हाय, वो चला गया, जो दिल के इतने करीब था…

[caption id="attachment_20727" align="alignleft" width="85"]चण्‍डीदत्‍तचंडीदत्‍त[/caption]बेदम, निचुड़ी-सूखी धरती ने इधर-उधर छिटके पानी से अपने पपड़ाए होंठ गीले करने की नाकाम कोशिश के बाद हाथ जोड़कर सूरज से कहा–क़हर बरपाना छोड़ो, फिर बादलों से गुहार की–निष्ठुर, कितना इंतज़ार करूं! उलाहना जैसे दिल में तीर की तरह लगा और सब के सब काले बादल जल बन धरती की ओर भाग निकले। देखते ही देखते जलधारा ने धरती का आलिंगन कर लिया। दोनों की प्यास बुझ चुकी थी।

पत्रकार चण्डीदत्त शुक्ल को राजीव गांधी एक्सिलेंस अवार्ड

दैनिक भास्कर की मैगज़ीन डिवीज़न के फीचर एडिटर और चौराहा.इन के संपादक चण्डीदत्त शुक्ल को दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने राजीव गांधी एक्सिलेंस अवार्ड-2011से सम्मानित किया। इस अवसर पर सांसद अन्नू टंडन भी मौजूद रहीं। कार्यक्रम का आयोजन रामप्रकाश वर्मा के संपादन में प्रकाशित पत्रिका व समाचार पत्र सीमापुरी टाइम्स की ओर से किया गया था।

संत हुए मिलेनियर, बैरागी कौन?

: धर्म या कारोबार, असली गुरु तलाशना बड़ी चुनौती : वे कहने को संत हैं। गेरुआ पहनते हैं, पर संसार से विरक्त नहीं हैं। एसी कमरों में सोते हैं। हेलिकॉप्टर से उड़ते हैं। लक्जरी गाड़ियों में सफ़र करते हैं। माली हालत के हिसाब से खासे अमीर हैं। अरबपति, खरबपति हैं। दर्जन भर बैंकों में इनके सेविंग्स, रेकरिंग एकाउंट हैं। ये भाषण देते हैं, उसे प्रवचन का नाम देते हैं और इस `स्टैंडअप हीलिंग’ के उनके वीडियो और टेप बिकते हैं।

विचार उगलने के लिए अब ऑन लाइन ‘चौराहा’

: साइबर पत्रकारिता में चंडीदत्‍त शुक्‍ल की दस्‍तक : एक और पत्रकार न्यू मीडिया के मैदान में आ गए हैं। नाम है चण्डीदत्त शुक्ल। अमर उजाला, दैनिक जागरण, फोकस टीवी में तरह-तरह के पदों पर, किस्म-किस्म का काम करने के अलावा, चण्डीदत्त फ़िल्म, टेलिविजन, रेडियो, साइबर माध्यमों में सक्रिय रहे हैं और देश की तकरीबन सभी प्रमुख पत्रिकाओं और अखबारों में छपते रहे हैं। अब वह साइबर पत्रकारिता में जोश-ओ-ख़रोश के साथ दस्तक दे रहे हैं पोर्टल www.chauraha.in के ज़रिए।

ट्विंकल है उदास…छोड़ गए अंकल पै

[caption id="attachment_19689" align="alignleft" width="94"]अनंत पैअनंत पै[/caption]: श्रद्धांजलि : किस्से-कहानियां सुनाने वाली दादी अब साथ नहीं रहती…घर छोटे हैं…बिल्डिंगें बड़ी हैं…दादी का जी शहर में नहीं लगता…वैसे भी, कार्टून और एनिमेशन का ज़माना है, वो भी डिज़्नी वाले कार्टून्स का। पिछले दिनों `माई फ्रेंड गणेशा’ और `हनुमान’ जैसे कैरेक्टर ज़रूर देखे थे, लेकिन ऐसा कम ही होता है। बहुतायत में तो अब भी अंग्रेज हावी हैं, पैंट के ऊपर चड्ढी पहनने वाले हीरो!

कथा में नई दृष्टि और भाषा गढ़ती हैं रीता सिन्हा

: चर्चा में ‘डेस्‍कटॉप’ : फिर सुनें स्त्री-मन और जीवन की कहानियां : चूल्हे पर रखी पतीली में धीरे-धीरे गर्म होता और फिर उफनकर गिर जाता दूध देखा है कभी? ऐसा ही तो है स्त्री-मन। संवेदनाओं की गर्माहट कितनी देर में और किस कदर कटाक्ष-उपेक्षा की तपन-जलन में तब्दील हो जाएगी, पहले से इसका अंदाज़ा लगाना संभव होता, तो स्त्री-पुरुष संबंधों में आई तल्खी यूं, ऐसे ना होती, ना समाज का मौजूदा अविश्वसनीय रूप बन पाता। सच तो ये है कि स्त्री के चित्त-चाह-आह और नाराज़गी को शब्द कम ही मिले हैं। ज्यादातर समय अहसास या तो चूल्हे से उठते धुएं में गुम हो गए हैं या फिर दौड़ में शामिल होने के लिए लगाई जा रही चटख लिपिस्टिक के रंगों में लिपट बदरंग होते रहते हैं। समझदारी और समझ के बीच की तहें खोलने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जद्दोज़हद में स्त्री कभी भरती है, तो कई बार पूरी तरह खाली हो जाती है।

संयोग-वियोग में लिपटे एक प्रेमी के नोट्स

चंडीदत्‍तप्यार ना प्यास है, ना पानी। ना फानी है, ना रूहानी। मिठास है, तो कड़वाहट भी। बेचैनी है तो राहत भी। पहला प्यार अक्सर भोला होता है। भले ही उम्र पंद्रह की हो या फिर पचपन की। कैसे-कैसे अहसास भी तो होते हैं पहले प्यार में। एक प्रेमी के नोट्स पढिए, इस वैधानिक चेतावनी के साथ-इनसे इश्क का इम्तिहान हल नहीं होगा, क्योंकि हर बार नए सवाल पैदा होते हैं-

साइबर वार : ना चलेगी गोली, ना बहेगा खून, फिर भी लड़ेगी दुनिया

अब नाम तो याद नहीं है, शायद शंकर दादा था उस पुरानी फ़िल्म का नाम। इसमें एक गाना है – इशारों को अगर समझो, राज़ को राज़ रहने दो, लेकिन पर्दाफ़ाश करने वालों के हाथ कहीं राज़ की पोटली लग जाए तो उनके पेट में अजब-सी गुदगुदी होने लगती है। यूं तो, ऐसे लोग अक्सर अमानत में खयानत की तर्ज पर ढके-छुपे राज़ की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें सार्वजनिक करके आपके लिए मुश्किलें ही खड़ी करते हैं, हैक्टिविस्ट (हैकर+ एक्टिविस्ट) जूलियन असांजे ने भी कमोबेश अमेरिका के लिए वही किया। बावज़ूद इसके असांजे ऐसे शख्स नहीं, जिन्हें अहसान फ़रामोश कहा जाए। बेशक, ये कहने के पीछे धारणा है कि उन्होंने सच की लड़ाई लड़ी है।

मायावती जी, सुन लीजिए एक मां का दर्द!

स्‍वाभिमान: मिशन-स्वाभिमान : यूपी के एक थाने में 18 घंटे तक बिठाई गईं बेगुनाह महिलाएं : अब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं : नई दिल्‍ली, संवाददाता। देश की राष्ट्रपति, लोक सभाध्यक्ष, केंद्र में सत्तासीन दल की मुखिया, दिल्ली की सीएम और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री…ये सब महिलाएं हैं। ताक़तवर पदों पर आसीन हैं। दावा है—ये दौर महिला सशक्तीकरण का है पर सच क्या है? जानना चाहेंगे, वो दहला देगा।