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दुख-दर्द

… ताकि जाया न जाए संगम की मृत्यु

प्रदीप संगम का असमय जाना निश्चित रूप से बेहद दुखद घटना है। लेकिन यह घटना हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि पत्रकारिता की दुनिया में आखिर वो कौन से कारण है जो किसी भी संवेदनशील इंसान को तनाव की उस पराकाष्ठा तक पहुंचा देते हैं, जहां से कोई वापसी संभव नहीं होती। प्रदीप संगम से मेरा परिचय लगभग 12 साल पुराना है।

प्रदीप संगम का असमय जाना निश्चित रूप से बेहद दुखद घटना है। लेकिन यह घटना हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि पत्रकारिता की दुनिया में आखिर वो कौन से कारण है जो किसी भी संवेदनशील इंसान को तनाव की उस पराकाष्ठा तक पहुंचा देते हैं, जहां से कोई वापसी संभव नहीं होती। प्रदीप संगम से मेरा परिचय लगभग 12 साल पुराना है।

इन 12 सालों में मैंने प्रदीप संगम को एक बेहतर इंसान और अच्छे पत्रकार के रूप में जाना। वह अपने काम के प्रति इतने ज्यादा प्रतिबद्ध थे कि काम की धुन में अक्‍सर उन्हें खाने तक का भी ध्यान नहीं रहता था। हिंदुस्तान के तैयारी के पेज उन्होंने जिस शिद्दत और मेहनत से निकालें वह उनकी रचनात्मक ऊर्जा का ही प्रतीक थे। तैयारी के इन पृष्ठों के माध्यम से ही मैंने जाना कि प्रदीप संगम की सोच और लेखन का दायरा केवल फिल्मी दुनिया तक ही सीमित नहीं था बल्कि वे गैजेट्स और टेकनॉलोजी जैसे विषयों पर सहज भाव से अपनी कलम चला सकते थे।

प्रदीप संगम से हुई मुलाकातों के दौरान ही मैंने यह भी जाना कि वह न केवल कविताएं लिखते थे, बल्कि कई मंचों से उन्होंने काव्य पाठ में भी शिरकत की थी। नए और युवा लोगों को मौका देना उनकी आदत में शुमार था। कितने ऐसे नए लोग होंगे जिनको प्रदीप संगम ने पत्रकार का चेहरा दिया। ऑफिस में भी अपने सहयोगियों ओर नए लोगों को वे अकसर बढ़ावा दिया करते थे।

जाहिर है वे सब लोग भी प्रदीप संगम के असमय जाने से बेहद दुखी है। ये भी संयोग की ही बात है कि पिछले कुछ समय से मेरी उनके साथ अंतरंगता लगातार बढ़ रही थी, लेकिन हम इस अंतरंगता को कोई रचनात्मक रूप दे पाते इससे पहले ही वे हमेशा के लिए पत्रकारिता और दुनिया से पूरी तरह से अनुपस्थित हो गए। उनका जाना जहां मेरे लिए निजी दुख का कारण है वहीं मैं इस बात को लेकर भी बेहद दुखी हूं कि संवेदनशील, मेहनती और काम के प्रति प्रतिबद्ध लोगों के साथ ही इस तरह की स्थितियां क्यों आती हैं, क्यों ऐसे ही लोग तनावग्रस्त होते है। यदि हम इन सवालों के जवाब खोज पाएंगे तो प्रदीप संगम की मृत्यु जाया नहीं जाएगी।

लेखक सुधांशु गुप्‍त हिंदुस्‍तान से जुड़े हैं तथा प्रदीप संगम के सहयोगी, सहकर्मी रहे हैं.

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0 Comments

  1. Anil Pande

    June 8, 2011 at 12:41 pm

    हिंदुस्तान में आखिर वो कौन से कारण हैं?

    Shashi Shekhar Ka Work culture?
    TERROR?

  2. Neelam Jeena

    June 8, 2011 at 2:11 pm

    Patakaron ke sath yahi ak vidambna hai wo sabke bare mein me likhte hain par apna khuch nahi bayan kar pate.Am i right sudhanshu?

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