पटना के एक बड़े हिन्दी अखबार में काम करने वाले पत्रकार इन दिनों बेबसी का घूंट पीकर काम कर रहे हैं। कारण उनके ब्यूरो चीफ की तुगलकी अदा है। इसी अखबार के एक दूसरे एडिशन में कभी संपादक रहे इस ‘बंधु’ को पटना बुला लिया गया और ब्यूरो चीफ की उस कुर्सी पर बैठा दिया गया जो पूर्व में एक कद्दावर ब्यूरो चीफ के रिजाइन देने से खाली पड़ा था।
पटना ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद से ही इस बंधु ने बेहयायी की सारी हदें पार कर अपने जलवे दिखाने शुरू कर दिए। कोई दिन ऐसा नहीं जब ब्यूरो और सिटी डेस्क पर काम करने वाला कोई पत्रकार ब्यूरोचीफ से गालियां नहीं सुनता हो। अगर कोई पत्रकार उन्हें देखकर प्रणाम न करने और कुर्सी से खड़ा न होने की भूल करता है तो तुरंत उसे गर्दन में हाथ डालकर बाहर का रास्ता दिख देने की धमकी दी जाती है। खुद तो अनुभवहीन हैं पर ‘राजदरबार’ से ताल्लुक रखने वाले इस ब्यूरोचीफ पर अखबार का प्रबंधन भी मेहरबान रहता है।
यहां तक की इस ब्यूरो चीफ से इस अखबार के संपादक भी घबराते हैं और कई अवसरों पर तो संपादक को इस ब्यूरो चीफ के पीछे खड़ा देखा गया है। ब्यूरो चीफ की करतूतों और उनके द्वारा आए दिन किसी न किसी को बेइज्जत करने की घटना से यहां काम करने वाला हर पत्रकार आहत है। डर यह है कि कहीं अंदर ही अंदर सुलग रहे पत्रकारों का गुस्सा एक दिन उबाल पर न आ जाए और वह घटना न घट जाए जिसकी संभावना काफी दिनों से दिखायी दे रही है।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












rakesh. patna
July 23, 2011 at 8:20 am
भाई यशवंत जी,
आपकी दिलेरी की दाद देनी पडे़गी। तीन साल पूर्व के मामले की सत्यता को आपने जिस तरह से सामने रखा वह नीतीश सरकार और पटना पुलिस के चेहरे को भी सामने ला रहा है। आखिर क्या कारण है कि पटना पुलिस ने अबतक हिन्दुस्तान से पेमेंट नहीं लिए। क्या सरकार, पटना पुलिस और हिन्दुस्तान प्रबंधन में कोई गुप्त समझौता हो गया है क्या। इसी कारण हिन्दुस्तान सरकार और पटना पुलिस की चाटुकार और दलाल बनी है। खैर छोड़िये जिस अखबार का संपादक मोटरसाइकिल पर बैठ कर डीजीपी से मिलने के लिए उतावला हो वैसे अखबार और संपादक के क्या कहने। कभी वह दिन था कि मुख्यमंत्री और डीजीपी हिन्दुस्तान जैसे अखबार के संपादक से मिलने के लिए टाइम मांगा करते थे और आज ऐसा दिन हो गया कि हिन्दुस्तान जैसे अखबार का संपादक मुख्यमंत्री को अपना चेहरा दिखाने और रिपोर्टिंग के लिए वैसी सभा में पहुंच जाते हैं जिस सभा की कवरेज के लिए उनका अदना सा रिपोर्र्टर ही काफी हो। मैंने आपके पोर्टल पर ही सिकरिया (जहानाबाद) की खबर पढ़ी थी कि किस तरह अकु श्रीवास्तव को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में पुलिस वालों ने धक्का देकर मंच से पीछे कर दिया था। पुनीत खंडेलिया ने अच्छा किया की हिन्दुस्तान छोड़ दिया। अब तो सवाल पटना पुलिस पर उठनी चाहिए कि आखिर उसने हिन्दुस्तान से अपने बकाए रुपये अबतक क्यों नहीं वसूले। पटना पुलिस को चाहिए कि इस मामले में वह हिन्दुस्तान की मालकिन शोभना भरतीया सहित जिम्म्ेवार पोस्ट पर बैठै सभी लोगों पर एफआईआर करे। पुनीत खंडेलिया ने अगर हिन्दुस्तान के लेटर हेड पर पत्र दिया तो भूगतान की जिम्मेवारी उनकी नहीं बल्कि प्रबंधन की है। खैर मैं डीजीपी और पटना पुलिस के वरीय अधिकारियों से आरटीआई के तहत यह जानकारी मांग रहा हूं कि आखिर किन परिस्थितियों में पुलिस ने इस मामले में अबतक कोई कार्रवाई नहीं की। आपको उस वरीय पत्रकार का नाम भी सार्वजनिक करना चाहिए था जिसके दबाव में पुलिस ने मामले को दो साल तक दबा कर रखा।
gopal raj
July 25, 2011 at 7:08 am
vinod vandhu ke bare me sabhi jante hain ki patrkarita ki maryadaon ka nirvahan karte huye unhone bihar ke ek jile se apani pari shuru kar desh ke vibhinna shahron prtishtha arit ki hai. filhal hindustan patna ke beauro chief ke rup me khabron me nispakshata aur tewar dikhate rahte hain. lekin jahan nihit swarth walon ki sankhya jyada ho wahan unke vishay me bhramak baten aani acharaj nahi paida kartin. ho sakta hai ye baaten shirshbko bharmane liye failaee ja rahi ho lekin apni rah swaym banakar us par chalne wala aisi baaton ki kya parwah karega . go ahed vandhu ji.
anurg anal
July 25, 2011 at 7:15 am
bhramak report
dharmedra kumar
July 25, 2011 at 7:28 am
this is in house struggle only
Gopal Kumar
July 25, 2011 at 7:59 am
ये अखबार के असंतुष्ट लोगो द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम है । बंधु जी निर्भिक और निष्पक्ष पत्रकार हैं तथा कोमल स्वभाव के हैं । ऐसे लोग अफवहों और भ्रम से घबराते नहीं है । संस्थानहीत में हीं लगे रहते है ।