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संत हुए मिलेनियर, बैरागी कौन?

: धर्म या कारोबार, असली गुरु तलाशना बड़ी चुनौती : वे कहने को संत हैं। गेरुआ पहनते हैं, पर संसार से विरक्त नहीं हैं। एसी कमरों में सोते हैं। हेलिकॉप्टर से उड़ते हैं। लक्जरी गाड़ियों में सफ़र करते हैं। माली हालत के हिसाब से खासे अमीर हैं। अरबपति, खरबपति हैं। दर्जन भर बैंकों में इनके सेविंग्स, रेकरिंग एकाउंट हैं। ये भाषण देते हैं, उसे प्रवचन का नाम देते हैं और इस `स्टैंडअप हीलिंग’ के उनके वीडियो और टेप बिकते हैं।

: धर्म या कारोबार, असली गुरु तलाशना बड़ी चुनौती : वे कहने को संत हैं। गेरुआ पहनते हैं, पर संसार से विरक्त नहीं हैं। एसी कमरों में सोते हैं। हेलिकॉप्टर से उड़ते हैं। लक्जरी गाड़ियों में सफ़र करते हैं। माली हालत के हिसाब से खासे अमीर हैं। अरबपति, खरबपति हैं। दर्जन भर बैंकों में इनके सेविंग्स, रेकरिंग एकाउंट हैं। ये भाषण देते हैं, उसे प्रवचन का नाम देते हैं और इस `स्टैंडअप हीलिंग’ के उनके वीडियो और टेप बिकते हैं।

बड़े-बड़े उत्पाद ही नहीं, इन मठों से कलम, कॉपी, अंगूठी, गले की चेन-लॉकेट, की-रिंग तक का कारोबार होता है (यानी खर्च अठन्नी और आमदनी चार रुपया साथ में प्रचार भी)। अखबारों, पत्रिकाओं और टेलिविजन चैनलों के ये मालिक हैं। सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी और स्कूल चलाते हैं। गरचे, कोई ऐसा काम नहीं, जो ये ना करते हों, फिर भी विरक्त कहलाते हैं। वीतरागी, बैरागी, संन्यासी जैसे तमगे इन पर टंके हुए हैं। इनके या फिर समर्थकों के फेसबुक, ट्विटर, लिंकेडिन और ऑरकुट पर एकाउंट हैं। ये हैं संत द मिलेनियर। संन्यास लेने के लिए इन्हें जंगल नहीं चाहिए, मल्टीस्टोरी आश्रमों में इनकी सर्वसुविधा संपन्न `कुटिया’ होती है और हाल-ख़बर लेने को हज़ार की तादाद में शिष्य। इनके कामकाज पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनती हैं। ये वो संत हैं, जो क्राइम करने से भी बाज नहीं आते। पकड़े जाते हैं, तो `देख लेंगे’ की धमकियां भी इनके खेमों से आती हैं।

इनको मिलने वाले दान का कोई हिसाब किताब नहीं होता। ये इन्कम टैक्स नहीं चुकाते। (हालांकि छोटे-मोटे अधिकारी कभी-कभार कहते रहते हैं–बाबाजी, दया करो। टैक्स जमा कर दो। अहमदाबाद नगर निगम ने आध्यात्मिक गुरु आसाराम बापू के आश्रम पर बाकायदा एक नोटिस चस्पा कर 3.5 लाख रुपए संपत्ति कर चुकाने को कहा था…। शहर के किन्नरों ने बापू का पुतला भी जलाया था, ये एक अलग खबर है)। इन संतों के धनस्रोत को लेकर कोई सीबीआई जांच नहीं होती। सितारों से लेकर राजनेता तक इनकी क़दमबोसी करते हैं। जब-तब ये नामधारी संत चादरें, धोतियां, कंबल और साड़ियां लुटाते हैं, तब भुखमरी से जूझ रहे लोग टूट पड़ते हैं। कई बार भगदड़ों में हुई मौतों की ख़बर तो आपने भी सुनी ही होगी। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ स्थित कृपालु महाराज आश्रम में हुई भगदड़ और इसमें हुई मौतों की घटना अभी पुरानी नहीं हुई है।

यूं, सब संत ऐसे ही हों, ऐसा भी नहीं है, लेकिन आप जानकर चौंक जाएंगे, आजकल संतई बड़ा कारोबार है। जिसने संसार का मोह छोड़ देने का अभिनय किया, उसके पास सारी सांसारिक सुख-सुविधाएं पहुंच गईं। अपराधिक और राजनीतिक उपलब्धियों के लिए गेरुआ को गर्क करने वाले इन तथाकथित संतों की बात छोड़ भी दें, तो आसाराम बापू, सुधांशु महाराज, बाबा रामदेव जैसे कई प्रतिष्ठित और बहु-प्रिय संत-महात्माओं की संपत्ति भी अरबों रुपए की है।

बहुत पहले बिनोबा भावे लिखित एक बोधकथा सुनी थी, जिसमें याज्ञवलक्य ऋषि ने आत्मचिंतन के लिए घर छोड़ते समय पत्नी मैत्रेयी से कहा–मैं जा रहा हूं। जाने से पहले अपनी संपत्ति दोनों पत्नियों में बांटना चाहता हूं। मैत्रेयी ने पैसे स्वीकारने की जगह शंका प्रकट की थी कि पैसे से अमृत-जीवन मिल जाएगा? याज्ञवल्कय का जवाब था–अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन–वित्त से अमृतत्व की आशा करना बेकार है।

… पर अब वैसे बाबा कहां हैं? हों भी तो दिखते नहीं। जो कुछ खास लोगों को दिखते हैं, उन्हें इतनी भीड़ घेरे रहती है कि आम आदमी उनके आसपास फटकना तो दूर, एक झलक देख भी नहीं पाता।

कभी हरिद्वार के कुंभ मेले में जाइए। देखेंगे कि वहां तरह-तरह के बाबाओं का बाज़ार लगा है। श्रद्धालुओं और सहज भावुक लोगों को पटाने-भरमाने-ललचाने के लिए ऐसे बाबा बाकायदा भाषणों की स्क्रिप्टिंग कराते हैं और ऐसे कास्ट्यूम पहनते हैं, जिससे प्रभामंडल कुछ ज्यादा ही आकर्षक लगे।

खुद को हज़ार साल की आयु वाला घोषित करने वाले बाबा तो ख़ैर सैकड़ों मिल जाएंगे, लेकिन स्वयं ईश्वर या ईश्वर का अवतार बताने वाले संतों की संख्या भी अपने देश में कम नहीं है।

अफ़सोस, इन पर धन लुटाने वालों की कोई कमी नहीं है। ऐसा करने वाले भुला देते हैं कि भारत में शहरी गरीब इंसान 29 रुपए में हर दिन ज़िंदगी बिताता है और गांव का गरीब महज चौदह रुपए में चौबीस घंटे तक सांसों की डोर थामे रहता है। इसी नंगी-भूखी-व्याकुल जनता और तरह-तरह के प्रपंच करके मोटाए हुए साहूकारों को साधने की कला जानते हैं संत। इमोशंस भुनाने वालों में प्रपंची और ढोंगी बाबा खासे सक्रिय रहते हैं। हालांकि ऐसे संत, जिनका उद्देश्य सचमुच अच्छा है, वह भी संतई को कारोबार से जोड़ने में गुरेज़ नहीं करते।

कहते हैं, संसार त्यागने वाला संत है, जो `सीकरी’ को धूल समझे, वह वैरागी है, लेकिन आजकल तो साधु-संत-महात्मा और बाबा वह है, जो महल खड़े करे।

साधु-संतों में भी उसकी जय-जयकार कुछ ज्यादा ही होती है, जो चमत्कार दिखाने में पारंगत हो। खैर, ये कोई नहीं बात नहीं। आइए देखते हैं, कैसे-कैसे और कितनी किस्म के कारोबार करते हैं आजकल के संत!

हाल में पुट्टपर्ती के सत्य साईं बाबा नहीं रहे। अब उनके उत्तराधिकार को लेकर जंग छिड़ी है। पता चला है कि संपत्ति को लेकर सत्य साईं के भाई-बहन और भतीजे में आपस में विवाद है। निश्चित तौर पर संन्य़ास पथ पर चलने की होड़ नहीं मची। बाबा की संपत्ति 40 हजार करोड़ से ज्यादा की बताई जा रही है। अब हज़ारों करोड़ की संस्था का वारिस बनाम मालिक कौन हो, सारी खींचतान इसको ही लेकर हो रही है।

2007 में तहलका पत्रिका ने खुलासा किया था कि बाबा रामदेव की सालाना आमदनी ही चार सौ करोड़ रुपए से ज्यादा है। ध्यान दें, ये आंकड़ा सात साल पुराना है। बाबा एक पॉलिटिकल पार्टी बना चुके हैं। कई आश्रम, अस्पताल और संस्थानों का संचालन करते हैं। जानकार बताते हैं कि उनके दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट में दानदाताओं की लंबी कतार लगी रहती है।

तहलका के 24 जून, 2007 के आंकड़ों पर भरोसा करें, तो पता चलता है कि श्रीश्री रविशंकर (400 करोड़), आसाराम बापू (350 करोड़), माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा’ (400 करोड़), सुधांशु महाराज (300 करोड़), मुरारी बापू (150 करोड़) की सालाना आमदनी इतनी है, जितने में हज़ारों परिवारों की ज़िंदगी को कई-कई साल तक दो वक्त की रोटी मयस्सर हो सकती है।

बड़े बाबाओं की तो बात ही क्या…धर्म की चाबी घुमाकर बड़ी तिज़ोरियां खोल लेने का हुनर खूब चमका है। हाई प्रोफाइल ‘सेक्स रैकेट’ संचालक शिवा उर्फ इच्छाधारी संत भीमानंद को ही लीजिए। कुछ साल पहले तक उत्तर प्रदेश के चित्रकूट इलाके में चमरौंहा गांव में उसके नाम महज डेढ़ बीघे ज़मीन थी। उसने आस्था और देह का ऐसा गंठजोड़ कायम किया कि कुछ ही साल में बैंक खाते में करोड़ रुपए की रकम जमा हो गई।

ये सच है कि धर्म को कॉरपोरेट फर्म बनाकर मठों-बाबाओं की ओर से की जा रही `उगाही’ पर सरकार को रोक लगानी ही पड़ेगी। ऐसा नहीं हुआ, तो आस्था की अफ़ीम जानलेवा ही साबित होती रहेगी।

चर्चित लेखक गौरव सोलंकी सवाल करते हैं–मैं एक आह भरता हूं/ तो मेरी माँ रात भर सो नहीं पाती / उसके करोड़ों बच्चे / हर रात भूखे सोते हैं / तुम्हारा भगवान / क्या नींद की गोलियाँ लेता है?

गौरव की इस कविता के हवाले से एक सवाल करने का मेरा भी मन है–जिस भगवान का नाम लेकर दंगे किए जाते हैं, खून के रिश्तों के बंटवारे होते हैं, जो भगवान ढोंगियों के लिए रिजर्व बैंक के खजाने की चाबी बनता जा रहा है, क्यों ना उसे हम अपनी आस्था के घर से बेदखल कर दें? और अगर ऐसे ईश्वर को हमारी आस्था में बने रहना है, तो सबसे पहले उसे अपने नाम का कारोबार करने वाले संतों की पोल-पट्टी खोलनी होगी। भगवन! आपके भक्त संत कवि कुम्भन दास ने तो कह दिया था–संत को कहां सीकरी सूं काम? लेकिन ये कैसे संत हैं, जिनके गले के नीचे से तब तक निवाला नहीं सरकता, जब तक कि मेज पर चांदी की कटोरी ना हो?

धार्मिक नहीं, व्यावसायिक संगठन

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने एक शोध में ये साबित किया है कि भारत में धार्मिक संगठन व्यावसायिक संगठनों की तरह काम करते हैं और लोगों की निष्ठा बनाए रखने की खातिर अपने क्रियाकलाप में लगातार बदलाव भी लाते हैं। भारतीय मूल की शिक्षाविद् श्रेया अय्यर की अगुवाई में किए गए नतीजों का ब्योरा रिसर्च होराइजंस पत्रिका में प्रकाशित भी किया गया था। कैंब्रिज ने ये शोध महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात के धार्मिक संगठनों पर किया।

अर्थशास्त्र विभाग के एक दल ने दो साल तक भारत के 568 धार्मिक संगठनों पर स्टडी की। निष्कर्ष ये निकला कि जिस तरह बाज़ार में कारोबारी अपने प्रतिद्वंद्वियों को हर चाल में मात देने की कोशिश करते हैं, ठीक उसी तरह धार्मिक संगठन भी माहौल में बदलाव लाते हैं।

क्राइम का प्रवचन, गोली का भजन

संतों-महात्माओं-बाबाओं में ज्ञान और योग के ज़रिए करोड़ों कमाने वाले तो हैं ही, ऐसे भी कम नहीं, जो पहनते गेरुआ हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर गोली चलाने से भी बाज नहीं आते। राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ भीमानंद लड़कियों की सप्लाई करने के लिए पकड़ा गया। इन बाबाजी ने अपने सारे खर्चे और आमदनी का पक्का ब्योरा रखा था। इनकी एक डायरी से तो यहां तक पता चला कि भीमानंद जी कंडोम पर होने वाले खर्च तक का हिसाब लिख रखा था। उत्तर प्रदेश में ऐसे दर्जनों संत-महात्मा हैं, जिनके पास अपने शूटर हैं और पॉलिटिकल संरक्षण तो इन्हें माफिया की तरह ही मिलता है। ज्यादा दिन नहीं हुए, जब हरिद्वार में कुंभपर्व पर साधुओं के गुटों में संघर्ष हो चुका है।

रजतपट पर ढोंगी बाबा

कुछ साल पहले प्रकाश मेहरा की एक फ़िल्म आई थी `जादूगर’। इसमें अपराधी और तिकड़मी अमरीश पुरी पाखंड के सहारे अकूत संपत्ति अर्जित करता है और फिर बाद में गोगा जादूगर बने अमिताभ बच्चन उसका पर्दाफ़ाश करते हैं। यूं, ये फ़िल्म भी बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं हुई। वज़ह साफ है–धर्म का विरोध कौन करे, भले ही उसके पीछे कुछ भी गड़बड़झाला अंजाम दिया जा रहा हो।

लेखक चण्डीदत्त शुक्ल स्वाभिमान टाइम्स में समाचार संपादक हैं और इन दिनों चौराहा नामक पोर्टल का संचालन कर रहे हैं.

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0 Comments

  1. Dr. A.K. Sharma

    May 2, 2011 at 2:18 pm

    shukla Ji ! Kucch likhne ko nahi mila to Hindu Santo par hi keechad uchhalne lage. Sach janne ke liye Tehaka.com nahi, in santo ke ashramo mein jao. Ankhen fati rah jayegi. Kabhi kuch achha bhi dekhne ki kosish kiya karo.

  2. प्रशान्त

    May 2, 2011 at 4:59 pm

    एक बार आप भी अपना कर देखो आनन्द आ जायेगा…

  3. jagdish

    May 3, 2011 at 7:17 am

    dr. saheb, jara aap bataiye in kathit santon ke paas achchha kya hai. hame to paakhand, jhuthe dhong ke alaawa kuchh bhi achchha dikhai nahin deta. shukla ji ko paakhandiyon ki pol kholne ke liye badhai.dhanyawaad.

  4. मयंक

    May 3, 2011 at 8:24 am

    आदरणीय डॉ. ए. के. शर्मा साहब,
    आत्मवत् सर्वभूतेषु यः सः पण्डितः….के साथ प्रारम्भ करते हुए….क्या आप नहीं मानते कि सुधार की शुरुआत अपने घर से ही होनी चाहिए और इसलिए अपने धर्म या समाज के दोष देखना नितांत आवश्यक है…क्या आप सुधार की शर्त ये मानते हैं कि पहले दूसरे धर्मों के लोग सुधरें तब आप सुधरेंगे…विकास में आगे जाने के लिए सुधार और जागरुकता में भी आगे रहना होगा…खैर मैं धारिमिक नहीं सो ये बातें अलग….ये बताएं कि क्या कहीं भी पूरे लेख में ये लिखा है कि ये सब केवल हिंदू तथाकथित संतों के लिए लिखा गया है…मुझे लगता है कि ये लेख हर वक्त…समाज…और देश में लागू होता है….आप नाम के आगे डॉ. लगाते हैं….अंग्रेज़ी का शब्द है…ब्रिटिशों की देन…क्यों लगाते हैं….मैं इस पर आपत्ति कर दूं तो क्या आप हटाएंगे…आप मुझे संकीर्ण और पिछड़ा कहेंगे….धार्मिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठिए…क्या आप नहीं मानते कि ज़्यादातर बाबा पाखंडी हैं…क्या दिक्कत है सच को मान लेने में….

  5. Dr. A.K. Sharma

    May 3, 2011 at 2:47 pm

    Dear Jgdish & Mayank don’t be excited. If you personally know about so called ChandDutt Shukla {writer} of this blog, you really condem his view. One fact you should always remember that if Shukla ji is really warrior of truth, he write beyond what is available in various sites. Also he is failed to show any proof against the saints whose names are mentioned here. If he had proofs then he should go to Police & Court. I will appreciate his (ShuklaJi’s) works.

  6. Dr. A.K. Sharma

    May 3, 2011 at 2:49 pm

    Dear Mayank, if you don’t like “Dr.” , so now I am just A. K. Sharma for you. Now happy…..Ok. Thanks for your valuable suggestion.

  7. jai bihar

    May 4, 2011 at 7:57 am

    Join hands with us in ‘The Bharat Swabhiman Movement’!

    India has witnessed many historic, social and freedom movements and today for a truly developed India ‘Bharat Swabhiman’ is the need of the time!

    ‘BHARAT SWABHIMAN’ is a social and spiritual movement initiated by the ‘Patanjali Yogpeeth’ under the guidance of Acharya Shree Ramdev ji aimed at making India the supreme power by diminishing all its prevailing social, political and economic curses.

    The 3 main objectives of ‘The Bharat Swabhiman Movement’ are:-

    1. To bring about a complete change, in national interest, in all the wrong policies and corrupt systems prevalent at present.

    2. Complete eradication of corruption, and to bring back to India about 300 lakh crores of rupees swindled through corrupt practices which is currently deposited in commercial banks outside the country, to declare it as national property, and to invest it in national reconstruction and development.

    3. To build up a healthy, prosperous, culturally refined and powerful India free from poverty, unemployment, hunger, want and illiteracy, and to install India as a great world power.

    JOIN HANDS TO MAKE INDIA BETTER.
    – PROMOTE IT TO THE EXTENT POSSIBLE!!

    JAI BHARAT!

  8. Mahender Chawla

    May 14, 2011 at 12:37 pm

    Shukla Ji you are right…………..

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