लखनऊ की एक ख्यातिनाम शख्सियत हैं ज्ञानेंद्र शर्मा। पत्रकारिता के सहारे जीवन शुरू करने के बाद आज जिन्दगी के कई मुकाम तक अपनी खासी पैठ बना चुके हैं। राजनीतिक जुगाड़ इतना सटीक बैठा कि प्रदेश में सूचना आयुक्त की कुर्सी तक हासिल कर ली। पांच साल तक मौज की, और एक बार तो कार्यकारी मुख्य सूचना आयुक्त तक की कुर्सी गटक गये। परम्परानुसार अब फिर पैदल हैं।
मगर ख्वाहिशों की जो भीड़ इन्हें पत्रकारिता ने मुहैया करायी, वे अब तक कुलबुला रही हैं। सरकारी सुविधाएं भोगने के सुख की तड़प अब उन्हें प्रदेश के बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के चलते पाला-बदल पर मजबूर कर रही हैं। आज उनकी परेशानी का सबब बना है- सरकारी मकान। ज्ञानेंद्र शर्मा। यह नाम करीब ढाई दशक से खासा जाना-पहचाना रहा है। वे नवभारत टाइम्स में संवाददाता थे। लेकिन यह अखबार जब बंद हुआ तो वे भी दूसरों की ही तरह बेरोजगार हो गये। बाद के वर्षों में दैनिक जागरण जैसे अखबारों तक में रहे, लेकिन टप्पा पूरी तरह भिड़ नहीं पाया। दिल्ली तक में फिट हुए, मगर फिर बैक टू पवैलियन लखनऊ हो गये। राजनीतिक रिपोर्टों की जिम्मेदारी थी, सो मुलायम सिंह यादव की समाजवादी गैलरी में अपना भी झूला टांग लिया। फिर किस्मत का छींका फूटा राइट टू इनफार्मेशन की शक्ल में। दूसरों की तरह वे भी नवाजे गये सूचना आयुक्त की कुर्सी के तौर पर।
शुरुआती दौर में यह पूरा आयोग ही विवादों से घिरा रहा। जस्टिस एएम खान पर गंभीर आरोपों की झड़ी तक लग गयी। पक्षपाती फैसलों को लेकर आयोग के कई सदस्यों के कपड़े धूसर हो गये। मामला इतना तूल पकड़ा कि मायावती सरकार ने उन्हें आखिरकार विदा ही कर दिया। इस बार फिर ज्ञानेंद्र शर्मा की किस्मत का छींका फूटा, और वे कार्यवाहक मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी तक पहुंच गये। लेकिन ज्यादा समय तक वहां रह नहीं सके। वजह यह कि मायावती के एक करीबी को मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी थमा दी गयी। बहरहाल, इन सब बातों से अलग बात, ज्ञानेंद्र शर्मा के साथ एक खास बात यह रही कि वे इस कुर्सी के कार्यकाल के दौरान अपने साथी पत्रकार वीरेंद्र सक्सेना की ही तरह कभी किसी विवाद में नहीं रहे।
लेकिन विवाद अब शुरू हो गया है। दरअसल, ज्ञानेंद्र शर्मा को पत्रकार की हैसियत से ढाई दशक पहले राज्य सरकार ने एक आलीशान मकान आवंटित कर रखा था। सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त होने के बाद ज्ञानेंद्र शर्मा ने उस मकान को ही अपना सरकारी आवास बनाये रखा। इसके लिए उन्होंने सरकारी सम्पत्तियों की देखरेख करने वाले राज्य सम्पत्ति विभाग को लिखा कि इस मकान को ही उन्हें सूचना आयुक्त के पद नाम पर आवंटित कर दिया जाये। विभाग को इसमें कोई आपत्ति भला क्यों होती। हो गया काम।
मगर सूचना आयुक्त के पद से हटने के बाद ज्ञानेंद्र शर्मा को नियमत: यह मकान छोड़ना था। लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं। राज्य सम्पत्ति विभाग को उन्होंने अब लिखा है कि यह मकान उन्हें पुन: उसी शर्तों पर आवंटित किया जाए, जो सूचना आयुक्त के पूर्व यानी मान्यताप्राप्त पत्रकार के तौर पर लागू थीं। बस, अब यहीं से झंझट शुरू हो गया है। नियमावली के अनुसार ऐसा किया जा पाना मुमकिन ही नहीं है। वजह यह कि सूचना आयुक्त के अपने कार्यकाल के दौरान वे पत्रकार रह ही नहीं गये। उनकी पत्रकार के तौर पर मान्यता भी नहीं रह गयी है। राज्य सम्पत्ति अधिकारी अब परेशान घूम रहे हैं। फाइल इधर से उधर चक्कर खा रही है। ज्ञानेंद्र शर्मा भी राजनीति और अफसरशाही में अपनी लॉबी को सक्रिय किये हुए हैं। मगर फिलहाल बात बनती दिख नहीं रही है। किस नियम के तहत उनका यह अनुरोध माना जाए, कोई समझ ही नहीं पा रहा है। परेशानी की बात यह है कि अगर यह मकान उन्हें वापस दे भी दिया जाए तो भविष्य में यह हालत विभाग की हालत पतली कर देगा, क्योंकि भविष्य में फिर ऐसे मामलों में इसे नजीर के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगेगा।
फिलहाल, मामला रद ही समझिये।












rajbali
June 23, 2011 at 10:08 am
gyanendra jee jo mall swiss bank me jama kar rakha hai,use nikaliye