दैनिक भास्कर, शिमला पिछले दो माह से बिना संपादक के चल रहा है। देश के सबसे तेज बढ़ते अखबार को शिमला के लिए कोई संपादक नहीं मिल रहा। भास्कर में यूं तो संपादकों की फौज है, मगर शिमला के लिए अखबार को सस्ता संपादक चाहिए जो कम से कम पैसे में काम चला सके। अखबार ने 2008 में शिमला को फुल एडिशन का दर्जा दिया था।
यहां पहले संपादक के तौर पर मुकेश माथुर ने ज्वाइन किया था। उनका बजट 3 प्लस था। इसके बाद कीर्ति राणा को शिमला भेजा गया था मगर उनका बजट 4 प्लस था। यही बजट उनकी विदाई का कारण बना। प्रबंधन को शिमला के लिए ऐसा संपादक चाहिए जो 35 हजार से अधिक की मांग न करें। इसके लिए अखबार ने कई लोगों से बात की मगर किसी ने जाने के लिए हामी नहीं भरी। मजबूरन प्रबंधन ने दूसरी यूनिट के लोगों को बारी-बारी से शिमला भेजा।
सबसे पहले जालंधर से डिप्टी न्यूज एडिटर चंदन स्वप्निल को भेजा, जो एक सप्ताह काम करने के बाद वहां से दौड़ गए। उसके बाद अमृतसर के प्रभारी रणदीप वशिष्ट को भेजा, 15 दिनों के बाद उन्हें भी वापस बुलाया गया। हाल ही में बठिंडा के प्रभारी रह चुके चेतन शारदा को शिमला भेजा मगर उनका बजट 6 प्लस था इसलिए वह भी लौट गए। अब आलम यह है कि शिमला भास्कर बिना प्रभारी के चल रहा है। ऑफिस में अब हर कोई बॉस की भूमिका में है।
ब्यूरो प्रभारी प्रकाश भारद्वाज और डेस्क इंचार्ज ब्रह्मनंद देह्लरानी दोनों अपने को बॉस मान कर टीम पर रौब झाड़ रहे हैं। कुल मिलाकर ऑफिस कई गुटों में बंट गया है। अखबार से क्वालिटी की खबरें नदारद हैं और प्रसार संख्या तेजी से गिरती जा रही है। प्रबंधन ने समय रहते अगर कोई उपाए नहीं किया तो शिमला में भास्कर ढूंढे नहीं मिलेगा।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












amit sharma
July 22, 2011 at 6:21 am
yashwant ji, yaha aavedan karne k liye kisse sampark kiya jaaye kripya unka ph. no. aur id provide kara dijiye.
amit sharma
July 22, 2011 at 2:21 pm
shimla me kaha ka edition aata hai?
r rajput
July 23, 2011 at 7:54 am
hame bana do simla ka sampadak. hum tayyar hai.
harish bhamaniya
August 30, 2011 at 11:43 am
good evening yashwant ji.
dinbhar job ke liye bhaga ,thak haar kar computar ke samne bhethha or. bhadas pdhaa ,
plz sir mai shimla ja sakta hun salery aap tai kare
thanks; bura na manna berojgar hun