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राहुल का गाँधीजी से साक्षात्कार

मुकेश कुमारघटना कुछ दिन पहले की है। पंद्रह घंटों तक भट्टा-पारसौल गाँव में धरने पर बैठने और फिर हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गाँधी उत्साह और उत्तेजना से भरे हुए थे। मोटर सायकिल पर सवारी से लेकर अब तक के घटनाक्रम और उसे मीडिया में मिले कवरेज के बाद उन्हें ऐसा लग रहा था कि मानो उन्होंने इतिहास बदल डाला हो और अब पूरा हिंदुस्तान उन्हें महापुरूष मान लेगा।

मुकेश कुमारघटना कुछ दिन पहले की है। पंद्रह घंटों तक भट्टा-पारसौल गाँव में धरने पर बैठने और फिर हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गाँधी उत्साह और उत्तेजना से भरे हुए थे। मोटर सायकिल पर सवारी से लेकर अब तक के घटनाक्रम और उसे मीडिया में मिले कवरेज के बाद उन्हें ऐसा लग रहा था कि मानो उन्होंने इतिहास बदल डाला हो और अब पूरा हिंदुस्तान उन्हें महापुरूष मान लेगा।

आँखों में नींद नहीं थी मगर करवट बदलकर सोने की तैयारी करने लगे। पहली बार उनकी कोमल काया ने इतना कष्ट झेला था, इसलिए उसने उनका साथ दिया और वे नींद की गोद में समा गए। नींद आई तो सपने लेकर आई। उन्होंने पाया कि वे गाँधी बन गए हैं। बदन से कुर्ता-पाएजामा गायब हो गया और उसकी जगह गाँधी स्टाइल की धोती आ गई। आँखों पर चश्मा तो था ही मगर वह भी गाँधीनुमा हो गया। वेशभूषा में परिवर्तन के साथ ही राहुल खुद को गाँधी जैसा महसूस करने लगे और उन्हें लगा कि पूरा देश उनकी तरफ बापू भरी नज़रों से देख रहा है और उन्हें उसे संबोधित करना चाहिए। उनके मुँह से अभी….मेरे देशवासियों….उच्चरित ही हुआ था कि उन्हें एहसास हुआ कि उनके पीछे कोई है।

पलटकर देखा तो चौंक गए…….अरे ये तो अपने गाँधी जी हैं….लगे रहो मुन्ना भाई की तरह वे मुस्करा रहे थे।

अपनी ओर एकटक देख रहे राहुल से उन्होंने पूछा क्या देख रहे हो राहुल..। राहुल बोले-गाँधी बाबा….देख रहा हूँ कि आप यहाँ क्या कैसे। आपको तो वहीं ऊपर आराम करना चाहिए। जवाब में गाँधी मुस्कराए…..आराम तो वहाँ मैं खूब कर रहा हूँ….देख नहीं रहे हो बदन भर गया है…..वहाँ काम-वाम तो कुछ होता नहीं। अनशन, धरना, सत्याग्रह तो खैर दूर की बात है। कई बार सोचा भी कि नरक में लोगों के साथ जो दानवीय अत्याचार होता है उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाऊँ, वहाँ से लेकर देवलोक तक मार्च करूँ, मगर स्वर्गलोक की सुख-सुविधाओं ने आलसी बना दिया है। अब तो सत्य के साथ प्रयोग भी बंद कर दिए हैं और ब्रम्हचर्य वगैरा तो बकवास की चीज़ें लगती हैं।

राहुल को अपने मादक स्वप्न में गाँधी  का इस तरह से प्रवेश पसंद नहीं आ रहा था, लिहाज़ा  उन्होंने उन्हें बीच में  ही टोकते हुए कहा- ये बताइए  कि स्वर्ग की गलियाँ छोड़कर इधर कैसे चले आए……गाँधीजी  के माथे पर सलवटें उभर आईं….उन्होंने कहा-ये ठीक है कि मैं स्वर्ग में रहकर थोड़ा सुविधाभोगी हो गया हूँ मगर देश की चिंता मुझे सताती रहती है और आज भी मैं उसी चिंता से परेशान होकर तुम्हारे पास चला आया हूँ।

राहुल-मगर  चिंता की क्या बात है….देश  में आपकी पार्टी का राज है। मेरी माता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश को तरक्की की राह पर सरपट दौड़ा ही रहे हैं। राहुल की बातें सुनकर गाँधीजी मुस्कराए….उनकी मुस्कराहट में पीड़ा और व्यंग्य दोनों था…..वे राहुल के भोलेपन पर भी हँसना चाहते थे मगर फिर ऐसा नहीं किया और जवाब देना शुरू किया…..देखो राहुल बाबा मेरी चिंता की वजहें तो बहुत सारी हैं मगर मैं तो फिलहाल इस देश के किसानों की दुरावस्था से चिंतित हूँ। वे आगे बोलते इसके पहले ही राहुल बीच में बोल पड़े…..लेकिन आप नाहक ही चिंता कर रहे हैं….किसानों की समस्या को लेकर तो मैने लड़ाई छेड़ ही दी है….मैं पंद्रह घंटे धरने पर बैठा रहा और इससे मायावती की सरकार हिल गई है और अब उसे किसानों के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

राहुल बोल  चुके तो गाँधीजी ने बोलना  शुरू किया-देखो राहुल मैं  तुम्हारे आँदोलन के संदर्भ में ही तुम्हारे पास आया  हूँ। तुम्हारा ये आँदोलन जनता के लिए नहीं सत्ता के लिए  है और इसमें सत्य नहीं पाखंड  भरा हुआ है। राहुल को ये तीखी बातें चुभ गईं….चिढ़कर वह बोले मैं तो आपके नक्शे कदम पर चल रहा हूँ और आप उसे पाखंड बता रहे हैं। मुझे लगता है आपको जलन हो रही है कि कहीं मैं आपसे आगे न निकल जाऊँ… लोग मुझे ही गाँधी न मानने लगें और आपको भूल जाएं, इसीलिए आप ऐसी आधारहीन बातें कह रहे हैं।

गाँधीजी ने गहरी साँस भरी और कहा- राहुल  मैं तुमसे कुछ सवाल पूछूँ  तो जवाब दोगे…..थोड़ी देर  तक सोचने के बाद राहुल  ने धीरे से कहा पूछिए। गाँधी  जी ने पूछा-ये बताओ कि क्या तुमने  गहराई से सोचा है कि किसानों  की हालत बद से बदतर क्यों  होती जा रही है……तुम यूपी में किसानों की लड़ाई  लड़ने की बात कर रहे हो……मगर  क्या पूरे मुल्क में ही वे बरबादी की कगार पर नहीं खड़े हैं। क्यों किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं…..क्यों ने अपनी ज़मीनें बेचने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं…..क्यों वे खेती छोड़कर मज़दूरी करने लगे हैं…. क्यों विदेशी कंपनियाँ बीजों पर कब्ज़ा करती जा रही हैं….इन सवालों पर कभी सोचा है।

राहुल गाँधी  ने कुछ देर मौन रहने के बाद कहा- नहीं, मेरे थिंक टैंक ने कभी इस तरह से सोचने के लिए नहीं कहा…..वह तो मुझे ये बताता है कि ये करो तो मीडिया कवरेज मिलेगा….ऐसा करने से प्रो पुअर इमेज बनेगी वगैरा वगैरा। वह जैसा बोलता है मैं करता जाता हूँ।

गाँधीजी ने फिर पूछा-ये बताओ कि क्या ये सही नहीं है कि यूपी में  चुनाव हैं और तुम इसीलिए भट्टा परसौल में आंदोलन करने पहुँच गए थे?

राहुल ने थोड़ा आँखें चुराते हुए  कहा- हो सकता है इसमें तनिक सचाई हो मगर मैं तो किसानों  की लड़ाई लड़ रहा था और इसीलिए मुझे हिरासत में भी लिया गया। और फिर मैं देख रहा हूँ कि उससे किसानों का फ़ायदा हो रहा है। उनके मुद्दे को ढेर सारा प्रचार मिला है। मैं ये भी महसूस करता हूँ कि मैं जब जनता के मुद्दे उठाता हूँ तो कई बार सरकार को भी क़दम उठाने पड़ते हैं। मनमोहन जी मेरी हर माँग को पूरा कर देते हैं और उससे लोगों का फ़ायदा हो जाता है।

इसके बाद राहुल बाबा गाँधी जी के मुँह की तरफ इस उम्मीद से देखने लगे कि अब ज़रूर वे उन्हें शाबाशी देंगे। मगर उन्हें निराशा हाथ लगी।

गाँधी जी ने बहुत ही धीमे स्वरों में  कहना शुरू किया-बस इसीलिए मैने कहा था कि तुम्हारा संघर्ष सत्ता से प्रेरित है और सत्ता के ही लिए है। इसमें  सत्य नहीं है नहीं तो तुम  सबसे पहले अपनी सरकार के ख़िलाफ़  बिगुल बजाते। उन मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ सत्याग्रह करते जो किसान विरोधी आर्थिक नीतियों के सूत्रधार हैं। उन नीतियों पर चोट करते जो किसानों को गर्त में ढकेल रही हैं। उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कार्पोरेट घरानों के खिलाफ़ हल्ला बोलते जो किसानों को बेदखल करके पूरी कृषि व्यवस्था को अपने हाथो में ले लेना चाहते हैं। उस भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की माँग करते जिसे अँग्रेज़ों ने अपने स्वार्थ के लिए बनाया था और आज़ाद भारत की सरकारों ने भी उसका वही इस्तेमाल किया।

गाँधीजी की बातें सुनकर राहुल  थोड़ा उलझन में पड़ गए।  उन्हें लगा कि बुड्ढा सनक  गया है। मुझे अपनी ही सरकार  के ख़िलाफ़ भड़का रहा  है और उनके खिलाफ लड़ने  के लिए उकसा रहा है जिनकी  कृपा से सरकार चलती है।  यहाँ तक कि मम्मी की बात  भी न मानने के लिए कह रहा  है। ज़रूर ये नहीं चाहता  कि मैं आगे बढ़ूँ। देश  का प्रधानमंत्री बनूँ। इसकी बात न सुनने ही में फ़ायदा है। मगर इससे पिंड तो छुड़ाना पड़ेगा लिहाज़ा, उन्होंने गाँधीजी से कहा-ओके…मैं आपका पॉइंट ऑफ व्यू समझ गया हूँ और इसे अपने थिंक टैंक के साथ डिस्कस करूँगा। लेकिन आपको भी एक एडवायस है…..ऐसा लगता है कि साठ साल से स्वर्ग में रहने की वजह से आज की रियलिटी से कट गए हो। आपको थोड़ा ग्लोबलाइजेशन और प्रायवेटाएजेशन के बारे में जानना चाहिए, तभी आप ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी की प़ॉलिटिक्स को समझ सकेंगे।

राहुल की बातें सुनने के बाद गाँधीजी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। उन्हें लगा कि या तो वे ग़लत जगह पर आ गए हैं या गलत  व्यक्ति से बातें कर रहे थे या फिर वे बातें ही ग़लत कर रहे हैं। उन्होंने खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी और हे राम कहते हुए स्वर्गवासी हो गए।

इस व्यंग्य कथा के लेखक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार हैं. कई अखबारों और चैनलों के संपादक रह चुके मुकेश इन दिनों राष्ट्रीय न्यूज चैनल ”न्यूज एक्सप्रेस” के हेड हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Dr Md Rahmatullah, Delhi

    May 24, 2011 at 12:33 pm

    बढ़िया है…

  2. ललित पांडे

    May 24, 2011 at 12:47 pm

    राहुल और उनके चाटुकारों का राजनीतिक लाभ लेने की मंशा का पर्दाफाश करने का सफल प्रयास।

  3. satyendra pratap

    May 24, 2011 at 3:07 pm

    hakeekat ka aaina hai.

  4. satyendra pratap

    May 24, 2011 at 3:08 pm

    hakeekat aaina mein

  5. rps

    May 25, 2011 at 4:33 am

    bahut badiya

  6. jaihind

    May 25, 2011 at 5:09 am

    aap ek achche writer hai , hamesha bhavnayon me utarkar bat karte hai vichara pathak aap ki mithi baton me aa jata hai, media me bhi gandhi ki jarurat hai sir aap bhi gandhi ban jayeyen.

  7. shahid ansari

    May 25, 2011 at 5:15 am

    जबरदस्त अक्कासी हुई है मुकेश जी के द्वारा
    शाहिद अंसारी
    न्युज एक्सप्रेस मुंबई

  8. balveer

    May 25, 2011 at 12:24 pm

    yeh bhi munna bhai …..

  9. Yogeshwar Singh

    May 26, 2011 at 2:48 pm

    Mukesh ji maza aa gaya kam hi log hai patrakarita main jo khul kar bolte hai shasan ke kilaaf aasha hai yeh aandaz qayam rahega

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