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राजस्थान में नए अखबारों की अफवाहों का दौर, जो निकले वे भी नाकाम रहे

उत्तर प्रदेश हो मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल हो या बिहार इन सभी हिन्दी भाषी बाहुल्य प्रदेशों में किसी ना किसी नए हिन्दी अखबार का पदार्पण और पुरानों में विस्तार के नाम पर वर्चस्व की जंग मची रहती है। यह तब है जब इन प्रदेशों की स्थानीय भाषाएं भी व्यापक प्रभावी हैं।

उत्तर प्रदेश हो मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल हो या बिहार इन सभी हिन्दी भाषी बाहुल्य प्रदेशों में किसी ना किसी नए हिन्दी अखबार का पदार्पण और पुरानों में विस्तार के नाम पर वर्चस्व की जंग मची रहती है। यह तब है जब इन प्रदेशों की स्थानीय भाषाएं भी व्यापक प्रभावी हैं।

इसके उलट राजस्थान जहां मेवाड़ी, मारवाड़ी, हाड़ौती, ढूंढांडी, मायड़ आदि दर्जन भर राजस्थानी भाषाओं के बीच हिन्दी एक सर्वमान्य, सर्वसुलभ और जनभाषा है, वहां आए दिन किसी ना किसी नए अखबार के आने का खूब हल्ला मचता है परंतु फिर बुलबुले की तरह वह कब फट जाता है, पता ही नहीं चलता। इस हल्ले के बीच पत्रकारों की बिरादरी उस नए नवेले के विमोचन और खुद के उसका हिस्सा बनने का बेसब्री से इंतजार में जुट जाती है। कुछ जिनके संपर्क राजस्थान से बाहर के पत्रकारों से हैं, जानकारी जुटाने में रत हो जाते हैं परंतु परिणाम ढाक के तीन पात से आगे नहीं जा पाता।

एक समय था तब राष्ट्रदूत राजस्थान का सबसे बड़ा अखबार हुआ करता था। कर्पूरचंद कुलिश की शुरुआत यहीं से हुई थी। नवज्योति कभी राजस्थान में नंबर एक नहीं रहा। राष्ट्रदूत धीरे-धीरे सिमटता चला गया और राजस्थान पत्रिका नंबर वन हो गया। नवज्योति कुछ समय के लिए तीसरी पायदान पर पहुंचा फिर बाद में वापस नंबर दो पर आ गया। 1996 में भास्कर आने तक पत्रिका नंबर एक ही रहा परंतु भास्कर की कड़ी टक्कर ने उसे पीछे धकेल दिया। अब पिछले पंद्रह साल से दोनों अपने को नंबर वन साबित करने की लड़ाई में जुटे हैं। कुछ गिनती के पत्रकारों को छोड़ दीजिए तो आम पत्रकार कभी अच्छी दशा में नहीं रहा।

भास्कर आने के बाद कई पत्रकारों ने पाला बदला और अपने पुराने अखबार छोड़कर भास्कर में आ गए। भास्कर से दस साल पहले नवभारत टाइम्स जयपुर से सफलतापूर्वक चल निकला था परंतु अपना विस्तार नहीं करने के कारण वह पांच संभाग मुख्यालयों से छप रहे पत्रिका का मुकाबला नहीं कर पाया। नवभारत टाइम्स की तालाबंदी ने राजस्थान में काबिल बेरोजगार पत्रकारों की एक फौज खड़ी कर दी। कुछ ने पत्रिका में जुगाड़ लगा लिया तो कुछ दिल्ली के अखबारों के ब्यूरो बन गए। सब इतने भाग्यशाली नहीं रहे।

इस बीच सबसे पहले चर्चा चली ‘पंजाब केसरी’  के राजस्थान आने की। पंजाब केसरी के इंतजार में सत्रह-अठारह साल कब गुजर गए, पत्रकारों को पता ही नहीं चला। पंजाब केसरी आया भी तो उसने पत्रिका या भास्कर की तरह लगभग हर जिला मुख्यालय से अपने संस्करण नहीं छापे। ऐसे ही ‘हिन्दुस्तान’  के आने की चर्चा ना जाने कब से चल रही है और पत्रकारों ने तो अब इस उम्मीद से नाता ही तोड़ लिया है। चर्चा तो अमर उजाला, जागरण और राज इंडिया के आने की भी करीब पांच-छह साल से चल रही है परंतु किसी की लांचिंग ही नहीं हो रही। इस बीच पत्रकार जगत में खूब चर्चाएं चलती हैं। जयपुर में जमीन अलॉट होने, नींव का पत्थर रखे जाने, कुछ स्टाफ की भर्ती भी हो जाने की चर्चाएं परवान चढ़ती हैं फिर पता नहीं कब उतर जाती हैं।

जयपुर के सांध्य ‘महानगर टाइम्स’  के गोपाल शर्मा भी दस साल पहले इसके विस्तार की योजना बनाने में जी जान से जुट गए थे। अजमेर संस्करण को लेकर वे ज्यादा गंभीर हो गए परंतु फिर इरादा छोड़ दिया। कुछ साल पहले जयपुर से ‘महका भारत’ की शुरुआत हुई। शुरुआत से पहले ही हवा ऐसी बनी कि महका भारत हर जिले से एक साथ ना केवल प्रकाशित होगा बल्कि पत्रिका और भास्कर को ठिकाने लगा देगा। ऐसी चर्चाएं राज इंडिया को लेकर भी चलीं थीं। महका भारत आज भी जयपुर से बाहर नहीं निकल पा रहा है। भास्कर के सांध्य अखबार निकालने की तैयारी बीच में चली तो पत्रिका ने ‘डेली न्यूज’  और सायंकालीन ‘न्यूज टुडे’ निकाल दिया।

अमर उजाला और जागरण तो आए नहीं परंतु साल भर से फिर एक नई चर्चा चल पड़ी कि भास्कर और पत्रिका को टक्कर देने के लिए एक साथ तीन नए अखबार, ‘दैनिक अम्बर’, ‘मॉर्निंग न्यूज’ और ‘लोकदशा’  अच्छे बजट और लम्बी प्लानिंग के साथ आ रहे हैं। शेखावाटी में कई कॉलेजों के संचालक और विदेश में कारोबार से जुडे़ एक व्यापारिक घराने ने अपने लिए दैनिक अम्बर टाइटल खरीदा। दैनिक भास्कर, सीकर से जुडे़ एक पत्रकार को दैनिक अम्बर निकालने और चलाने का जिम्मा दिया गया। चर्चा चली कि करोड़ों के बजट के साथ भव्य तरीके से जयपुर से इसकी लॉचिंग होगी। भास्कर, पत्रिका और बाकी अखबारों से उकताए पत्रकारों ने इसमें एंट्री के लिए जुगत भिड़ानी शुरू कर दी।

इसी बीच प्रबंधन ने अम्बर के मालिकों को समझाया कि प्रातःकालीन से पहले सायंकालीन निकालते हैं। जिस भास्कर को ठिकाने लगाने का दावा किया जा रहा था, उसी भास्कर प्रेस से कथित रूप से हजारों प्रतियां छपकर अब जयपुर से एक सौ दस किलोमीटर दूर सीकर में बंटने जा रही हैं। बाद में मालिकों को समझाया गया कि सारा कारोबार तो शेखावाटी में है जहां असर दिखाना जरूरी है,  लिहाजा सीकर/झुंझनूं से अखबार निकालना ठीक रहेगा। बताया जाता है कि एक सोची समझी रणनीति के तहत यह सुझाव दिए गए। जिन लोगों के हाथ में अम्बर छापने की कमान है, उन्हें लगता है कि अगर जयपुर से यह छपा तो फिर कई ऐसे योग्य पत्रकार और प्रबंधक आ जाएंगे कि उनकी दुकान उठते देर नहीं लगेगी। दुकान ना भी उठी तो उन्हें काम करना पडे़गा जबकि अभी नाम मात्र का काम हो रहा है और पिछले डेढ-दो साल से मजे चल रहे हैं।

इसके साथ ही हवा बनी ‘लोकदशा’ की। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी बताए जाते शिवचरण माली का यह अखबार निकला तो सही परंतु आज भी अपनी दिशा की तलाश में है। वीर सक्सेना जैसे वरिष्ठ पत्रकार शुरुआत में इससे जुड़े परंतु बाद में इसे छोड़कर चलते बने। एक और अखबार ‘मॉर्निंग न्यूज’ भी सामने आ गया। सायंकालीन ‘इवनिंग न्यूज’  निकालने वाले मोहन लाल शर्मा इस अखबार को बड़ी शान से लेकर आए। लोकदशा छोड़ने के बाद वीर सक्सेना मॉर्निंग न्यूज से जुड़े परंतु जल्दी ही इससे किनारा कर गए। प्रबंधन की बागडोर संभाली रिटायर्ड आईएएस और राजस्थान के पूर्व जनसंपर्क निदेशक अमर सिंह राठौड़ ने। शायद यह उम्मीद रही होगी कि राठौड़ अपने दीर्घ संपर्कों के चलते विज्ञापन के लिए काफी उल्लेखनीय योगदान देंगे परंतु मॉर्निंग न्यूज भी अभी कोई बहुत बड़ा बैनर बनकर राजस्थान के पटल पर उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। जयपुर के बाहर तो इसका नाम भी लोग नहीं जानते।

अब फिर राजस्थान के पत्रकारों में चर्चा है कि जल्द ही अमर उजाला और जागरण आने वाले हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि दुनियाभर की खबरें लाने का दावा करने वाले पत्रकार कभी अखबारों की लॉचिंग की सही खबर नहीं ला पाते। जो कुछ अखबार आते भी हैं तो उनके बारे में यह तक अंदाजा नहीं लगा पाते कि वे वास्तव में पत्रकारिता के उद्देश्य से आ रहे हैं या अपने असली व्यापार के लिए तलवार-ढाल के रूप में अखबार ला रहे हैं। इस चक्कर में कई तो अपने अच्छे खासे बैनर की नौकरी छोड़कर इन अखबारों में नौकरी कर लेते हैं परंतु बाद में कहीं जाने लायक नहीं रह पाते। राजस्थान विधानसभा चुनावों में अभी दो साल बाकी हैं। इसके पहले फिर नए अखबारों की लॉचिंग की अफवाहें फैलेंगी तब तक सब कुशल मंगल है।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. salil goswami

    August 13, 2011 at 1:42 pm

    rajendra ji rajasthan k samacharpatro k halat ki jo sameeksha apne ki h me usse sahmat hoo.yahan me ek bat aur jodana chahta hoo aajkal ho ye raha h ki prabandhan 3 logo k bharose samacharpatra chlane me visvas kr raha ha ek sampadak 2nd chief reporter aur 3sara desk incharge lekin wo 3no me cordination bithane me nakamyab ho raha h ya jante bujhte is mudde pr chuppi sdhe huye h yahin gadbad ho rahi h mauka milne pr 3no apne aham k chalte khbar v samacharpatra k prati nyay nahi kar pate jiska khamiyaja field reporters v sanstha ki chhavi ko bhugatana padata h jis pr kisi ka dyan nahi ja raha h jabki gaur karne ki bat ye h ki samacharpatra ka har ek employee samaj me sanstha ko represent karta h uski samsya sanstha ki samasya hoti h pr shayad kisi ko sanstha ki chhavi ki fikar nai ya wo ye ye soch kar khush hote honge ki FIKAR KARE FUKRE SATH HI APNE THEEK kaha aajkal prabandhan ko ray dekar apni dukan chalane walon ki sankhya me bhi ijafa ho raha h ye sampurn patrakar jagat k liye soch ka vishay h (rajasthan k sandharbh me) salil goswami jaipur

  2. sahabram shoyran

    October 17, 2013 at 10:19 pm

    sir aapka news paper hmare ariya me –Nohar (dis) Hanumangarh
    Rajasthan me nohar ke 210 villeage me ptrkarita ka sndes plese tell me

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