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मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता

दिनेश चौधरी अगर मेरी याददाश्त धोखा नहीं दे रही है तो ये अनमोल वचन अशोक वाजपेयी के हैं, जो एक जमाने में खूब चर्चित व विवादित रहे थे। प्रसंग ‘भारत-भवन’  में होने वाले किसी आयोजन का था, लेकिन चंद दिनों पहले ही भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई थी और इसी के मद्देनजर चंद अखबारनवीसों की आपत्तियों का अशोक वाजपेयी जवाब दे रहे थे। अखबारों में यह विवाद काफी दिनों तक चलता रहा था।

दिनेश चौधरी अगर मेरी याददाश्त धोखा नहीं दे रही है तो ये अनमोल वचन अशोक वाजपेयी के हैं, जो एक जमाने में खूब चर्चित व विवादित रहे थे। प्रसंग ‘भारत-भवन’  में होने वाले किसी आयोजन का था, लेकिन चंद दिनों पहले ही भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई थी और इसी के मद्देनजर चंद अखबारनवीसों की आपत्तियों का अशोक वाजपेयी जवाब दे रहे थे। अखबारों में यह विवाद काफी दिनों तक चलता रहा था।

भारत-भवन सरकारी नियंत्रण (जो इन दिनों कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है) वाली एक संस्था है और इसलिए ही सार्वजनिक तौर पर जब कोई आयोजन हो तो आम जनता के प्रति उसकी जवाबदेही तो बनती ही है। खासतौर पर तब जबकि भोपाल गैस हादसा महज एक आम औद्योगिक हादसा नहीं था बल्कि इसके साथ सरकार की भूमिका, नौकरशाहों की संवेदनहीनता व तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों के प्रति बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सोच व दृष्टि से संबंधित कई सवाल जुड़े हुए थे। फिल्मी दुनिया के सितारे अक्षय कुमार जब इस हत्यारी कंपनी के एक उत्पाद का विज्ञापन करते हैं तो पता नहीं कि उन्हें इनका इतिहास मालूम होता है अथवा नहीं। वैसे भी इस बात की उम्मीद करना एक तरह से मूर्खता ही होगी कि फिल्मी अथवा क्रिकेट की दुनिया का सितारा विज्ञापन से पहले अपने उत्पादों की गुणवत्ता या कंपनी के इतिहास की जांच कर ले। हां, ऐसे कलाकार जिनके थोड़े बहुत सामाजिक सरोकार रहे हों, उनसे आप कुछ उम्मीद तो कर ही सकते हैं, लेकिन यह संकेत आमिर खान की ओर नहीं है जो एक ओर तो मेधा के अनशन में आ धमकते हैं और दूसरी ओर कोकाकोला का विज्ञापन भी करते हैं।

यह सवाल मुझे दो संदर्भों के कारण उठाना पड़ रहा है। पहला तो यह कि जंतर-मंतर में अन्ना के अनशन के दौरान अनुपम खेर भी आंदोलन के समर्थन में आए और मंच से भाषण भी दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर से अपील की कि वे इस आंदोलन के समर्थन में अपना मुंह खोलें। अमिताभ काफी पहले ”बाबूजी”  की छाया से मुक्त हो चुके हैं और युवा विद्रोही की उनकी छवि भी पहले ही भंग हो चुकी है। वे महज लालची और कायर बूढे़ हैं (हालांकि वे कह सकते हैं, ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप!’) जो बिना बात के ठाकरे वगैरह से माफी मांग लेते हैं और सीमेंट-साबनु से लेकर न जाने क्या-क्या बेचते फिरते हैं। वे भीड़ का रुख देखकर अपनी दिशा तय करते हैं और ट्वीटर में ही सही अपना मुंह खोल लेते हैं। धंधे के मामले में ”भारत-रत्न” सचिन तेंदुलकर अमिताभ से एक कदम आगे हैं और वे केवल व केवल अपना व्यवसाय ही देखते हैं। पता नहीं अनुपम खेर ने उनसे भ्रष्टाचार जैसे नाजुक विषय पर बोलने की अपेक्षा ही क्यों रखी जो किसी भी सरकार को नाराज कर सकता हो।

दूसरा संदर्भ ताजा व नवीनतम है, जिसके कारण मुझे यह सब लिखना पड़ रहा है। कल एक न्यूज चैनल ने ”बॉलीवुड के बेशर्म”  शीर्षक से एक खबर चलायी जिसमें शाहरूख खान, कैटरीना कैफ, करण जौहर वगैरह की जम कर खिंचाई की गयी। कहा गया कि ये बेशर्म कलाकार इतने संवेदनहीन हैं कि अपने घर ”मन्नत”  में जन्म-दिन की पार्टी में नाचते-गाते रहे जबकि दो दिनों पहले ही मुंबई के सीरियल ब्लास्ट में कितने ही मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कई अस्पताल में पड़े हुए कराह रहे हैं। न्यूज चैनल ने इन सितारों के दोगलेपन की भी पोल खोली जो ट्वीटर में एक बात लिखते हैं और वास्तविक जीवन में इसके ठीक विपरीत काम करते हैं।

सितारों की इस आलोचना में कोई बुराई नहीं है। खासतौर पर हिंदुस्तान जैसे मुल्क में जहां इन छद्म सितारों को अचानक भगवान का दर्जा दे दिया जाता है। जब आप अपना नायक गढ़ते हैं तो जाहिर है कि उनमें समस्त मानवीय खूबियों- बल्कि मानवेतर खूबियों -को तलाशने की जुगत में लगे रहते हैं। ये बात और है कि इन दिनों नायकों को गढ़ने का काम भी इसी मीडिया का होता है, जो पलक झपकते ही साधु को शैतान भी बना सकता है। बहरहाल असली सवाल यह है कि जब मुंबई में इतने लोग मारे गये हों तो क्या सितारों को अपने घर में नाच-गाना करना चाहिये? बिल्कुल नहीं करना चाहिये।

लेकिन एक सवाल यहीं पर और खड़ा होता है कि सितारों के दोगलेपन पर सवाल उठाने वाले न्यूज चैनलों को क्या एक बार अपने गिरेबान में भी झांककर नहीं देखना चाहिये? जिस समय मुंबई में ब्लास्ट की खबर ब्रेक हुई मारे उत्तेजना के एंकरों के गले चिंचिया रहे थे। इसमें कहीं कोई दुःख, आक्रोश या पीड़ा नहीं थी, बल्कि हमेशा की तरह सिर्फ एक बड़ी खबर मिलने और उस खबर पर जमकर खेलने की संभावनाओं का व्यावसायिक उत्साह था। ”विचलित करने वाली”  लाशों की तस्वीर थी और इन्हीं तस्वीरों के बीच केश निखार तेल व तवचा को चमकाने वाली क्रीम बदस्तूर बेची जा रही थी। नाचने-गाने वाले रियलिटी शो को किसी चैनल ने रद्द नहीं किया। नेता हमेशा की तरह एक -दूसरे को गरियाते रहे। लॉफ्टर शो की कथित कॉमेडी में अश्लीलता व फूहड़ता की मात्रा में कोई कमी नहीं आयी थी और अर्चना पूरन सिंह के ठहाकों का घनत्व भी कम नहीं हुआ था। सास-बहुएं एक दूसरे के विरूद्ध पारंपरिक षड़यंत्र में पूरे उत्साह से लगी हुई थीं और एक भी चैनल ऐसा नहीं था जिसमें बिना तबले के सारंगी बज रही हो। ऐसे में फकत मन्नतवासियों को गरियाने से क्या फायदा?

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Dhananjay Jha

    July 19, 2011 at 12:18 pm

    Respected Sir..
    your view is remarkable. now its for media for introspection.

  2. sikander hayat

    July 19, 2011 at 3:18 pm

    dinesh sahab jese bahut hi kam lekhak or log bache ha ye amulay ha

  3. चंदन कुमार मिश्र

    July 19, 2011 at 5:47 pm

    दिनेश जी,

    इस आलेख को पढ़ने से मन दुखी हो गया। मेरे मन तक पहुँचने वाले कम ही आलेख होते हैं। यह अन्दर चला गया। ज्यादा नहीं कह सकता। एक आलेख इस आलेख को ध्यान में रखकर लिखना होगा। आपको क्या कहें? इस बार कुछ खास नहीं होते हुए भी आलेख ने बेध दिया है।

  4. दिनेशराय द्विवेदी

    July 19, 2011 at 6:06 pm

    सारी नसीहतें औरों के लिए होती हैं।

  5. abhishak gupta

    July 19, 2011 at 8:52 pm

    ** हर मौत छोड़ जाती है जिंदगी का सबक —-
    ’’मुर्दो के साथ कोई मर नही जाता’’ समाज के बीच पनप रही असंवेदना एवं एवं व्यवसायिकता का चित्रण है। प्रत्येक सामाजिक प्राणी से ये आपेक्षा नैसर्गिक है कि आप समाज के अन्य वर्ग के दर्द और उसकी टीस को महसूस करे यह आपकी
    जिम्मेदारी नही आपका चरित्र है आपकी आत्मिक आवाज है जो आपकों सामाजिक प्राणी एवं मनुष्य का दर्जा दिलाती है।
    मुबंई बम विस्फोट में मारे गये निर्दोषों के प्रति समाचार पत्रों या फिल्मी कलाकारों की आसंवेदना या व्यवसायिकता खेदजनक है। मुबंई सहित देश के अन्य हिस्सों में लगातार हो रहे नरसंहार जनमानस को झकझोर
    देने वाले है। देश की आजादी के 6 दशक बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये कौन सी आलोकतांत्रिक लड़ाई चल रही है। जिसे हमारा वर्तमान समाज न तो समझ पा रहा है। और न ही उसे शांत करने की दिशा में कोई कदम उठा रहा है मुंबई में बम विस्फोट की यह पहली घटना नही देश की व्यवसायिक राजधानी ने कई बार ऐसे धमाकों की चीखों को झेला है। ऐसी घटनाओं से उबरने के लिए हम समी हर बार पूरे साहस और मनोबल के साथ फिर उठ खड़े होते है। जिंदगी फिर पुराने ढर्रे से चलने लगती है। देश का सेन्सेक्स फिर नई उचॉंईयॉं छूता है। परंतु ऐसी घटनाओं से मिलने वाले सबक को भूल जाते है। यह सबक है। देश में व्याप्त आर्थिक असमानता का, धार्मिक विषमता का,अशिक्षा एवं अंधविश्वास का, बाहरी हस्तक्षेप का, सुरक्षा में चूक का, हमारे विफल सुरक्षा तंत्र का, हमारी असावधानी का, आलोकतांत्रिक आसामाजिक शक्तियों के समाज में सक्रिय होने का। यदि हम इस सबक को याद
    रखे तो शायद ऐसी कोई मौत न हो।

  6. vipin sharma

    July 24, 2011 at 11:15 pm

    abhishak ji bahut khoob…………………. vary nice;D

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