंदी सिनेमा का खून स्वाद लग चुका है। फिल्म प्रोड्यूसर की जेब से आखिरी चवन्नी भी निकलवाने की कोशिश में इन्होंने एक ऐसे पेशे को बदनाम कर दिया है, जिसकी धार से कल तक बड़े से बड़ा फिल्म निर्माता कांपता था। फिल्म पत्रकारिता अब एक विधा नहीं, अखबार का सजावटी सामान बन चुकी है।

पिछले साल ही दिल्ली में अपने एक अभिन्न मित्र और उत्तर भारत के सबसे बड़े फिल्म वितरकों से एक के दफ्तर में बैठे हुए मुझे पहली बार अपने से जुड़े रहे जुमले फिल्म समीक्षक को लेकर न सिर्फ शर्मिंदा होना पड़ा बल्कि यूं कहें कि अगर चुल्लू भर पानी होता, तो उसमें डूब मरना उससे ज्यादा बेहतर होता। मेरे मित्र का कहना था कि मैंने नियमित फिल्म समीक्षा कॉलम लिखना बंद कर अपना बड़ा नुकसान किया है और वो भी ऐसे वक्त में जब फिल्म समीक्षकों के घर फिल्म रिलीज से पहले कभी प्लाज्मा टीवी पहुंचता है, कभी डबल डोर रेफ्रिजरेटर तो कभी विदेश भ्रमण के टिकट, साथ में यजमान सुधी हुआ तो दक्षिणा अलग से। मेरी हालत कुछ कुछ वैसी ही थी कि जैसे किसी अजनबी जगह पर घूमते हुए दस बारह गुंडे आकर आपकी महिला दोस्त को छेड़ें और आप चाहकर भी कुछ न कर सकें।

मुझे पता नहीं मेरे काबिल मित्र, जिनके पास फिल्म उद्योग की सारी अच्छी बुरी खबरें रहती हैं, की ये बात कितनी सच्ची थी। लेकिन अगर उनकी बात झूठी थी तो फिर क्यों किसी एक फिल्म को आजकल एक समीक्षक महज एक स्टार देता है तो कोई दूसरा समीक्षक चार या कभी कभी पांच स्टार तक की रेटिंग देता है। और अगले दिन उसकी ये रेटिंग तमाम बड़े विज्ञापनों में उसके नाम के साथ चस्पा होती है। पहले तो मुझे लगा करता था कि शायद कुछ समीक्षक अपना नाम फिल्म के विज्ञापन या डीवीडी पर अमर हो जाने की चाह में ऐसा कर गुजरते होंगे।

लेकिन, हकीकत ज्यों ज्यों करीब आईं, इन आंखों पर तरस आता गया। ज्यादा दिन नहीं हुए जब मेरे एक फिल्म निर्माता मित्र ने फिल्म समीक्षा के इस गोरखधंधे पर मुझसे एक फिल्म लिखने की गुजारिश की थी। मैंने तब उनको सलाह दी थी कि अगर वह वाकई इस धंधे में बने रहना चाहते हैं तो उनका इस तरह की कहानी पर फिल्म बनाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से कम नहीं होगा। गनीमत है कि उन्होंने मेरी बात समझी और मुझे भी उस ‘पाप’ से बचने का मौका मिल गया जो मुझे ये फिल्म लिखते वक्त अपनी ही बिरादरी के कपड़े उतारकर करना पड़ता। लेकिन, अब मुझे लगता है कि पानी सिर के ऊपर से नहीं बल्कि उसके और बहुत ऊपर से बहने लगा है। और, यही वो वक्त है जब किसी को तो खड़े होकर कहना होगा, बस।

हाल के दिनों में अगर किसी फिल्म समीक्षक के कॉलम का मुझे बेसब्री से इंतजार हुआ करता था तो वो हैं मिंटी तेजपाल का मुंबई मिरर में छपने वाला कॉलम। लेकिन, अब वह भी बंद हो गया। बहुत संभव है कि मिंटी को अपने दिल की बात सुनने की कीमत चुकानी पड़ी हो। उसका नाम अब अब फिल्म समीक्षा के कॉलम से गायब हो चुका है। अब तक जो भी बातें आप पढ़ चुके हैं, ये सारी बातें मेरे दिमाग में तब से घुमड़ रही हैं, जब मैं फिल्म 3 थे भाई देखकर सिनेमाहॉल से बाहर निकला। फिल्म देखने से पहले तक इसके निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा की एक अलग ही छवि मेरे दिमाग में बनी हुई थी। ये छवि फिल्म रंग दे बसंती के निर्देशक की छवि से अलग थी और एक ऐसे निर्माता की थी जिसने हाल ही में एक इंटरव्यू में बड़ी साफगोई से ये बात कही कि हिंदी सिनेमा के निर्माताओं को कहानी की समझ नहीं है।

जाहिर है ये बात उन्होंने फिल्म निर्माण के मद्देनजर ही की और उनके मुताबिक इसीलिए उन्हें फिल्म 3 थे भाई का निर्माण करना पड़ा। सुर्खियों की तलाश में रहने वाले खबरनवीसों को ऐसे ही उद्धरणों की तो तलाश रहती है, फिल्म रिलीज होने से पहले मेहरा अखबारों में अपने इन्हीं तरह के बयानों को लेकर छाए रहे, हो सकता है ये सबक उन्होंने अपने पुराने हीरो आमिर खान से सीखा हो, लेकिन आमिर को भी अब भेड़िया आया वाली कहानी का अंदाजा कुछ कुछ हो चला है। अक्षय कुमार तो अब तक सिंह इज़ किंग में किए पाप का प्रायश्चित फ्लॉप दर फ्लॉप फिल्में देकर चुकाते चले जा रहे हैं, जबकि इन तमाम फ्लॉप फिल्मों से कुछ वाकई अच्छी बनी थीं, लेकिन दर्शकों को धोखा देकर आप एक फिल्म में कमाई कर सकते हैं, बार-बार नहीं।

वो जमाना गया जब फिल्म की समीक्षा करना एक विधा हुआ करती थी। तब नई पीढ़ी के लोग फिल्म समालोचना पाठ्यक्रमों के लिए कतारें लगाया करते थे, अब तो कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा फिल्म समीक्षक बन जाता है। जिनको पता नहीं कि कहानी के अवयव क्या होते हैं, बिंब क्या होते हैं, रूपक क्या होते हैं और तो और पटकथा के जरूरी तत्व क्या होते हैं, वे ही फिल्म के प्रेस शोज के दौरान सबसे ज्यादा फिल्म निर्माण की विधा पर बहस करते सुनाई पड़ते हैं। जिनको कजरी, दादरा और ठुमरी का फर्क नहीं मालूम वो एक निहायत घटिया से तथाकथित आइटम सॉन्ग की राष्ट्रगान की तरह तारीफ करते सुनाई दते हैं। ये वो लोग हैं जो रावण जैसी फिल्म को फिल्म का पहला शो खत्म होने से पहले ही सुपरहिट करार दे देते हैं। इसमें दो राय नहीं है कि देश में अब ईमानदार फिल्म समीक्षक अंगुलियों पर गिने जा सकने लायक हैं। ये वो लोग हैं जिन पर सितारों के आभामंडल का अब भी असर नहीं होता, जो मुफ्त की चीजों के लिए लार नहीं टपकाते और जो दो सौ रुपये की फिल्म टिकट मुफ्त में मिल जाने पर अपनी रीढ़ दोहरी नहीं कर लेते हैं, लेकिन ऐसे लोगों का लिखा छापने वाले अब अखबार ही कितने हैं? और, सवाल फिर आ कर वहीं अटक जाता है कि सिनेमा के नए भगवानों के खिलाफ नास्तिक होने का दंभ भरे भी तो कौन?

लेखक पंकज शुक्‍ल वरिष्‍ठ पत्रकार और फिल्‍ममेकर हैं, उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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