नए भगवानों के खिलाफ नास्तिक होने का दंभ भरे भी तो कौन?

पंकज शुक्‍ल : एक था फिल्‍म समीक्षक : जब से मैंने नियमित और साप्ताहिक फिल्म समीक्षा लिखने का अपना शगल छोड़ा है, मुझे किसी भी फिल्म के पहले दिन का पहला शो देखने की कसक कम ही उठती है। एक वक्त था जबकि तकरीबन एक दशक तक शुक्रवार की दोपहर या फिर उससे पहले दिन यानी गुरुवार की शाम फिल्म के नाम हुआ करती थी। ये सिलसिला बरसों बरस, महीनों दर महीने, हफ्ते दर हफ्ते यूं ही चलता रहा।

पंकज शुक्ला से परेशान पंकज शुक्ला ने फेसबुक पर दुखड़ा रोया

जी. हेडिंग लगाने में कोई गड़बड़ नहीं हुई है. गड़बड़ी का कारण बना है नाम. पंकज शुक्ला दो लोगों के नाम हैं, दोनों लोग मीडिया में हैं, जर्नलिस्ट हैं. दोनों का बरेली से रिश्ता है. दोनों की उम्र लगभग एक है. दोनों ही पंकज शुक्ला प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के अच्छे जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एक प्रिंट में हैं तो दूसरे टीवी में. दोनों मीडिया में नौकरी छोड़ते पकड़ते रहते हैं. इस कारण जब कोई अज्ञानी पत्रकार सुनता है कि पंकज शुक्ला ने फलां जगह ज्वाइन कर लिया तो वो अपने परिचित पंकज शुक्ला को फोन मिला देता है और पता चलता है कि वो ये वाले पंकज शुक्ला नहीं हैं.

सुमंत मिश्र और पंकज शुक्ला की नई पारी

सुमंत ने नई दुनिया छोड़ा, अमर उजाला लौटे : पंकज ने नई दुनिया में रीजनल एडिटर के पद पर ज्वाइन किया : मुंबई से दो बड़ी खबरें हैं. अभी तक नईदुनिया ग्रुप से जुड़े रहे सुमंत मिश्र ने इस्तीफा दे दिया है. वे फिर अमर उजाला लौट आए हैं. वे अमर उजाला छोड़कर ही नई दुनिया गए थे. अमर उजाला में सुमंत की वापसी एसोसिएट एडिटर के पद पर हुई है. सुमंत इसी पद पर नई दुनिया में भी कार्य कर रहे थे.

जहां रेडलाइट एरिया, वहां रेप नहीं!

[caption id="attachment_17117" align="alignleft" width="71"]पंकजपंकज[/caption]“….क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़ती” को जब शुरू-शुरू में पढ़ा तो लगा, एक पत्रकार को अपने संस्मरण सहेजने की सहसा ही इच्छा जाग उठी है। आगे पढ़ता गया तो लगा- नहीं, ये सामान्य संस्मरण नहीं है। ये कड़ियां समाज के उस तबके की वेदना और सहनशीलता की परछाई हैं, जिनकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता।

पंकज की दो फिल्में एनआरआई फिल्म फेस्टिवल में

अजीजन मस्तानीपत्रकार से फिल्ममेकर बने पंकज शुक्ल की दो शॉर्ट फिल्में जनवरी में दिल्ली में होने जा रहे प्रवासी फिल्म समारोह यानी एनआरआई फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन के लिए चयनित हुई हैं। इन फिल्मों के नाम हैं ‘अज़ीजन मस्तानी’ और ‘बहुरुपिया’। कुशाग्र क्रिएशंस के बैनर तले बनी इन फिल्मों के निर्माता शरद मिश्र हैं और इनकी परिकल्पना भी इन्हीं की। पंकज के अलावा मीरा नायर और निर्देशकद्वय राज निदिमोरु-कृष्णा डीके की भी दो-दो फिल्में इस समारोह में शामिल की गई हैं।

रहिमन निज मन की व्यथा…

पंकजकल से आज तक छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र तक से ना जाने कितने फोन आए, सिर्फ इस बात की बधाई देने के लिए कि मैंने अपने ब्लॉग पर अपने मन की बात कही। दरअसल, ब्लॉग की मूल अवधारणा भी यही है कि जो बात इंसान किसी से ना कह पाए, वो अपने ब्लॉग पर लिखकर मन को हल्का कर ले। वैसे तो रहीम बाबा बहुत पहले कह गए हैं कि “रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि इठिलइहैं लोग, सब बांटि ना लैहै कोय।” लेकिन पीर जब शूल बनकर भीतर चुभने लगती है तो लोग लेखनी का सहारा लेते हैं। रायपुर से आने के कोई 15 दिन बाद यानी 18 जून को मैंने वो ब्लॉग लिखा था, लेकिन वो था महज दिल हल्का करने के लिए।  भड़ास4मीडिया पर इसे भले अब उठाया गया हो, लेकिन इसकी सामयिकता अब भी बनी हुई है। हां, ये और बात है कि बी4एम की हेडलाइन से ऐसा लगता है कि जैसे सारे सेठों के सुपुत्र गण भ्रष्टाचार और अनाचार को बढ़ावा देने वाले हों। ऐसा कतई नहीं है, मुझे तो अमर उजाला अखबार के दूसरी पीढ़ी के मालिकों के बेटे आज भी याद हैं, जो संपादकों के पैर सबके सामने छुआ करते थे और व्यक्तिगत मुलाकातों में आज भी छूते हैं। ये संस्कार ही है जो बड़े बिजनेस घरानों के बेटों को दौलत के साथ साथ विरासत में मिलते हैं। हिंदी फिल्मों के प्रोड्यूसर वाशू भगनानी की असल कमाई रीयल इस्टेट से होती है।

‘सेठ के लौंडे की ना सुनी तो खैर नाईं’

[caption id="attachment_15184" align="alignleft"]पंकज शुक्लपंकज शुक्ल[/caption]पंकज शुक्ल उन्नाव के गांव से निकलकर दिल्ली-मुंबई सब हो आए। अखबार से लेकर टीवी-फिल्म सब सीख-साख आए। इस ज्ञान को औरों के साथ भी बांट-बढ़ा आए। लेकिन कुछ है जो सीख नहीं पाए। खुद के शब्दों में- ”दिक्कत ये है ससुरी कि हमने अच्छी अच्छी चीज़ें लगता है कुछ ज्यादा ही पढ़ ली हैं।” पंकज ने हाल-फिलहाल दो धोखे, या यूं कहें, झटके झेले हैं। ये झटके अपनों ने दिए। भरोसा करने लायक ‘बेटालाल’ लोगों ने दिए। एक धोखा मुंबई के फिल्मी ‘बेटालाल’ ने दिया है तो दूसरा रायपुर में टीवी वाले ‘बेटालाल’ ने। पंकज ठहरे कर्मठ और क्रिएटिव आदमी। झूठ का भार बहुत देर तक बर्दाश्त कहां होता। मन की पीड़ा को शब्दों के जरिए अपने ब्लाग पर उतारकर दिल हल्का कर लिया। पर उन लाखों-करोड़ों गांव वाले युवाओं का क्या होगा जो हर रोज दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में छले जाते हैं! ये बेचारे तो अपनी बात भी कहीं कह नहीं पाते। ये तो टूटे हुए सपनों और रोती हुई आत्मा के साथ जिंदगी की जंग को  ‘बेटालालों’ के चंगुल तले अनाम सिपाही की तरह लड़ते रहते हैं।

जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ : पंकज गए, अभय आए

पंकज शुक्लाजी ग्रुप के फ्रेंचाइजी रीजनल न्यूज चैनल ‘जी 24 घंटे छत्तीसगढ़’ में फिर बड़ा उलटफेर हो गया है। एक एडिटर का इस्तीफा हो गया, एक एडिटर का अप्वायंटमेंट हुआ। फ्रेंचाइजी लेने वाली कंपनी एसबी मल्टीमीडिया की तरफ से मैनेजिंग एडिटर के रूप में काम देख रहे पंकज शुक्ला अब यहां से विदा हो चुके हैं। ऐसा जी ग्रुप के इस निर्णय के बाद हुआ है कि आगे से फ्रेंचाइजी कंपनी की तरफ से कोई एडिटर नहीं रखा जाएगा। जो भी एडिटर होगा, वो जी ग्रुप की तरफ से भेजा जाएगा। मतलब, दो-दो एडिटर रखने की परंपरा खत्म कर दी गई और इस नई नीति के भेंट चढ़ गए पंकज।

फिल्मी कहानी पर कम से कम तीन लाख मिलेंगे !

हिंदुस्तान में किसी फिल्म की कहानी लिखने के लिए लेखक को कितना पैसा मिल सकता है? नामी लेखकों की बात छोड़ दें तो शायद ही कोई लेखक इसके लिए लाखों मिलने की बात सपने में भी सोच सकता होगा। लेकिन फिल्म राइटर्स एसोसिएशन, मुंबई की चली तो आने वाले दिनों में किसी भी लेखक को फिल्म की कहानी लिखने के लिए कम से कम तीन लाख रुपये मिलेंगे और अगर वही लेखक फिल्म की पटकथा और संवाद भी लिखना चाहे तो उसे छह लाख रुपये और मिलेंगे। जी हां, मुंबई में दो दिन तक चली दूसरी इंडियन स्क्रीनराइटर्स कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से इस बारे में प्रस्ताव पारित किया गया। यही नहीं, मुंबई के नामी वकीलों की सहायता से फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ने लेखकों का शोषण रोकने के लिए एक मॉडल कॉन्ट्रैक्ट भी तैयार किया है।

उस दिन मैं बाथरूम में जाकर खूब रोया

Pankaj Shuklaसपने देखने वाले उसे किस तरह यथार्थ में बदल देते हैं, पंकज शुक्ल भी इसके उदाहरण हैं। एक सामान्य देहाती और हिंदी वाला नौजवान बिना गॉडफादर के, उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए एक दिन मंजिल के करीब पहुंच जाता है, पंकज का जीवन इसका प्रतीक है। अखबार, टीवी के बाद अब फिल्म क्षेत्र में पंकज ने अपने काम से नाम कमाया है। ‘भोले शंकर’ बनाकर पंकज ने वर्षों के अपने सपने को पूरा किया। पिछले दिनों दिल्ली आए पंकज ने भड़ास4मीडिया के एडीटर यशवंत सिंह से खुलकर बातचीत की।