अन्‍ना ने कहा – मेरी यात्रा देश के लिए, आडवाणी की पार्टी के लिए

: रालेगण सिद्धी की यात्रा और अन्ना हजारे से बातचीत : कैसा समर्थन? 12 दिनों तक न तो भागवत मिले और न ही संघ का कोई और : पुणे से औरंगाबाद जाते हुए रालेगण सिद्धी की ओर मुड़ जाता हूं. एक कौतूहल, एक जिज्ञासा मुख्य सड़क से छोटी सड़क की ओर खींच ले जाती है.

मर्डोक की माफी का असर यहां भी!

पिछली 10 जुलाई को ब्रिटेन का 168 साल पुराना अखबार ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’  बंद हो गया. अब खबर यह नहीं है कि रूपर्ट मर्डोक का सामान्यतः 25 लाख प्रतियों वाला यह लोकप्रिय अखबार फोन हैकिंग के मसले में फंसा और अंतिम दिन पहले पेज पर ‘अलविदा’  शीर्षक के साथ इसकी लगभग 45 लाख प्रतियां छपीं, बल्कि नए खुलासे यह हैं कि ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’  के अलावा भी अनेक अखबार और मीडिया संस्थान फोन हैक करके गुप्त बातें सुन रहे हैं, जिनमें मर्डोक के दूसरे संस्थान भी शामिल हैं और इसे खबर के स्रोत के रूप में प्रयोग कर रहे हैं.

गांधी कहीं छुपते, भागते, डरते, कमजोर पड़ते नहीं दिखते थे

गिरीशजी: रामलीला मैदान, राजघाट और गांधी : आज अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों ने फिर से महात्मा गांधी की तकनीक सत्याग्रह और अनशन की ओर ध्यान आकर्षित किया है. हालांकि समय-समय पर इन गांधीवादी तौर तरीकों के प्रयोग की बात विभिन्न स्तरों पर होती रही है, लेकिन वे कितने गांधीवादी हैं, और हैं भी या नहीं- इसे लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.

बेअसर नहीं होगी पत्रकार शहजाद की शहादत

: बेनजीर भुट्टो, डेनियल पर्ल, शहबाज भट्टी, सलमान तसीर के बाद अब निर्भीक पत्रकार शहजाद : अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के बाद अब पाकिस्तानी पत्रकार 40 वर्षीय सैयद सलीम शहजाद की हत्या की सारी दुनिया के मीडिया जगत में निंदा हुई है. शहजाद की ‘आतंकवाद’ मुद्दे पर विशेषज्ञता थी. उन्होंने अनेक बड़ी खबरों का भंडाफोड किया था.

सारी दुनिया के सामने इस्लामाबाद के सारे खेल का खुलासा

: पाकिस्तान की और फजीहत अभी बाकी है :  आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के साथ जहां पश्चिमी दुनिया में खुशी की लहर है, वहीं आने वाले वक्त में अमेरिकी रुख के और उत्साहित और आक्रामक होने के आसार हैं. वाशिंगटन ने पिछले एक साल से इस बाबत संकेत देने भी शुरू कर दिए थे लेकिन पिछले महीने से और खासकर कुछ दिनों पूर्व से ऐसी संभावना थी कि जल्दी ही खुफिया सूचनाओं के आधार पर कुछ बड़ा घटित होने वाला है.

गिरीश मिश्र का तबादला, पुणे एडिशन लांच कराएंगे

गिरीश मिश्रनागपुर में रहकर लोकमत ग्रुप के हिंदी दैनिक लोकमत समाचार का संपादक के रूप में काम देख रहे गिरीश मिश्र का तबादला पुणे के लिए कर दिया गया है. पुणे में उनके नेतृत्व में लोकमत समाचार हिंदी दैनिक का पुणे एडिशन अगस्त में लांच किया जाएगा. पुणे में रहकर ही गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के सभी संस्करणों के एडिट व फीचर पेज का काम देखते रहेंगे.

अन्‍ना : नैतिक ताकत का प्रतिबिंब बनाम अलोकतांत्रिक फासिस्टी प्रवृ्त्ति

गिरीशजीअन्‍ना हजारे के अनशन के बाद लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार करने के लिए बनी समिति की बैठकें शुरू हो चुकी हैं. इसे 15 अगस्त तक संसद से पारित कराने की समय-सीमा है, जो संभवतः स्वतंत्रता दिवस पर देश को उपहार जैसा ही होगा. ऐसा न होने पर अन्‍ना ने और भी बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी दी है. लेकिन इन सबके पीछे अन्‍ना के इस पूरे आंदोलन और उससे जुड़ी बातों को लेकर अनेक सवाल भी उठ रहे हैं.

कबीलाई तंबुओं का उखड़ना तय

गिरीशजी: अरब दुनिया में बहती लोकतांत्रिक हवा : ”शायद यह कबीलाई तौर-तरीकों का असर हो कि गद्दाफी लीबिया के आलीशान महलनुमा आवासों के अलावा टेंट-तंबुओं में भी रहते हैं. इन तंबू-कनातों के अनेक बाहरी घेरों में सतर्क महिला कमांडो होती हैं. 2009 में रोम के पास लाकिला में हुए जी-8, जी-5 शिखर सम्मेलन में पर्यवेक्षक के रूप में आए गद्दाफी अन्य सभी राष्‍ट्राध्यक्षों की तरह भव्य होटलों में नहीं रूके, वो अलग खुले मैदान में लगे तंबुओं में ठहरे थे.”

कहानी एक तानाशाह, एक लोकतांत्रिक की

गिरीश मिश्रलीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी और विकीलीक्स के जूलियन असांज चर्चा में हैं. ये अलग बात है कि विपरीत वजहों से. एक खुद का ताज बचाने में इतना नीचे गिर गया है कि न तो हवा का रुख पहचान पा रहा है और न ही दीवार पर लिखी अपने ही पतन की इबारत. हालत ये है कि वो अपनी ही अवाम का भाड़े के सैनिकों से कत्लेआम करा रहा है. तो दूसरा सारी दुनिया में जम्हूरियत का परचम फहराने को आतुर है, लेकिन उसे अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी लोकतांत्रिक खेमे की शातिराना नाराजगी झेलनी पड़ रही है.

ये ‘तूफान’ थमने वाला नहीं

गिरीश जी”ट्यूनीशिया, फिर मिस्र. अब कौन? अनेक सर्वसत्तावादी सरकारें भयभीत हैं. फिलहाल मिस्र की घटनाओं पर फलस्तीन, जार्डन, तुर्की, यमन, बहरीन, अल्जीरिया, लेबनान, सीरिया और ईरान के लोगों ने गले मिलकर, जबर्दस्त आतिशबाजी करके और गाडियों के हॉर्न बजाकर खुशी का इजहार किया है. लेकिन सऊदी अरब, लीबिया, कुवैत, ओमान, अल्जीरिया और बहरीन जैसे अनेक देशों की सरकारें सकते में हैं. उधर, तुर्की सरकार ने जहां खुशी व्यक्त की है, वहीं ट्यूनीशिया की सरकार ने चुप्पी ओढ़ रखी है, जबकि जनता उल्लसित है…”

मिस्र के ‘महाकुंभ’ की धमक!

गिरीशजीमिस्र में तहरीर चौक पर जनता का सैलाब बदस्तूर जारी है. पिछले दिनों हिंसा के बाद भी उत्साही हुजूम शांतिपूर्ण है. मिस्र के इतिहास में इस अपूर्व जम्हूरी मेले में लोग सपरिवार शरीक हैं. मांएं गोद में बच्चों को लेकर मौजूद हैं, सिर्फ इस आस में कि कम से कम उनके लाल को आज से ’बेहतर कल’ मिले, वो नहीं जिसे वे दशकों से भुगत रही हैं. फिल्मी सितारों, थिएटर कर्मियों, डॉक्टरों-इंजीनियरों, शिक्षकों समेत शहरी मध्यवर्ग की अगुवाई में युवा, बुजुर्ग, आम मेहनतकश सभी शरीक हैं – बदलाव की चाहत वाले इस महाकुंभ में.

मिस्र से उठी जम्हूरी हवा!

गिरीश मिश्र : उम्मीद-आशंकाओं के बीच : ट्यूनीशिया से शुरू हुई जनविद्रोह की धमक ने मिस्र को पूरी तरह से अपने आगोश में ले लिया है. मिस्र में जिस तरह से राजधानी काहिरा, सुएज, अलेक्जेंडिन्या समेत अनेक शहरों में लाखों लोग सड़कों पर रैली की शक्ल में उतरे और राष्‍ट्रपति हुस्नी मुबारक के तीन दशक के शासन के खात्मे की मांग की, उसने दुनिया भर में अनेक सर्वसत्तावादी तानाशाही तंत्रों को भयभीत कर दिया है.

बापू की कलम को प्रणाम!

fगरीशजी: पुण्यतिथि पर विशेष : आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है. बापू को श्रद्धांजलि के साथ पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में हुए सेमिनार की याद आ रही है, जिसमें पत्रकारिता के संदर्भ में गांधी की बात उठी थी. मेरी मान्यता है कि गांधी दुनिया के महानतम पत्रकारों में से एक थे. जननेता, राजनीतिज्ञ, समाजसुधारक और संत या महात्मा बनने या इनकी जनता के बीच स्वीकार्यता की प्रक्रिया तो जीवन के बाद के चरणों की है. जीवन की शुरुआत तो वकालत के साथ पत्रकारिता की ही रही.

धर्म का मर्म – ग्लैडिज की उदारता!

गिरीश मिश्रक्या संयोग है! 22 जनवरी 1999 की रात को उडीसा के क्योंझर क्षेत्र में दारा सिंह और उसके मदांध कट्टर सहयोगियों ने ईसाई समुदाय के फादर ग्राहम स्टेन्स और उनके छह और दस साल के बेटों टिमोथी और फिलिप को जलाकर मार डाला था. और, 12 साल बाद 21-22 जनवरी 2011 के अखबारों और न्यूज चैनलों में यही खबर प्रमुख सुर्खी बनी कि सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह और महेंद्र हेम्ब्रम को उच्च न्यायालय द्वारा सुनाई गई उम्र कैद की सजा को बरकरार रखा. दारा सिंह को फांसी दिलाने की सीबीआइ की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने भले ही खारिज कर दी हो, लेकिन हिन्दू कट्टरपंथियों को यह स्पष्ट संदेश जरूर गया कि कानून के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं है और हर तबके को अपनी हद में ही रहना चाहिए.

हिंदुस्तान की जवां रूहानियत को सलाम

गिरीशजी: कुदरत का तोहफा है 2011 : जी हां, 2011 कुदरत का एक तोहफा है! इस तोहफे के लिए सभी को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई. यह उस नए युवा भारत के प्रतीक्षित ‘दशक’ का पहला साल है जब हिंदुस्तान सिर्फ आर्थिक विकास की दौड़ में ही अव्वल नहीं होगा, बल्कि हर मायने में दुनिया की सबसे बड़ी मान्य ताकत यानी ‘सिरमौर’ भी होगा. शताब्दियों तक ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में लुभाने के बाद पहली बार आधुनिक इतिहास में ऐसा भी हुआ जब बीते साल के छह महीनों में ही हर बड़ी वैश्विक ताकत ने हमारे दरवाजे पर आशा भरी दस्तक दी.

क्या भारत 2020 तक चीन से आगे निकल जाएगा?

गिरीशजी: ड्रैगन बनाम टाइगर :  नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था – ‘चीन को अभी सोने दो. यदि वो जाग गया तो भारी उथल-पुथल करेगा.’ नेपोलियन ने यह बात लगभग दो शताब्दी पहले कही थी- लेकिन इसका असर अब दिख रहा है. तभी तो दुनिया की सबसे तेज विकसित होती चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर छपी दो रिपोर्टें इस समय खासी चर्चा में हैं. पहली है साप्ताहिक ‘द इकानॉमिस्ट’ की विशेष रिपोर्ट. इसमें संभावना जताते हुए कहा गया है कि तेजी से बढ़ते चीन के विश्व अधिपति बनने पर कई खतरे पैदा होंगे. इनमें सबसे निर्णायक तो यही होगा कि पश्चिमी दुनिया जिस मात्रा में असरहीन होगी, उतनी ही तेजी से नई विश्व व्यवस्था का निर्माण होगा.

प्रतिस्पर्धा – सहयोग का खेल

गिरीशजी: चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा : भारत के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग की दो दिवसीय पारी खेल कर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ पाकिस्तान रवाना हो गए. दिल्ली में दोनों देशों के बीच 16 बिलियन डालर के समझौते पर दस्तखत हुए और द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को 2015 तक सौ बिलियन डालर तक विस्तारित करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया. लगा कि इस पहल से रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया और मजबूत ही होगी.

‘शालीन लौ’ हमेशा रोशन करेगी!

[caption id="attachment_18904" align="alignleft" width="90"]सुरेन्‍द्र मोहनसुरेन्‍द्र मोहन[/caption]: श्रद्धांजलि : समाजवादी-राजनीतिक विचारक सुरेंद्र मोहन का गुजर जाना उन मूल्यों और संस्कारों के लिए हादसा है जो नैतिकता, सद्भाव, लोकतंत्र और समाजवाद के जन सरोकारों और जमीनी सच्चाइयों से जुडे हैं. वैसे भी आज की सियासत में सबसे ज्यादा कमी इन्हीं की है, इसलिए भी ये हादसा ही ज्यादा है.

सच से डर लगता है

गिरीश: श्याबाओ हों या विकिलीक्स- कहानी एक है : ‘चीन तब तक दुनिया का नेता नहीं बन सकता, जब तक कि वो मानवाधिकार हनन नहीं रोकता. हालांकि लू श्याबाओ की कहानी एक अरब से ज्यादा लोगों में से एक व्यक्ति की कहानी है, लेकिन ये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के प्रति चीन की सरकार की असहिष्णुता का प्रतीक है.’ आर्चबिशप डेसमंड टूटू और वेस्लाव हावेल (दोनों नोबेल शांति पुरस्कार के पूर्व विजेता). ’चीन ने जो किया वो दुखद है…बहुत दुखद. एक मनुष्य होने के नाते मैं श्याबाओ की ओर अपना हाथ बढाना चाहती हूं.’ आंग सान सू ची (नोबेल शांति पुरस्कार की पूर्व विजेता). ’इस साल 2010 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्याबाओ का काम तुलनात्मक रूप से मुझसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है… मैं अपील करता हूं कि चीन सरकार उन्हें तुरंत रिहा करे.’ बराक ओबामा (2009 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता).

आएगी पारदर्शिता!

गिरीश: विकीलीक्स धमाके हों या राडिया, कॉमनवेल्थ, आदर्श जैसे खुलासे : इस समय वेबसाइट विकीलीक्स को लेकर सारी दुनिया में खासी चर्चा है. अनेक सत्‍ता तंत्र सकते में हैं. जो अमेरिका इंटरनेट में पहल के संदर्भ में कभी सिरमौर हुआ करता था, अब वही खुद इंटरनेट के निशाने पर है और हकबकाया हुआ सभी जगह सफाई देता घूम रहा है, इन सबके बीच गौरतलब ये है कि विश्व स्तर पर जो काम विकीलीक्स कर रहा है, लगभग उसी दरम्यान भारत में भी खुलासों का बाजार खासा गर्म है-चाहे कॉमनवेल्थ गेम्स का एक लाख 70 हजार करोड़ का घोटाला हो, उद्योगपतियों-दलालों-राजनीतिज्ञों-मीडियाकर्मियों के गठजोड़ की पोल खोलती नीरा राडिया टेप प्रकरण हो, स्पेक्ट्रम घोटाला हो, आदर्श सोसाइटी मामला हो या फिर कुछ और – ये सुर्खियां भी विकीलीक्स के खुलासों की धारा से कहीं-न-कहीं जुड़ती-सी प्रतीत होती हैं. उसी धारा की परछाई-सी लगती हैं. रही बात हंगामे की तो वो वहां भी है, यहां भी है – भले ही उनके रूप थोड़े अलग हैं. लेकिन मूल सवाल यही है कि इन खुलासों के संकेत क्या हैं? क्या ये पूंजीवाद और पूंजीवादी दरबारी लोकतंत्र के द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व का खुलासा है? ये लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत है या फिर दुखद? ऐसे अनेक सवाल उठ रहे हैं.

काबा हो तो क्या, बुतखाना हो तो क्या!

गिरीश: 6 दिसंबर 1992 की बरसी पर : बाबरी मस्जिद की शहादत की आज 18वीं बरसी है. कुछ लोग इसे विवादित इमारत या ढांचा भी कहते थे. उत्‍तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में मस्जिद की रक्षा के लिए चली गोली में 28 लोगों की जान गई थी, तो कल्याण सिंह सरकार के जमाने में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने ढांचे को ध्वस्त कर दिया था, और सरकारी तंत्र वहां खड़ा तमाशबीन ही नहीं था, बल्कि उसने कारसेवकों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद ही की थी. फिर इसे लेकर देश में ही नहीं, विदेशों में भी भड़के दंगों में अनेक निरपराध लोगों की जान गई थी.

आधी आबादी की आवाज पहचानने में चूके लालू

गिरीश मिश्र: डॉ. लोहिया कहते थे, ‘जो बोलेगा और डोलेगा, वो आगे जाएगा’, नीतीश ने इस सूत्र-वाक्य पर अमल किया : बिहार के चुनावी नतीजों के प्रमुख कारकों में प्रदेश की आधी आबादी यानी महिला तबके की जागृति, उनका अपूर्व उत्साह और चुनाव में बढ़-चढकर उनकी हिस्सेदारी रही. लेकिन बहुतों ने इस नए माहौल की या तो अनदेखी की या जान-बूझकर इसे झुठलाने की कोशिश. तभी तो दीवारों पर लिखी इस इबारत को समझने में वे चूक गए. उदाहरण के तौर पर बूथों के बाहर महिला वोटरों की लंबी-लंबी कतारों के बारे में मतगणना से एक दिन पूर्व जब लालू यादव से पूछा गया तो उन्होंने ऐसी किसी महिला जागृति की बात या फिर उनकी किसी उत्साही शिरकत को सिरे से ही खारिज कर दिया. तभी लालू ने ये भी कहा, ‘अरे राबड़ी देवी वहीं न वोट देंगी, जहां हम कहेंगे. इसमें नया क्या है?… यही पूरे बिहार में होता है, रिजल्ट आएगा तो सब मीडिया वालों को पता चल जाएगा…’.

आज भी हैं ये शक्तिपुंज

गिरीश मिश्र : 31 अक्तूबर पर विशेष : इंदिराजी, लौह पुरुष और आचार्यजी : आज 31 अक्तूबर है. भारतीय इतिहास के तीन सितारों को याद करने का दिन. आज इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है तो वल्लभभाई पटेल और आचार्य नरेंद्र देव की जयंती. दिलचस्प है कि तीनों की धाराएं भले ही अलग हों, पर वे अपने क्षेत्र के शिखर व्यक्तित्व हैं. शक्तिपुंज हैं. अतुलनीय और अविस्मरणीय भी.

खबरों से घबराता तंत्र

[caption id="attachment_17838" align="alignleft" width="74"]गिरीश मिश्रगिरीश मिश्र[/caption]आजकल कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे सिर चढ़कर बोल रहे हैं. मीडिया के हर रोज के खुलासे फिलहाल आरोपों की शक्ल में सुर्खियां बन रहे हैं. आईपीएल के ललित मोदी जैसी हालत सुरेश कलमाडी की भी हो गई है. संभव है कि मीडिया टनयल में कुछ ज्यादा ही प्रचार-दुष्प्रचार हो रहा हो, लेकिन लाखों-करोड़ों के स्पष्ट घोटाले जिस तरह से सामने आए हैं, उनमें से अनेक में तो कुछ कहने को भी नहीं रह जाता. जैसे एक लाख का टेन्ड मिल 10 लाख में, और वो भी किराए पर. चार हजार में टिश्यू पेपर का रोल, 40 हजार का एसी दो लाख रुपए में किराए पर, छह हजार में छतरी. आखिर ये क्या है? केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ी कुल सोलह परियोजनाओं की जांच की. पता चला है कि ज्यादातर में घटिया क्वालिटी का सामान लगा है. प्रोजेक्ट की लागत भी काफी बढाकर लगाई गई है. मजे की बात है कि पकड़े न जाएं, इसलिए परियोजना पूरी होने के जाली सर्टिफिकेट भी बनाए गए.

ये 7 बुराइयां

गांधी जीगांधी पुण्यतिथि पर विशेष : इस वैश्विक दुनिया में बापू की पुण्यतिथि हर साल जयन्ती की तरह आती है और चली जाती है. अखबारों में चित्र दिखते हैं, कुछ लोग फूल चढ़ाते नज़र आते हैं और फिर हर साल हम गांधी से अपनी दूरी बढ़ाते ही जाते हैं. जैसे किसी कर्मकाण्डी की तरह चन्द क्षणों के लिए जुबान पर, और फिर लंबी छुट्टी. इसके अलावा कभी वो दिखते हैं प्रोडक्ट बेचने के नए हथकण्डे के रूप में. एक कंपनी के सीमेंट के विज्ञापन में टीवी पर अमिताभ बच्चन यह कहते हुए दिखते हैं कि देश छोड़कर जाने वाला विदेश में भी प्रभाव छोड़ता है. जैसे गांधी के दक्षिण अफ्रीका में सत्य के प्रयोग की तरह वो सीमेंट भी दुनिया में दिग्विजय यात्रा पर निकल पड़ी हो. कभी सियासी पार्टियों के सम्मेलनों-बैठकों में गांधी के चित्र झांकते नज़र आते हैं. गोया उनके लिए कॉस्मेटिक सरीखे भर रह गए हों बापू. तो ये है हमारी सच्चाई. सभी उनकी तस्वीर लगाते हैं, माल्यार्पण करते हैं, लेकिन व्यवहार में आचरण एकदम उलट.

आई क्विट!

सिर्फ महाराष्ट्र में 14 दिनों में 24 टीनएजर्स ने आत्महत्याएं कीं : ऐसे कैसे चांद सितारे छू पाएंगे नन्हे हाथ? : यह खबर चौंकाने के लिए काफी है कि मध्यप्रदेश के देवास में 10वीं की छात्रा ने ‘थ्री इडियट्स’ की तर्ज पर खुदकुशी कर ली. उसने सुसाइड नोट में लिखा कि ‘इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं. मैं अपना एसाइनमेंट पूरा नहीं कर पा रही. सो आई क्विट.’ 15 साल की एक विद्यार्थी के इस कदम से कोई भी अन्दर तक हिल सकता है. लेकिन, यह कोई अकेली घटना नहीं है. इसी तरह की खबर एक दिन पहले सागर से भी थी कि 14 साल के आठवीं के छात्र कुणाल खेड़ीकर ने ज्यादा होमवर्क से परेशान होकर कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली. कुणाल ने नोट में लिखा है कि अधिक होमवर्क वो पूरा नहीं कर पा रहा, इसलिए यह कदम उठा रहा है. अहमदनगर में बारहवीं की दो छात्राओं ने, जो राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी भी थीं, ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली. एक तलवारबाजी में, तो दूसरी कबड्डी में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं.