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हिंदी जन्‍म से ही आधुनिक है : अशोक वाजपेयी

मुजफ्फरपुर : राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” और आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की कर्मभूमि बीआर अम्‍बेडकर बिहार विश्‍वविद्यालय में एक बार फिर  साहित्यिक गतिविधियां शुरू हो गयी है. हिंदी विभाग ने महान साहित्यकारों और कवियों के शताब्दी वर्ष पर ऐसा आयोजन किया है, जिससे लग रहा है कि विश्‍वविद्यालय को इन कवियों की कर्म भूमि होने पर गर्व है.

मुजफ्फरपुर : राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” और आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की कर्मभूमि बीआर अम्‍बेडकर बिहार विश्‍वविद्यालय में एक बार फिर  साहित्यिक गतिविधियां शुरू हो गयी है. हिंदी विभाग ने महान साहित्यकारों और कवियों के शताब्दी वर्ष पर ऐसा आयोजन किया है, जिससे लग रहा है कि विश्‍वविद्यालय को इन कवियों की कर्म भूमि होने पर गर्व है.

मंगलवार को इस आयोजन का उद्घाटन प्रख्यात आलोचक अशोक वाजपेयी ने करते हुए कहा कि हिंदी जन्म से ही आधुनिक है. कबीर और तुलसी के अलावा  छायावादी कवियों ने इसे अपने-अपने ढंग से आधुनिक किया. अशोक वाजपेयी ने आगे कहा कि अज्ञेय में आत्मदान की, शमशेर में सौंदर्य की और मुक्तिबोध में अंतःकरण की अवधारणाएं हैं. श्री अशोक वाजपेयी ने कहा कि मनुष्‍य का स्वाभाव है कि वह जब स्वतंत्र होता है तो वह किसी न किसी को गुलाम बनाता है.  आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास सौ साल पुराना है. इसने ही मुक्ति की अवधारणा को प्रतिपादित किया है. इस अवधारणा को स्वतंत्रता में बदलने का काम महात्मा गाँधी ने किया.

मुख्य वक्ता दिल्ली विश्‍वविद्यालय हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गोपेश्वर ने कहा कि कविता मुक्ति का स्‍वप्न देखने का नायाब जरिया है. मुक्ति यानी मोक्ष का आदिम स्वप्न है, जो तमाम रुढि़यों से मुक्त होने का स्वप्न देखते हैं.  उन में कवि पहले होते हैं. भारतेंदु युग १८५०-१९०० पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए श्री गोपेश्वर ने प्रसिध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा,  डॉ. विजयदेव नारायण शाही और डॉ.नामवर सिंह की आलोचना शैली पर प्रकाश डाला.

बुधवार को सेमिनार के समापन समारोह में प्रसिद्ध आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि कव्य चेताना कवि के जीवन का यथार्थ है और विचारधाराएं यथार्थ को को बदलने की शक्ति रखती हैं.वहीं कवि समाज के साथ संवाद कर सकता है जो नियमित सकारात्मक सोच के साथ रचनाएं गढ़ता है. अपनी इन खूबियों के कारण महाकवि नागार्जुन आमजनों के बीच लोकप्रिय रहे. नागार्जुन संस्कृत के उदभट विद्वान थे और भारत की सांस्‍कृतिक परम्‍पराओं ममर्ज्ञ भी. किन्तु उन्होंने अपनी शास्‍त्रबद्धता नहीं लोकधर्मिता का साथ दिया.

अशोक वाजपेयी ने अज्ञेय को परम्परा को आत्मसात कर प्रयोगवाद को स्थान देने वाला अद्वितीय कवि बताया. शमशेर के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि शमशेर  सौंदर्य और संघर्ष के खेमे में रहने वाले कवि नहीं है. बल्कि नए जीवन के के अनुभवों को नयी अभिव्यंजना देने वाले सशक्त कवि हैं. डॉ.गोपेश्वर ने शमशेर को समग्रता का कवि कहा. डॉ.विजेंद्र नारायण सिंह ने शमशेर को आत्मीय हिंदी कविता का सबसे बार कवि बताया. डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव के शब्दों में शमशेर  मुक्ति का स्वप्न देखने वाले इमानदार कवि थे.

डॉ नंद किशोर नंदन ने नेपाली को सामाजिकता और संघर्षशीलता का कवि बताया. सेमिनार में डॉ. रेवती रमण, बलराम मिश्रा ने अपने-अपने विचार रखे. सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकारों के इस जन्मसती समारोह के आयोजन का सही श्रेय बी.आर अम्‍बेडकर विश्‍वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र मिश्रा, युवा प्राध्यापक कल्याण कुमार झा, डॉ.सतीश कुमार रॉय, डॉ. त्रिविक्रम नारायण सिंह और हिंदी विभाग के विभागाध्‍यक्ष डॉ. रामप्रवेश सिंह को जाता है. इस आयोजन को पूर्णतः साहित्यिक दायरे में रखा गया. राजनीतिज्ञ इससे दूर रहे. अखबारों के संवादाताओं ने अच्‍छी रिपोर्टिंग की. पर संपादकों ने प्रथम पृष्‍ठ पर इस आयोजन को स्थान नहीं दिया. जबकि सभी हिंदी अखबारों के संस्करण यहाँ से निकलते हैं.

मुजफ्फरपुर से प्रमोद की रिपोर्ट.

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