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ब्रिटेन में अखबारों की कीमत

अमिताभ मैं ब्रिटेन में अधिक अखबार तो नहीं पढ़ सका लेकिन रास्ते में स्टाल आदि पर अख़बारों को बाहर से जरूर देखा. अधिक अखबार इसलिए नहीं पढ़ सका क्योंकि अख़बारों की कीमत पौंड में होती है और हम हिन्दुस्तानी जो कुछ दिनों के लिए ब्रिटेन जाते हैं, चौबीसों घंटे एक ही चीज़ से बोझिल रहते हैं- पौंड और रुपये की आनुपातिक गणना.

अमिताभ मैं ब्रिटेन में अधिक अखबार तो नहीं पढ़ सका लेकिन रास्ते में स्टाल आदि पर अख़बारों को बाहर से जरूर देखा. अधिक अखबार इसलिए नहीं पढ़ सका क्योंकि अख़बारों की कीमत पौंड में होती है और हम हिन्दुस्तानी जो कुछ दिनों के लिए ब्रिटेन जाते हैं, चौबीसों घंटे एक ही चीज़ से बोझिल रहते हैं- पौंड और रुपये की आनुपातिक गणना.

इसीलिए यदि वहाँ एक सेव की कीमत साठ पेंस हुई (एक पौंड में सौ पेंस होते हैं) तो हमने तुरंत हिसाब लगाया कि एक पौंड में सत्तर रुपये तो इस हिसाब से साठ पेंस की कीमत बयालीस रुपये. इस तरह हम सोचते हैं कि क्या बयालीस रुपये का सेव खाएं और यह कार्यक्रम रद्द. हम लोगों के बहुत से कार्य इसी पौंड-रुपया के जोड़-घटाव में अवरुद्ध हो जाते हैं और स्वाभाविक है कि ऐसे में अखबार पढ़ना प्राथमिकता में बहुत नीचे चला जाता है.

इसके तीन प्रमुख कारण हैं. एक तो यह कि शायद मनुष्य की जरूरतों में अखबार का स्थान उतना ऊपर नहीं आता जितना अन्य तमाम बुनियादी जरूरतों का. दूसरा यह कि इंग्लैंड के अखबारों में यहीं की खबरें ज्यादा रहती हैं जिनसे हमारा विशेष लगाव या मतलब नहीं होता. अब मैनचेस्टर या कैम्ब्रिज या ब्रिस्टल में कहाँ एक्सीडेंट हो गया या बढ़ते तापमान से क्या समस्या आ रही है, इससे हिंदुस्तान के आदमी को कितना मतलब हो सकता है? तीसरी बात यह भी है कि समाचार के अन्य साधनों ने अब हमें अखबारों पर उस हद तक आधारित नहीं रखा है जितना शायद आज से दस-बीस साल पहले हम थे. इसीलिए जब मुझे कैम्ब्रिज के एक होटल में बैठे-बैठे मुझे इन्टरनेट पर भड़ास पढ़ने को मिल जा रहा है, अथवा हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार दिख जा रहे हैं या जागरण और प्रभात खबर से रूबरू हो जा रहा हूँ तो कोई जरूरी थोड़े ही है कि मैं इंग्लैंड का द टाइम्स या गार्जियन या टेलीग्राफ या द सन जैसे अखबार पढूं.

पर यहीं पर इस बात का भी अनुभव होता है कि कई सालों से अखबार पढ़ते-पढ़ते इसका भी कुछ इस तरह का नशा हो गया है कि यदि अखबार मिल जाए तो तुरंत ही उसे पढ़ने का दिल करता है. जब मैं मैनचेस्टर में था तो मेट्रो नामक एक अखबार हमारे कमरों में आता था और यहाँ कैम्ब्रिज न्यूज़ नामक अखबार आता है. मतलब यह कि इन्टरनेट, टीवी, फोन आदि ने अखबारों की भूमिका और महत्ता को काफी कम जरूर कर दिया है पर इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि इनके आने के बाद से अखबार महत्वहीन हो गए हैं. और कुछ नहीं तो रूम में पलंग पर या कुर्सी पर आराम से बैठ कर अखबार पकड़ कर पढ़ने और फिर धीरे से पन्ने पलटने का जो आनंद है वही अपने आप में अखबारों की प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए काफी है. फिर दूसरी बात यह भी कि अख़बारों में एक जगह से दूसरे जगह देखने में एक अलग किस्म की सहजता और आसानी होती है जो शायद इन्टरनेट पर नहीं हो पाता.

मैं जो मुख्य बात बताना चाहता हूँ वह है आम तौर पर इंग्लैंड में अखबारों की कीमत कितनी होती है? जहां तक मैं देख पाया हूँ यहाँ के महंगे अखबारों में द टाइम्स, द टेलीग्राफ आदि हैं जिनकी कीमत एक पौंड है. कुछ और अखबार होंगे जो इसी रेंज में होंगे. इसके अलावा ज्यादातार अखबार तीस पेंस से पचहत्तर पेंस के बीच कीमत के होते हैं. कैम्ब्रिज में जो कैम्ब्रिज न्यूज़ पढ़ रहा हूँ इसकी कीमत पचास पेंस (यानी आधा पौंड है).

एक और मजेदार बात जो मैंने यहाँ देखी वह यह कि कई सारे ऐसे भी अखबार होते हैं जो पूरी तरह फ्री होते हैं. मैनचेस्टर में मेट्रो अखबार ऐसा ही अखबार था जो हमारे कमरों में आता था. शायद पुलिस अकादमी वाले भी यह अखबार इसीलिए मंगाते हों चूँकि यह निशुल्क अखबार है. मैंने वहाँ एक और ऐसा अखबार देखा जिसकी कोई कीमत नहीं थी. मतलब यह कि ये अखबार पूरी तरह से एडवरटीजमेंट पर चलने वाले अखबार हैं. बस इनकी प्रसार संख्या बढाइये, अपने आप एड मिलने लगेगा और अखबार चल निकलेगा. जहां तक मैं जानता हूँ अपने देश में इस तरह के कंसेप्ट अभी शायद नहीं हैं. मेरी जानकारी में भारत में कोई भी निशुल्क अखबार नहीं है. यह तो ठीक है कि अपने देश में भी सारे बड़े अखबार काफी हद तक एड पर ही चलते हैं और उनकी कीमत उनकी असली लागत से काफी कम होती है, पर शायद पूरी तरह निशुल्क निकालने से अपने यहाँ लोग उसे बेकार का अखबार मानने लगें और कोई उसे लेने को तैयार ही नहीं हो.

अब अगर हम इन अखबारों की कीमत की तुलना अन्य साधारण चीज़ों से करें तो हम पाते हैं कि इंग्लैंड में औसतन चाय या कॉफी दो पौंड प्रति कप है, कई सारे चोकलेट एक पौंड में एक डिब्बा है, पूरे दिन का एक शहर में बस का टिकट पांच पौंड है और एक यात्रा का डेढ़ से दो पौंड. फैशन वाले चश्मे पांच से दस पौंड के मिलते हैं और टाई पन्द्रह से बीस पौंड में. साधारण छाता पांच पौंड में और शर्ट बीस-तीस पौंड में. अतः आप परस्पर दामों की तुलना कर के आंक सकते हैं कि ब्रिटेन वाले अपने अखबारों को कितना अधिक या कम महत्व देते हैं. यह मैंने जरूर पाया कि वहाँ भी लोग अखबार खूब खरीदते हैं, खास कर बुजुर्ग लोग.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं. इन दिनों पुलिस प्रशिक्षण के लिए इंग्‍लैंड में हैं.

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0 Comments

  1. BIJAY SINGH

    July 3, 2011 at 6:33 am

    INformative,keep posting. thanks.

  2. Ankit Khandelwal

    July 3, 2011 at 9:45 am

    Amitabh ji,
    England world ka pehla country hain.. Jeha per aakhbaraon ne internet per padne ke liye charge karna shuru kar diya hain..

  3. abhinav

    July 3, 2011 at 2:11 pm

    iNformative,ke liye thanks

  4. abhinav

    July 3, 2011 at 2:11 pm

    very good

  5. Manish Kumar Pandey

    July 4, 2011 at 6:16 am

    अमिताभ सर
    मेरे बाप दादा तो कभी ब्रिटेन नहीं गए थे
    और मुझे भी ये सौभाग्य नहीं मिल सकता
    हलाकि मेरी इच्छा बहुत है विदेश जाने की |
    पर पत्रकार बने रहने पर ये सम्भावना थोड़ी कम है
    पर आपके इस लेख को पढकर अजीब तरह
    की संतुस्ती मिल रही है , जैसे मै ब्रिटेन
    घूम के आ गया ,
    धन्यवाद आपको
    मेरी तरफ से और मेरे पुरखो की तरफ से
    जिसकी वजह से मुझे ये सुख प्राप्त हुआ
    मनीष कुमार पाण्डेय
    http://www.pardaphash.com

  6. SANJAY SINHA

    July 4, 2011 at 4:06 pm

    Brother Amitabh: Nicely written.Informative.Sitting in Goa I am getting fervour of Manchester.Thnx.

    SANJAY SINHA
    MANAGING EDITOR
    GOA SAMACHAR NETWORK

  7. Anil Pande

    July 4, 2011 at 7:22 pm

    Free Ka Newspaper, nothing new.

    Last year TIN LAKH Indian tourist Britan Gaye, Bahut log in Baaton ko Jante Hain, jo aap bata rahe hain.

    UP Ki Police aur Britain ki Police par Kuch Comparative Baten Likhiye .

    Aap wahan kis Tarah ki training le rahe hain. Iska India ke Police system ko Kya Fayada hoga, ye Jankari dein to Nayi Baat hogi.

    Pl. remember , you are enjoying tax payer’s money.

  8. dhiraj

    July 5, 2011 at 7:17 am

    apko nahi pata hai ki bharat me koi bhi akhbar ek rupee se kam m e nahi bik sakata hai. aisa press counsil of india ne jari kiya hai. aisa chote akhbaro ka astitwa khatm na ho jaye islie kiya gaya hai. tv ke aane ke bad bhi aaj bhi logo ka viswas akhbaro par hai. pahale 1 lakh pathak the to ac karod me hai. apka sochana galat hai. Ips hone ka matlab nahi hai ki aap jo kahenge ya samiksha karenge wo sahi hi hoga. kitne logo ke pas cable hai. kaha bijali rahati hai, kitane pratisat log tv dekh pate hai aap ko is par bhi dimag lagana chahiye. 9675202434

  9. Mohit

    July 8, 2011 at 10:45 am

    India also had a free newspaper named “ERGO”, a part of THE HINDU GROUP.
    Ergo was an Indian daily newspaper which was published during 2007–2009 by Kasturi & Sons, the publishers of the newspaper The Hindu. It was published in tabloid format and distributed free of cost to Information Technology professionals in the software corridor of Chennai. At its peak, it had a circulation of 55,000 and a readership of 100,000. It ceased publication from 1 August 2009 and is currently available only online.

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