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बेअसर नहीं होगी पत्रकार शहजाद की शहादत

: बेनजीर भुट्टो, डेनियल पर्ल, शहबाज भट्टी, सलमान तसीर के बाद अब निर्भीक पत्रकार शहजाद : अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के बाद अब पाकिस्तानी पत्रकार 40 वर्षीय सैयद सलीम शहजाद की हत्या की सारी दुनिया के मीडिया जगत में निंदा हुई है. शहजाद की ‘आतंकवाद’ मुद्दे पर विशेषज्ञता थी. उन्होंने अनेक बड़ी खबरों का भंडाफोड किया था.

: बेनजीर भुट्टो, डेनियल पर्ल, शहबाज भट्टी, सलमान तसीर के बाद अब निर्भीक पत्रकार शहजाद : अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के बाद अब पाकिस्तानी पत्रकार 40 वर्षीय सैयद सलीम शहजाद की हत्या की सारी दुनिया के मीडिया जगत में निंदा हुई है. शहजाद की ‘आतंकवाद’ मुद्दे पर विशेषज्ञता थी. उन्होंने अनेक बड़ी खबरों का भंडाफोड किया था.

लेकिन हाल में उन्होंने मेहरान के पाक नौसेना अड्डे पर आतंकी हमले को लेकर नेवी अफसरों और अलकायदा की मिलीभगत उजागर करते हुए खबर लिखी थी, जिसकी जबरदस्त चर्चा थी. शहजाद को पिछले वर्षों से लगातार पाक खुफिया एजेंसी आइएसआइ से धमकियां मिल रही थीं. और ऐसे समय जबकि एबटाबाद में बिन लादेन प्रकरण और मेहरान को लेकर सीधे तौर पर आइएसआइ को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था, उसी समय कराची के ‘डॉन’ अखबार ने पिछले दिनों शहजाद की चर्चित किताब ‘इनसाइड अलकायदा एंड तालिबान बियांड बिन लादेन एंड 9/11’  में छपे आइएसआइ और आतंकी संगठनों से रिश्ते की पोल खोलते हुए चुनिंदा अंश भी प्रकाशित कर दिए. ठीक इसी के बाद शहजाद अगवा हुए, उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा गया और फिर पिटाई से मौत के बाद उनका शव सड़क के किनारे पड़ा मिला. वैसे यह बात सिर्फ एक प्रतिबद्ध साहसी कलमकर्मी की ही नहीं है, बात है उस प्रवृत्ति की जिस ओर पाकिस्तान बहुत तेजी से बढ़ रहा है. जब उत्तरी अफ्रीका समेत पूरे मध्यपूर्व में लोकतांत्रिक हवा तेजी से बह रही है, उसी समय उसके विपरीत एंटी क्लाइमेक्स के रूप में पाकिस्तान में अलकायदा समेत अन्य कट्टरपंथी-आंतकी संगठन सरकार-सेना और आइएसआइ से गठजोड़ करके हर स्वतंत्र और जम्हूरी आवाज को दबाना चाह रहे हैं.

पाकिस्तान में शहजाद के पहले पिछले महीनों में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई कि उन्होंने ईशनिंदा के आरोप में जेल की सजा काट रही ईसाई महिला आसिया बीबी को न्‍याय दिलाने की पहल की थी. इसी तरह आजाद और जम्हूरी खयालात के पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या खुद उनके अंगरक्षक ने कर दी. पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या भी इन्हीं कट्टरपंथियों ने की. इन हत्याओं की श्रृंखला में अब शहजाद के भी जुड़ने से यह बात साफ हो जाती है कि सेना-सरकारी मशीनरी-खुफिया तंत्र और कट्टरपंथियों का आपसी तालमेल बहुत गहरा है और वे किसी भी विरोधी बात को बर्दाश्त करने तैयार नहीं हैं. शिकागो में तहव्वुर राणा मामले में गवाही के दौरान हेडली के खुलासे से जहां 26/11 में आइएसआइ की स्पष्ट भागीदारी खुल कर सामने आई, इससे उसकी भारी किरकिरी ही नहीं हुई बल्कि उसे शर्मिंदगी भी उठानी पडी. फिर एबटाबाद प्रकरण और मेहरान मामले में भी उसे ऐसे ही दौर से गुजरना पडा- लेकिन इन सारे मामलों के बाद अब शहजाद मसले पर भी राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी द्वारा जांच की घोषणा के बाद भी कुछ सार्थक हो पाएगा, इसकी संभावना कम ही है.

दरअसल, पिछले साल अक्तूबर में भी शहजाद को आइएसआइ ने अपने कार्यालय बुलाकर लंबी पूछताछ की थी. फिर उन पर पहले की तरह ही पूछताछ के बाद भी लगातार निगरानी रखी जा रही थी. खुद शहजाद और उनके परिवार वालों तथा मित्रों का भी कहना रहा है कि उन्हें लगातार धमकियां मिलती रही थीं. लेकिन शहजाद धुन के पक्के थे. वो हांगकांग की ‘एशिया टाइम्स ऑनलाइन’ के ब्यूरोचीफ के साथ ही इटली की एक प्रमुख समाचार एजेंसी से भी संबद्ध थे. एबटाबाद के बाद मेहरान पर उनकी रिपोर्टें जहां पूरी पाक दुर्व्‍यवस्था की पोल खोल रही थीं, वहीं आइएसआइ और आतंकी संगठन उन्हें बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे. ”ऐसे समय जब अखबारों ने शहजाद की किताब ‘इनसाइड अलकायदा एंड तालिबान’  के वे अंश प्रकाशित किए जिनसे 26/11 को लेकर अलकायदा और आइएसआइ के गहरे रिश्तों की परतें उघडने लगीं तो उन्होंने शहजाद को रास्ते से हटा दिया.”  ऐसा न केवल शहजाद के परिवार वाले कह रहे हैं, बल्कि पाक मीडिया जगत का बड़ा तबका भी ऐसा ही मान रहा है. वे कहते हैं कि शहजाद के पास अनेक ऐसी जानकारियां थीं जिनसे भविष्य में उनकी और भी पोल खुलने वाली थी.

वे तो तब से जले-भुने बैठे थे, जब शहजाद ने 26/11 को लेकर किताब में यह लिखा कि अलकायदा से संबद्ध इलियास कश्मीरी ने आइएसआइ को इस योजना को आगे बढ़ाने को प्रेरित किया. फिर आइएसआइ ने इसे लश्कर-ए-तोएबा से लागू करवाया. यह इलियास कश्मीरी ही था, जिसने समझाया कि यदि 26/11 के बाद भारत-पाक युद्ध हो जाएगा तो फिर अलकायदा आतंक के केंद्र के रूप में निशाने से खुद-ब-खुद हट जाएगा. इलियास की यह योजना अलकायदा को तुरंत पसंद आई. शहजाद ने लिखा है कि यह इलियास ही था, जिसने षडयंत्र की इस योजना की प्रति पाकिस्तानी सेना के पूर्व मेजर हारुन आशिक को सौंपी थी. हारुन पहले लश्कर के कमांडर रह चुके हैं, और अब भी लश्कर के चीफ जकीउर-रहमान लखवी और अबू हमजा के नजदीकी हैं. इसी तरह शहजाद ने सेना, आइएसआइ और आतंकियों के संबंधों की अनेक गुप्त बातों का खुलासा किताब में किया है.

लेकिन शहजाद की मौत ठीक उस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद हुई जो उन्होंने 16 घंटे तक चले मेहरान में आतंकी हमले को लेकर लिखी कि यह नेवी के बडे़ अफसरों और आतंकियों की मिलीभगत का नतीजा था. गौर करने की बात है कि मेहरान हमला पाकिस्तान के इतिहास का पहला ऐसा बड़ा हमला है, जिसमें आतंकियों ने 9/11 और 26/11 की तरह नागरिकों को निशाने पर नहीं रखा, बल्कि पाक की सैन्य व्यवस्था को ध्वस्त करने और उसे चोट पहुंचाने की कोशिश की. अत्याधुनिक विमानों को ही बरबाद नहीं किया गया बल्कि अरबों रुपयों की सैन्य क्षति की गई. दूसरी खास बात ये थी कि मेहरान से 15 किलोमीटर की दूरी पर पाक परमाणु हथियारों के जखीरे के केंद्र हैं-  संभव है आतंकी मंशा उन तक पहुंचने या उन्हें हथियाने की रही हो. जाहिर है शहजाद की इस बारे में रिपोर्ट पाक में हावी गठजोड़ को नागवार गुजरी. उधर, पाक सरकार ने यह घोषणा करके स्थिति को और भी विचित्र बनाने की कोशिश की कि पत्रकार भी सैन्‍यकर्मियों की तरह आतंकियों के निशाने पर हैं, इसलिए वे आत्मरक्षा में छोटे हथियार लेकर चल सकते हैं. लेकिन पाक पत्रकारों और संगठनों ने इस कथित ‘दरियादिली’  का यह कहकर उचित विरोध किया कि ‘ हम कलम का काम करते हैं. हथियार लेकर चलना हमारा काम नहीं है. पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का काम है.’

स्पष्ट है कि शहजाद जैसे निर्भीक पत्रकार की मौत ने जहां दुनिया भर के कलमकर्मियों, बौद्धिकों, उदारवादियों को एकजुट किया है कम से कम सोच के स्तर पर, वहीं पाकिस्तान में भी पत्रकारों-साहित्यकारों और बौद्धिकों ने हिंसा और उग्रवाद की निंदा करते हुए बड़ा प्रदर्शन किया है. यह सच है कि सेना, आइएसआइ और आतंकी संगठनों में स्वार्थ के गहरे रिश्ते हैं, उनका गठजोड़ भी बहुत मजबूत है, लेकिन इस गठजोड़ के खिलाफ हर उदारवादी – जम्हूरी पहल का स्वागत होना चाहिए. संभव है कि यह पहल बहुत छोटी हो, शायद ऊंट के मुंह में जीरे जैसी –  लेकिन समझा जाना चाहिए कि शुरुआत में हर ईमानदार और विवेकी पहल प्रायः छोटी ही होती है. लेकिन उसका असर दूरगामी, व्यापक और दीर्घजीवी होता है. खास कर ऐसे माहौल में जब मध्यपूर्व में वैसे भी लोकतंत्र की आंधी चल रही हो और पड़ोसी दुनिया का प्रमुख जनतंत्र भारत हो तो इनके असर को भी बंदूक आखिर कब तक रोक पाएगी!

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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