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मेरे बेटे जेडे के हत्यारे जेल जाएं, यही मेरी आखिरी इच्छा : मां

ज्योतिर्मय डे को हत्या से पहले मुम्बई के बाहर बहुत कम लोग जानते होंगे। वे अपराध से संबंधित पत्रकारिता से जुड़े हुए थे। बीसियों बरसों तक हिंदुस्तान टाइम्स-इंडियन एक्सप्रेस वगैरह में काम करने के बाद पिछले चार वर्षों से मिड डे मुम्बई में थे। इसी दौरान उनकी दो पुस्तकें खल्लास..एन ए टू जेड गाइड टू द अंडरववर्ल्ड और जीरो डायल.. द डेंजरस वर्ल्ड ऑफ इन्फोर्मर्स आईं।

ज्योतिर्मय डे को हत्या से पहले मुम्बई के बाहर बहुत कम लोग जानते होंगे। वे अपराध से संबंधित पत्रकारिता से जुड़े हुए थे। बीसियों बरसों तक हिंदुस्तान टाइम्स-इंडियन एक्सप्रेस वगैरह में काम करने के बाद पिछले चार वर्षों से मिड डे मुम्बई में थे। इसी दौरान उनकी दो पुस्तकें खल्लास..एन ए टू जेड गाइड टू द अंडरववर्ल्ड और जीरो डायल.. द डेंजरस वर्ल्ड ऑफ इन्फोर्मर्स आईं।

ये दोनों पुस्तकें अंडरवर्ल्ड के रहस्यों का बेबाकी से खुलासा करती हैं.. ऐसी ही ज्योतिर्मय की पत्रकारिता थी। उनके निशाने पर अंडरवर्ल्ड और दाऊद इब्राहिम रहा और आतंकवाद  की चुनौतियों से जनता को जागरूक करने के काम में जुटे रहे। वे खुद मौकों पर जाते थे और घटना की गहराई में जाकर पाठकों को उसकी जानकारी देते थे। पिछले दिनों ही जब दिल्ली हाईकोर्ट के सामने विस्फोट हुआ तो उन्होंने खबर दी कि मुम्बई के कोर्टों की कितनी कम हिफाजत है और वहां कभी भी आतंकवादी घटना हो सकती है। पेट्रोल की कीमत में 5 रुपए लीटर की बढ़ोत्तरी हुई तो उन्होंने दस हजार करोड़ रुपए की तस्करी का सनसनीखेज भंडाफोड़ किया। डीजल की अंतरर्राष्ट्रीय तस्करी से लेकर उसकी आपूर्ति तक का रहस्योद्घाटन करके उन्होंने मुंबई को चौंका दिया। ओसामा बिन लादेन को मार दिए जाने के बाद उन्होंने कराची में रह रहे दाऊद के बारे में खोजपूर्ण खबर दी।

निश्चय ही, वे एक बड़े पत्रकार थे और अपराध से संबंधित पत्रकारिता का गुरु भी उन्हें कहा जा सकता है लेकिन वे तामझाम व पीत पत्रकारिता और सुविधाओं के पीछे नहीं भागते रहने के कारण विशुद्ध रूप से पत्रकारीय धर्म के निर्वहन और परिवार पोषण से जुड़े हुए थे। इसी महीने उन्हें ऑफिस के काम से फिलीपींस भी जाना था और हत्या वाले दिन वे उसी यात्रा के संबंध में कुछ कागजी कार्रवाई में लगे हुए थे तथा अपनी धर्मपत्नी को फोन किया कि आधे घंटे में घर पहुंच रहे हैं। वह आधा घंटा पूरा नहीं हुआ। पवई के भीड़ भरे इलाके में चार अपराधियों ने उन्हें गोलियों से भून दिया।

अब सवाल यह तो है कि ज्योतिर्मय की हत्या के पीछे कौन है.. अंडरवर्ल्ड, तेल माफिया या कथित पुलिस अधिकारी.. जिसकी शिकायत ज्योतिर्मय महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील से कर चुके थे और जिससे उन्हें धमकी मिली बताई जाती है। कहा जा रहा है कि मुम्बई के उस पुलिस अधिकारी ने दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पाटकर की मदद की थी; जबकि ज्योतिर्मय हसीना के खिलाफ लिखते रहे थे। ज्योतिर्मय ने उस अधिकारी के भ्रष्टाचार के सबूतों और एसीबी जांच रिपोर्ट के बारे में भी गृहमंत्री से बात की थी। इसके बाद अधिकारी को कम महत्व वाले पद पर लगाया भी गया। एक पूर्व इन्काउंटर विशेषज्ञ भी संदेह के घेरे में है। पुलिस और पत्रकारों के लिए ज्योतिर्मय की हत्या की गहराई में जाना जरूरी है। पुलिस के साथ-साथ मुम्बई के पत्रकारों को भी इस घटना के दोषियों का पता लगाने की मशक्कत करनी चाहिए।

ज्योतिर्मय की वृद्ध मां बीना ने यही सवाल उठाया है, ‘मेरे बेटे ने जीवन भर दूसरों के लिए संघर्ष किया.. अब उसके लिए कौन आगे आता है!’ उनका कहना है कि वे जब तक बेटे के हत्यारों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं देख लेतीं तब तक मरना भी नहीं चाहतीं। ज्योतिर्मय की मां जिस सवाल का जवाब चाहती हैं.. उसे पूरा करना पूरे समाज का दायित्व है.. पत्रकारों की भी बड़ी भूमिका है।

अभी राजस्थान पत्रिका ने घाना के जिन पत्रकार एनास आर्मेयाव एनास को के.सी. कुलिश अवार्ड दिया है.. वे एनास पुरस्कार लेने इसीलिए दिल्ली नहीं आ सके क्योंकि उनकी जान को खतरा है तथा विरोधियों ने उन्हें सरकार से धन लेकर पत्रकारिता करने जैसे आरोपों में फंसा रखा है। वे चेहरा ढंककर रहते हैं। भारत में भी पत्रकार ज्योतिर्मय की शहादत इन छह महीनों में तीसरी ऐसी घटना है। पिछले महीनों ही बिलासपुर प्रेस क्लब के महासचिव और दैनिक भास्कर के संवाददाता सुशील पाठक को गोलियों से भून दिया गया। वे ऑफिस से घर लौट रहे थे। उनके हत्यारों का पता नहीं लगाया जा सका। छत्तीसगढ़ सरकार ने वह मामला सीबीआई को जांच के लिए सौंपा है। नई दुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत को भी घर के बाहर नकाबपोशों ने गोली मार दी; अपराधी यह पर्चा छोड़कर गए कि उनके खिलाफ लिखोगे तो यही अंजाम होगा।

आरोप है कि उन्होंने आंखों के ऑपरेशन में की जाने वाली लापरवाही पर लिखा था। उस संबंध में गिरफ्तारियां भी हुईं लेकिन जब तक दोषीजनों को सजा नहीं हो, तब तक इन सबका विशेष अर्थ नहीं है। ज्योतिर्मय के बारे में महाराष्ट्र सरकार 48 घंटों में अपराधियों को पकडऩे का दावा कर रही थी.. जो पूरे हो चुके हैं। दूसरी ओर, हाल यह है कि अपराधियों के जारी किए गए स्कैच की सत्यता पर भी संदेह है। जिन प्रत्यक्षदर्शी की निशानदेही पर स्कैच बने हैं.. उनका कहना है कि बरसात और शीशे के अंदर से देखने के कारण वे हत्यारों को ठीक से पहचानने में असमर्थ हैं। यानी, हत्यारे पकड़ से दूर हैं और गहरी तफ्तीश की जरूरत है।

यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं है; हालांकि कोई भी हत्या कम गंभीर नहीं होती। लेकिन यह बड़ा विषय है कि ज्योतिर्मय पत्रकारिता के जिस पवित्र पेशे से जुड़े रहकर पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहे थे और उस अंडरवर्ल्ड की कारगुजारियां उजागर कर रहे थे; जिनसे पुलिस-प्रशासन भी खौफ खाता है। वे चाहते तो एसी रूम में बैठकर प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे जिंदगी बिता देते लेकिन नाम के अनुरूप ज्योतिर्मय को वह मंजूर नहीं था। वे समाज को सम्मानपूर्ण और सुखद बनाने के लिए ही अपराधियों और अपराधों का पर्दाफाश करते रहे.. वे सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहे बल्कि पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करने वाले पत्रकारों के प्रतीक बनकर सामने आए। इसलिए न केवल ज्योतिर्मय की हत्या का खुलासा होना चाहिए बल्कि उनके हत्यारों को सजा मिलने तक की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए।

समाज खासकर सरकार को यह सोचना चाहिए कि जान की बाजी लगाकर काम करने वाले पत्रकारों के प्रति उनका क्या कर्तव्य है। जिस तरह सैनिक युद्ध में देश के लिए जान देता है.. पुलिस सदैव अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए तत्पर होती है; उसी तरह, एक पत्रकार भी हर जोखिम लेकर सच्चाई को उजागर करता है। शेष दोनों की तरह पत्रकारों के पास हथियार भी नहीं होते.. पत्रकारों को हथियार चाहिए भी नहीं.. कलम ही उनका हथियार है और सदैव समाज के लिए समर्पित है। इसलिए उन पत्रकारों की रक्षा का दायित्व समाज और सरकार पर है।

यदि किसी पत्रकार की हत्या होती है.. हमला होता है या धमकियां दी जाती हैं तो समाज-सरकार को ज्यादा सचेष्ट होकर विषय को देखना चाहिए। ज्योतिर्मय को मिली धमकी के बाद यदि सरकार सावधान होती और ज्योतिर्मय की सुरक्षा का प्रबंध किया जाता तो इस अनहोनी से बचा जा सकता था। अपराध से संबंधित कवरेज करने वाले पत्रकारों को तो सदैव खतरों के बीच रहना ही पड़ता है; भ्रष्टाचार तथा अन्य प्रकार की अनियमितताएं उजागर करने वाले पत्रकार भी उसी तरह के खतरों से रूबरू रहते हैं। उनके बारे में.. उनकी सुरक्षा के बारे में और उनसे संबंधित कानूनों के बारे में विशेष रूप से सोचने की जरूरत है। भयमुक्त वातावरण बनाए जाने से ही पत्रकारिता के उद्देश्यों की पूर्ति हो सकेगी। शहीद पत्रकार ज्योतिर्मय डे को यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक गोपाल शर्मा पत्रकार हैं और महानगर टाइम्स से जुड़े हुए हैं.

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