सिंगूर, नंदीग्राम, दादरी या फिर भट्टा-परसौल… ये सारे नाम कुछ ऐसे गांवों के हैं जहां के निवासियों किसानों की जमीनें सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून के बल पर लेकर बड़े-बड़े उद्योगपतियों या फिर आवासीय कालोनी बनाने वाले बड़े बिल्डरों को विकास के नाम पर दे दिया गया. ऐसे मामलों में हमारी सरकारों का मानना होता है कि व्यापक लोकहित के लिए ऐसे कदम उठाना अत्यावश्यक है. पर सही मायनों में इस तरह के अधिग्रहणों से लोकहित होता किसका है…
उन गरीब किसानों का जिनकी रोजी-रोटी और सिर उठा कर जीने का एकमात्र जरिया उनकी जमीन ही होती है या फिर उन बड़े-बड़े उद्योगपतियों का जिन्हें करोड़ों रुपये मूल्य की जमीनें लगभग मुफ्त या फिर कौड़ियों के भाव में दे दी जाती हैं….
किसानों के साथ किस तरह से छल होता है और सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर किस तरह से अधिग्रहण सम्बन्धी मामलो में फर्जी कागजात तैयार किये जाते हैं इसका एक उदाहरण भटनी के चौदह गांव के किसानों द्वारा ”भूमि बचाओ किसान संघर्ष समिति” बना कर 15 फरवरी 2011 से किया जा रहा क्रमिक अनशन है. किसान यह मांग कर रहे हैं कि नियमों को दरकिनार कर उनके नामों से फर्जी अभ्यावेदन दिखा कर उनकी जमीनों को अधिग्रहित करने की सरकारी प्रक्रिया को रद्द किया जाय. पूरा मामला पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर के अंतर्गत भटनी-हथुआ रेल लाईन के लिए प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया से संबंधित है जिससे चौदह गांव के किसान प्रभावित हो रहे हैं. इन गांवों के ज्यादातर किसान लघु सीमांत किसान हैं जिनके जीविकोपार्जन का एकमात्र अवलंब खेती ही है.
कृषि योग्य जमीन के छोटे से टुकड़े के अलावा उनके पास ऐसा कोई साधन-संसाधन नहीं है जिससे वे अपने परिवार का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण कर सके. अपनी रोजी-रोटी के छिन जाने के भय के साथ-साथ इन किसानों के पास इस अधिग्रहण का विरोध करने के और भी अन्य कई वाजिब कारण हैं. किसानों का कहना है कि उनका गांव छोटी गंडक और खनुआ नदी के बीच स्थित हैं और यदि यहाँ रेलवे लाइन बनाया जाता है तो कई सारे गांव तीन तरफ से बाढ़ से घिर जायेंगे. वह भी मात्र इस कारण से कि पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का घर और उनकी ससुराल बिहार में है जिसे वे रेल मार्ग से जोड़ना चाहते थे.
तभी अपने रेलमंत्री के कार्यकाल के दौरान देवरिया से हथुआ तक रेल लाइन को 2005-06 के रेल बजट में शामिल कराया था लेकिन देवरिया से हथुआ रेल लाइन न बना कर जबरन भटनी से हथुआ रेल लाइन के लिए भटनी क्षेत्र के चौदह गांवों के किसानो का फर्जी अभ्यावेदन दिखाकर रेल लाइन बनाने का निश्चय कर लिया गया जो बिलकुल ही गलत है क्योंकि इन गांवों के किसानो ने कोई अभ्यावेदन दिया ही नहीं था. चूँकि रेल मंत्रालय द्वारा भूमि अधिग्रहण के सम्बन्ध में यह नीति बनाई गई है कि बिना किसानो की सहमति के उनके कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण न किया जाए. ऐसे में यह निश्चित रूप से जांच का विषय होना चाहिए कि इन किसानो के फर्जी नामो से अभ्यावेदन किसने दिए है.
भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में किस तरह से तथ्यों को गलत ढंग से और तोड-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और किस तरह से किसानो के हितों की अनदेखी की जाती है इसके एक नहीं हजारों उदाहरण मिल जायेंगे. किसानों के लिए जमीन महज उनकी रोजी-रोटी का जरिया ही नहीं होती है बल्कि उनका पूरा अस्तित्व ही उससे जुड़ा होता है. उनके पुरखों की ढेरों यादें उससे जुडी होती है. ऐसे में बिना किसी वाजिब कारण के भूमि अधिग्रहण कानून का सहारा लेकर उन्हें घर से बेघर कर देना कहाँ तक वाजिब है? फिर बिना उनकी सहमति और उनके विस्थापन से होने वाले नुकसान की भरपाई और उनकी जमीन का उचित बाजारू मूल्य दिए बिना उनकी जमीनों का अधिग्रहण कर लिया जाए तो उनका संघर्ष करना लाजिमी ही है.
फिर यदि इसी तरह से हमारी सरकारों द्वारा कभी आवासीय कॉलोनी बनाने के नाम पर तो कभी औद्योगीकरण के नाम पर, कभी सड़क बनाने तो कभी रेल पटरी बिछाने के नाम पर जबरन गरीब किसानो से उनकी मर्जी के बिना और बिना उनकी जमीन का वाजिब मूल्य दिए अधिग्रहित की जाती रहेंगी तो इन गांवों को भी दूसरा नंदीग्राम, सिंगूर, या फिर दादरी या भट्टा-परसौल बनने से कोई नहीं रोक सकता.
डॉ नूतन ठाकुर की रिपोर्ट












Anand kumar
June 19, 2011 at 7:07 am
Devaria Bhatni ke 14 ganvo ke sath nainsafi nahi honi chhiye. Neta samazik log age akar mada kare. Anand kumar
mau
mo.9451831331