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दुख-दर्द

हरामखोर है मुंबई पुलिस और निरीह हैं असली पत्रकार

मुंबई. मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योर्तिमय डे की हत्या को पुलिस प्रशासन ही नहीं, पत्रकारों को भी बहुत ही गंभीरता से लेनी होगी. इसके लिए सिर्फ पुलिस की ढिलाई को ही जिम्मेदार मानकर पत्रकार अपने कर्तब्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते. डे की दिनदहाड़े हुई हत्या ने साफ़ कर दिया है कि अपराधियों का मनोबल बहुत ज्यादा बढ़ चुका है. अब वे मीडिया तक को अपना निशाना बनाने लगे है.

मुंबई. मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योर्तिमय डे की हत्या को पुलिस प्रशासन ही नहीं, पत्रकारों को भी बहुत ही गंभीरता से लेनी होगी. इसके लिए सिर्फ पुलिस की ढिलाई को ही जिम्मेदार मानकर पत्रकार अपने कर्तब्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते. डे की दिनदहाड़े हुई हत्या ने साफ़ कर दिया है कि अपराधियों का मनोबल बहुत ज्यादा बढ़ चुका है. अब वे मीडिया तक को अपना निशाना बनाने लगे है.

आज भी मुंबई पुलिस पत्रकारों के मामले में गंभीर नहीं रहती. पत्रकारों ने बार-बार पुलिस से निवेदन किया है कि वे अपने पुलिस स्टेशन के अंतर्गत रहने वाले पत्रकारों की सूची पुलिस स्टेशन में रिकार्ड के तौर पर रखें, लेकिन आश्चर्य आज तक ऐसा नहीं हुआ. मैं इस बारे में सबसे पहले अपने बारे में बताना चाहता हूं. मैं कुरार विलेज पुलिस स्टेशन के क्षेत्र में करीब 30 साल से रहता हूं और पिछले 20 साल से पत्रकारिता से जुड़ा हूं, लेकिन कुरार पुलिस को इसकी जानकारी नहीं है. इतना ही नहीं, 19 नवम्बर 2002 को मैंने सबसे पहले साँझा लोकस्वामी में तेलगी स्कैंडल से जुड़ी खबर प्रकाशित की थी.

यहाँ इस बात को बताने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ यह है कि मुंबई पुलिस पत्रकारों के बारे में कितनी लापरवाह है. अगर किसी थाने में एक नया अधिकारी आता है तो वह वहां के विशिष्ट व सम्मानित लोगों के बारे में जानकारी रखने में अपनी उत्सुकता नहीं दिखाता क्योंकि उससे उन्हें कुछ लाभ होने वाला नहीं है. वह वहां के गैरकानूनी धंधों से जुड़े अड्डे, जैसे बियर बार, देशी दारु व मटका अड्डा, क्लब आदि की जानकारी रखने में ज्यादा रूचि दिखाता है. खैर, इस बारे में हम लोग फिर कभी बात करेंगे. आज हमारे एक ऐसे साथी पत्रकार की निर्मम हत्या हुई है जो, कभी अपनी लेखनी को किसी से डर कर रोका नहीं.

मुंबई में अपराधियों का मन बढाने के पीछे उन तथाकथित छुटभैय्ये पत्रकारों का सहयोग है, जो दो-पांच सौ रुपये के लिए घंटों शराब माफियाओं, मटका-क्लब के अड्डों पर खड़े रहते हैं. इतना ही नहीं दो पैग शराब के लिए रात भर उसकी वाचमैनी (पहरेदारी) करने से भी नहीं कतराते और इनके कर्मों का नतोजा जे डे जैसे निडर पत्रकारों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. तथाकथित पत्रकारों की लिस्ट अगर आपको देखनी हो तो मुंबई सबअर्ब के किसी भी ब्यूटी पार्लर या बियर बार वाले से पूछ लें. इनकी पत्रकारिता का वसूल ही हफ्ताखोरी है.

जेडे जी को असली श्रद्धांजलि यही होगी कि उसके असली हत्यारे तत्काल पकड़े जायें और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले. इसके साथ ही हमें भी उन तथाकथित खबरियों पर रोक लगानी होगी, जो पत्रकारिता को बदनाम करने की सुपारी लिए घूम रहे हैं.

विजय यादव

जर्नलिस्ट

मुंबई

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0 Comments

  1. Rahul Tiwari

    June 11, 2011 at 4:52 pm

    एक दम सही बात है जिस तरह से जे डे सर की हत्या की गयी उससे तो ये साफ हो गया है की मुंबई पुलिस बस दिखावे का काम करती है जिससे की लगे की वो बहुत अच्छा काम कर रही है लेकिन हकीकत तो ये है की वो छुट भैया बदमाशो को मार कर अपना पीठ थपथपाती है… अगर वो सच में अपने मुह मिया मिट्ठू बनाने की बजाय अपने काम को ईमानदारी से निभाए तो मुंबई से वाकई क्राइम ख़त्म हो जाये…. साथ आपने जो पत्रकारों के बारे में लिखा वो भी एक दम सही है… इसका शिकार तो हम लोग भी आये दिन मुंबई में होते रहते है…. जो की कई पत्रकारों का नाम प्रयोग कर के अपना उल्लू तो सीधा कर लेता है…. लेकिन उन पत्रकारों की क्रिया प्रधती पर कई सवाल खड़े हो जाते है जो की इन नकली पत्रकारों के शिकार हो जाते है…
    – राहुल तिवारी

  2. Piush Jain

    June 12, 2011 at 6:07 am

    sahi baat hai mumbai he nahi balki ambala mai bhi nakli patarkaron ki bhari bhid hai jo sirf 100-200 rupaye ke liye apna iman bech dete hai aur unki wajah se imandari se kaam karne wale patrkar badnaam ho jate hain aur apradhik tatvo ka shikar ho jate hain

  3. balveer vaid

    June 12, 2011 at 6:29 pm

    ap logo ki baten ekdam sahi hai.lekin mere dost j day ki hatya police ki mili bhagat se huyi hai .our jahan tak patrakaro ka sawal hai jinko akhbar ya channel paisa sahi vakt per nahi deta ve log ya to patrakarita ke sath-sath apna koi business karte hai ya fir yaha vahan se paisa lane ko majboor hote hai.yeh aap sab bhi jante hai .magar diya tale hamesha andhera hota hai.lekin kuchh aise bhi patrakar hai jo sirf blackmail our avaidh dhandha karne valo se paisa banane ke liye hi patrakar bane hai.unka education bhi nam matar ka hi hota hai .lekin aise patrakaro ko rok pane me govt.puri tarah nakam hai.jabki police aise dalal patrakaron ko sport karti hai.our sahi patrakarita karne walon ko mafiya our politician ke easare per jhute case me fansakar badla leti hai.durbhagya se unko bina sachayi jane hamari patrakar biradri doshi mankar turant muh fer leti hai.j day ki hatya sabak hai sachi patrakarita karne walon ke liye.
    lekin hum bhi kutte ki o tedi punchh hai jo kabhi sidhi nahi ho sakati.sach ki rah per chalne wale kabhi anjam ki perwah nahi karte.j dey ke hatyaron our unke pichhe ke badmaso ko unke anjam tak pahuchana hi sahi SHRADHANJALI hai. J Dey sahab amar hai.:(

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